महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1401, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रुपदस्य कुले जातः सर्वास्त्रेष्वस्त्रवित्तमः ॥ ५१ ॥ कः क्षत्रियो मन्यमानः प्रेक्षेतारिमवस्थितम् । भीमसेन बोले— द्रुपदके कुलमें जन्म लेकर और सम्पूर्ण अस्त्रोंका सबसे बड़ा विद्वान् होकर भी कौन स्वाभिमानी क्षत्रिय शत्रुको सामने खड़ा हुआ देख सकेगा? ॥ ५१ १/२ ॥ पितृपुत्रवधं प्राप्य पुमान् कः परिपालयेत् ॥ ५२ ॥ विशेषतस्तु शपथं शपित्वा राजसंसदि । शत्रुके हाथसे पिता और पुत्रका वध पाकर, विशेषतः राजाओंकी मण्डलीमें शपथ खाकर कौन पुरुष उस शत्रु की रक्षा करेगा? ॥ ५२ १/२ ॥ एष वैश्वानर इव समृद्धः स्वेन तेजसा ॥ ५३ ॥ शरचापेन्धनो द्रोणः क्षत्रं दहति तेजसा । धनुष-बाणरूपी ईंधनसे युक्त हो तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित होनेवाले ये द्रोणाचार्य अपने प्रभावसे क्षत्रियोंको दग्ध कर रहे हैं ॥ ५३ १/२ ॥ पुरा करोति निःशेषां पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ५४ ॥ स्थिताः पश्यत मे कर्म द्रोणमेव व्रजाम्यहम् । ये जबतक पाण्डव-सेनाको समाप्त नहीं कर लेते, उसके पहले ही मैं द्रोणपर आक्रमण करता हूँ। वीरो! तुम खड़े होकर मेरा पराक्रम देखो ॥ ५४ १/२ ॥ इत्युक्त्वा प्राविशत् क्रुद्धो द्रोणानीकं वृकोदरः ॥ ५५ ॥ शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्द्रावयंस्तव वाहिनीम् । ऐसा कहकर भीमसेनने कुपित हो धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा आपकी सेनाको खदेड़ते हुए द्रोणाचार्यके सैन्यदलमें प्रवेश किया ॥ ५५ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नोऽपि पाञ्चाल्यः प्रविश्य महतीं चमूम् ॥ ५६ ॥ आससादरणे द्रोणं तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् । इसी प्रकार पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने भी आपकी विशाल सेनामें घुसकर रणभूमिमें द्रोणाचार्यपर चढ़ाई की। उस समय बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा ॥ नैव नस्तादृशं युद्धं दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् ॥ ५७ ॥ यथा सूर्योदये राजन् समुत्पिञ्जोऽभवन्महान् । राजन्! उस दिन सूर्योदयके समय जैसा महान् जनसंहारकारी संग्राम हुआ, वैसा हमने पहले न तो कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ५७ १/२ ॥ संसक्तान्येव चादृश्यन् रथवृन्दानि मारिष ॥ ५८ ॥ हतानि च विकीर्णानि शरीराणि शरीरिणाम् । माननीय नरेश! उस युद्धमें रथोंके समूह परस्पर सटे हुए ही दिखायी देते थे और देहधारियोंके शरीर मरकर बिखरे हुए थे ॥ ५८ १/२ ॥