महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1390, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'घोषयात्राके समय जब चित्रसेन आदि गन्धर्व तुम्हें हरकर लिये जा रहे थे, उस समय सुदृढ़ धनुष धारण करनेवाले अर्जुनने ही उन सबको परास्त किया और तुम्हें बन्धनसे छुड़ाया ॥ १७ १/२ ॥
निवातकवचाश्चापि देवानां शत्रवस्तथा ॥ १८ ॥
सुरैरवध्याः संग्रामे तेन वीरेण निर्जिताः ।
'देवशत्रु निवातकवच नामक दानव, जिन्हें संग्राममें देवता भी नहीं मार सकते थे, उसी वीर अर्जुनसे पराजित हुए हैं ॥ १८ १/२ ॥
दानवानां सहस्राणि हिरण्यपुरवासिनाम् ॥ १९ ॥
विजिग्ये पुरुषव्याघ्रः स शक्यो मानुषैः कथम् ।
'जिन पुरुषसिंह अर्जुनने हिरण्यपुरनिवासी सहस्रों दानवोंपर विजय पायी है, वे मनुष्योंद्वारा कैसे जीते जा सकते हैं? ॥ १९ १/२ ॥
प्रत्यक्षं चैव ते सर्वं यथाबलमिदं तव ॥ २० ॥
क्षपितं पाण्डुपुत्रेण चेष्टतां नो विशाम्पते ।
'प्रजानाथ! हमारे बहुत चेष्टा करनेपर भी पाण्डुपुत्र अर्जुनने जिस प्रकार तुम्हारी इस सेनाका संहार कर डाला है, यह सब तो तुम्हारी आँखोंके सामने ही है' ॥ २० १/२ ॥
संजय उवाच
तं तदाभिप्रशंसन्तमर्जुनं कुपितस्तदा ॥ २१ ॥
द्रोणं तव सुतो राजन् पुनरेवेदमब्रवीत् ।
संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए द्रोणाचार्यसे उस समय आपके पुत्रने कुपित होकर पुनः इस प्रकार कहा— ॥ २१ १/२ ॥
अहं दुःशासनः कर्णः शकुनिर्मातुलश्च मे ॥ २२ ॥
हनिष्यामोऽर्जुनं संख्ये द्विधा कृत्वद्य भारतीम् ।
(तिष्ठ स त्वं महाबाहो नित्यं शिष्यः प्रियस्तव ॥)
'आज मैं, दुःशासन, कर्ण और मेरे मामा शकुनि कौरव-सेनाको दो भागोंमें बाँटकर युद्धमें अर्जुनको मार डालेंगे। महाबाहो! आप चुपचाप खड़े रहिये, क्योंकि अर्जुन सदासे ही आपके प्रिय शिष्य हैं' ॥ २२ १/२ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भारद्वाजो हसन्निव ॥ २३ ॥
अन्ववर्तत राजानं स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रवीत् ।
दुर्योधनकी यह बात सुनकर द्रोणाचार्यने हँसते हुए-से उसकी बातका अनुमोदन किया और 'तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा कहकर वे राजा दुर्योधनसे पुनः इस प्रकार बोले— ॥ २३ १/२ ॥
को हि गाण्डीवधन्वानं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ २४ ॥