महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1391, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअक्षयं क्षपयेत् कश्चित् क्षत्रियः क्षत्रियर्षभम् । 'नरेश्वर! अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले क्षत्रिय-शिरोमणि गाण्डीवधारी अविनाशी अर्जुनको कौन क्षत्रिय मार सकता है? ।। २४ १/२ ।। तं न वित्तपतिर्नैन्द्रो न यमो न जलेश्वरः ।। २५ ।। नासुरोरगरक्षांसि क्षपयेयुः सहायुधम् । 'हाथमें धनुष धारण किये हुए अर्जुनको न तो धनाध्यक्ष कुबेर, न इन्द्र, न यमराज, न जलके स्वामी वरुण और न असुर, नाग एवं राक्षस ही नष्ट कर सकते हैं ।। २५ १/२ ।। मूढास्त्वेतानि भाषन्ते यानीमान्यात्थ भारत ।। २६ ।। युद्धे ह्यर्जुनमासाद्य स्वस्तिमान् को व्रजेद् गृहम् । 'भारत! तुम जो कुछ कह रहे हो, ऐसी बातें मूर्ख मनुष्य कहा करते हैं। भला, युद्धमें अर्जुनका सामना करके कौन कुशलपूर्वक घरको लौट सकता है? ।। २६ १/२ ।। त्वं तु सर्वाभिशङ्कित्वान्निष्ठुरः पापनिश्चयः ।। २७ ।। श्रेयसस्त्वद्धिते युक्तांस्तत्तद् वक्तुमिहेच्छसि । 'तुम निष्ठुर और पापपूर्ण विचार रखनेवाले हो; अतः तुम्हारे मनमें सबपर संदेह बना रहता है, इसीलिये तुम्हारे हितमें ही तत्पर रहनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंको भी तुम ऐसी-ऐसी बातें सुनानेकी इच्छा रखते हो ।। २७ १/२ ।। गच्छ त्वमपि कौन्तेयमात्मार्थे जहि मा चिरम् ।। २८ ।। त्वमप्याशंसये योद्धुं कुलजः क्षत्रियो ह्यसि । इमान् किं क्षत्रियान् सर्वान् घातयिष्यस्यनागसः ।। २९ ।। 'तुम भी जाओ, अपने हितके लिये कुन्तीकुमार अर्जुनको शीघ्र ही मार डालो। तुम भी तो कुलीन क्षत्रिय हो। मैं आशा करता हूँ, तुममें भी युद्ध करनेकी शक्ति है ही, फिर इन सम्पूर्ण निरपराध क्षत्रियोंको क्यों व्यर्थ कटवाओगे? ।। २८-२९ ।। त्वमस्य मूलं वैरस्य तस्मादासाद्यार्जुनम् । एष ते मातुलः प्राज्ञः क्षत्रधर्ममनुव्रतः ।। ३० ।। दुर्धूतदेवी गान्धारे प्रयात्वर्जुनमाहवे । 'तुम इस वैरकी जड़ हो, अतः स्वयं ही जाकर अर्जुनका सामना करो, गान्धारीनन्दन! ये कपटद्यूतके खिलाड़ी तुम्हारे मामा शकुनि भी बड़े बुद्धिमान् और क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले हैं। ये ही युद्धमें अर्जुनपर चढ़ाई करें ।। ३० १/२ ।। एषोऽक्षकुशलो जिह्यो द्यूतकृत् कितवः शठः ।। ३१ ।। देविता निकृतिप्रज्ञो युधि जेष्यति पाण्डवान् ।