महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1392, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'ये पासे फेंकनेमें बड़े कुशल हैं। कुटिलता, शठता और धूर्तता तो इनमें कूट-कूटकर भरी है। ये जूएके खिलाड़ी तो हैं ही, छल-विद्याके भी अच्छे जानकार हैं। युद्धमें पाण्डवोंको अवश्य जीत लेंगे ।। ३१ १/२ ।। त्वया कथितमत्यर्थं कर्णेन सह हृष्टवत् ।। ३२ ।। असकृच्छ्रून्यवन्मोहाद् धृतराष्ट्रस्य शृण्वतः । अहं च तात कर्णश्च भ्राता दुःशासनश्च मे ।। ३३ ।। पाण्डुपुत्रान् हनिष्यामः सहिताः समरे त्रयः । इति ते कत्थमानस्य श्रुतं संसदि संसदि ।। ३४ ।। 'दुर्योधन! तुमने एकान्तस्थानके समान भरी सभामें धृतराष्ट्रके सुनते हुए कर्णके साथ अत्यन्त प्रसन्न-से होकर मोहवश बारंबार बहुत जोर देकर यह बात कही है कि 'तात! मैं, कर्ण और भाई दुःशासन—ये तीन ही समरभूमिमें एक साथ होकर पाण्डवोंका वध कर डालेंगे।' प्रत्येक सभामें ऐसी ही शेखी बघारते हुए तुम्हारी बात मैंने सुनी है ।। ३२—३४ ।। अनुतिष्ठ प्रतिज्ञां तां सत्यवाग् भव तैः सह । एष ते पाण्डवः शत्रुरविशङ्कोऽग्रतः स्थितः ।। ३५ ।। क्षत्रधर्ममवेक्षस्व श्लाघ्यस्तव वधो जयात् । 'अपनी उस प्रतिज्ञाको पूर्ण करो। उन सबके साथ सत्यवादी बनो। ये तुम्हारे शत्रु पाण्डुपुत्र अर्जुन निर्भय होकर सामने खड़े हैं। क्षत्रियधर्मकी ओर दृष्टिपात करो। युद्धमें विजयकी अपेक्षा अर्जुनके हाथसे तुम्हारा वध भी हो जाय तो वह तुम्हारे लिये प्रशंसाकी बात होगी ।। ३५ १/२ ।। दत्तं भुक्तमधीतं च प्राप्तमैश्वर्यमीप्सितम् ।। ३६ ।। कृतकृत्योऽनृणश्चासि मा भैर्युध्यस्व पाण्डवम् । 'तुमने बहुत-सा दान कर लिया, भोग भोग लिये, स्वाध्याय भी कर लिया और मनमाना ऐश्वर्य भी पा लिया। अब तुम कृतकृत्य और देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके ऋणसे मुक्त हो गये; अतः डरो मत। पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करो' ।। ३६ १/२ ।। इत्युक्त्वा समरे द्रोणो न्यवर्तत यतः परे । द्वैधीकृत्य ततः सेनां युद्धं समभवत् तदा ।। ३७ ।। ऐसा कहकर द्रोणाचार्य समरभूमिमें जिस ओर शत्रुओंकी सेना थी, उधर ही लौट पड़े। तत्पश्चात् सेनाके दो विभाग करके उसी क्षण युद्ध आरम्भ हो गया ।। ३७ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि द्रोणदुर्योधनभाषणे पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें द्रोणाचार्य और दुर्योधनका सम्भाषणविषयक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८५ ।।