महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1402, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकेचिदन्यत्र गच्छन्तः पथि चान्यैरुपद्रुताः ॥ ५९ ॥ विमुखाः पृष्ठतश्चान्ये ताड्यन्ते पार्श्वतः परे । कुछ योद्धा अन्यत्र जाते हुए मार्गमें दूसरे योद्धाओंके आक्रमणके शिकार हो जाते थे। कुछ लोग युद्धसे विमुख होकर भागते समय पीठ और पार्श्वभागोंमें विपक्षियोंके बाणोंकी चोट सहते थे ॥ ५९ १/२ ॥
तथा संसक्तयुद्धं तदभवद् भृशदारुणम् । अथ संध्यागतः सूर्यः क्षणेन समपद्यत ॥ ६० ॥ इस प्रकार वह अत्यन्त भयंकर घमासान युद्ध हो ही रहा था कि क्षणभरमें प्रातःसंध्याकी वेलामें सूर्यदेवका पूर्णतः उदय हो गया ॥ ६० ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥
* द्रुपदकुलमें उत्पन्न होनेके कारण धृष्टद्युम्नका क्षत्रिय होना तो प्रसिद्ध ही है। परंतु याज और उपयाज नामक दो तपस्वी ब्राह्मणोंकी तपस्यासे उनकी उत्पत्ति हुई थी तथा परमेश्वरके मुखसे प्रकट हुए ब्राह्मणस्वरूप अग्निसे उनका प्रादुर्भाव हुआ था। इससे उनमें ब्राह्मणत्व भी था।