भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1389

स्थविरः सन् परं शक्त्या घटे दुर्योधनाहवे ।
अतः परं मया कार्यं क्षुद्रं विजयगृद्धिना ॥ १० ॥
‘दुर्योधन! यद्यपि मैं बूढ़ा हो गया, तथापि युद्धस्थलमें अपनी पूरी शक्ति लगाकर तुम्हारी विजयके लिये चेष्टा करता हूँ, परंतु जान पड़ता है, अब तुम्हारी जीतकी इच्छासे मुझे नीच कार्य भी करना पड़ेगा ॥ १० ॥

अनस्त्रविद्यं सर्वो हन्तव्योऽस्त्रविदा जनः ।
यद् भवान् मन्यते चापि शुभं वा यदि वाशुभम् ॥ ११ ॥
तद् वै कर्तास्मि कौरव्य वचनात् तव नान्यथा ।
‘ये सब लोग दिव्यास्त्रोंको नहीं जानते और मैं जानता हूँ, इसलिये मुझे उन्हीं अस्त्रोंद्वारा इन सबको मारना पड़ेगा। कुरुनन्दन! तुम शुभ या अशुभ जो कुछ भी कराना उचित समझो, वह तुम्हारे कहनेसे करूँगा; उसके विपरीत कुछ नहीं करूँगा ॥ ११ १/२ ॥

निहत्य सर्वपाञ्चालान् युद्धे कृत्वा पराक्रमम् ॥ १२ ॥
विमोक्ष्ये कवचं राजन् सत्येनायुधमालभे ।
‘राजन्! मैं सत्यकी शपथ खाकर अपने धनुषको छूते हुए कहता हूँ कि ‘युद्धमें पराक्रम करके समस्त पांचालोंका वध किये बिना कवच नहीं उतारूँगा’ ॥ १२ १/२ ॥

मन्यसे यच्च कौन्तेयमर्जुनं श्रान्तमाहवे ॥ १३ ॥
तस्य वीर्यं महाबाहो शृणु सत्येन कौरव ।
‘परंतु तुम जो कुन्तीकुमार अर्जुनको युद्धमें थका हुआ समझते हो, वह तुम्हारी भूल है। महाबाहु कुरुराज! मैं उनके पराक्रमका सचाईके साथ वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १३ १/२ ॥

तं न देवा न गन्धर्वा न यक्षा न च राक्षसाः ॥ १४ ॥
उत्सहन्ते रणे जेतुं कुपितं सव्यसाचिनम् ।
‘युद्धमें कुपित हुए सव्यसाची अर्जुनको न देवता, न गन्धर्व, न यक्ष और न राक्षस ही जीत सकते हैं ॥

खाण्डवे येन भगवान् प्रत्युद्यातः सुरेश्वरः ॥ १५ ॥
सायकैर्वारितश्चापि वर्षमाणो महात्मना ।
‘उस महामनस्वी वीरने खाण्डववनमें वर्षा करते हुए भगवान् देवराज इन्द्रका सामना किया और अपने बाणोंद्वारा उन्हें रोक दिया ॥ १५ १/२ ॥

यक्षा नागास्तथा दैत्या ये चान्ये बलगर्विताः ॥ १६ ॥
निहताः पुरुषेन्द्रेण तच्चापि विदितं तव ।
‘पुरुषश्रेष्ठ अर्जुनने उस समय यक्ष, नाग, दैत्य तथा दूसरे भी जो बलका घमंड रखनेवाले वीर थे, उन सबको मार डाला था। यह बात तुम्हें मालूम ही है ॥

गन्धर्वा घोषयात्रायां चित्रसेनादयो जिताः ॥ १७ ॥
यूयं तैर्ह्रियमाणाश्च मोक्षिता दृढधन्वना ।