भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1404

विस्फारितविकृष्टानां कार्मुकाणां च कूजताम् ।। ७ ।। शब्दः समभवद् राजन् दिविस्पृग् भरतर्षभ । राजन्! भरतश्रेष्ठ! उस समय शंख, भेरी और मृदंगोंकी ध्वनि, गरजते हुए गजराजोंका चीत्कार और फैलाये तथा खींचे गये धनुषोंकी टंकार—इन सबका सम्मिलित शब्द आकाशमें गूँज उठा था ।। ७ १/२ ।। द्रवतां च पदातीनां शस्त्राणां पततामपि ।। ८ ।। हयानां हेषतां चापि रथानां च निवर्तताम् । क्रोशतां गर्जतां चैव तदाऽऽसीत् तुमुलं महत् ।। ९ ।। दौड़ते हुए पैदलों, गिरते हुए शस्त्रों, हिनहिनाते हुए घोड़ों, लौटते हुए रथों तथा चीखते-चिल्लाते और गरजते हुए शूरवीरोंका मिला हुआ महाभयंकर शब्द वहाँ गूँज रहा था ।। ८-९ ।। विवृद्धस्तुमुलः शब्दो द्यामगच्छन्महांस्तदा । नानायुधनिकृत्तानां चेष्टतामातुरः स्वनः ।। १० ।। भूमावश्रूयत महांस्तदाऽऽसीत् कृपणं महत् । पततां पात्यमानानां पत्त्यश्वरथदन्तिनाम् ।। ११ ।। वह बढ़ा हुआ अत्यन्त भयानक शब्द उस समय स्वर्गलोकतक जा पहुँचा था। नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे कटकर छटपटाते हुए योद्धाओंका महान् आर्तनाद धरतीपर सुनायी दे रहा था। गिरते और गिराये जाते हुए पैदल, घोड़े, रथ और हाथियोंकी अत्यन्त दयनीय दशा दिखायी देती थी ।। १०-११ ।। तेषु सर्वेष्वनीकेषु व्यतिषक्तेष्वनेकशः । स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे स्वांश्च स्वान् परेषां परे परान् ।। १२ ।। उन सभी सेनाओंमें बारंबार मुठभेड़ होती थी और उसमें अपने ही पक्षके लोग अपने ही पक्षवालोंको मार डालते थे। शत्रुपक्षके लोग भी अपने पक्षके लोगोंको मारते थे। शत्रुपक्षके जो स्वजन थे उनको तथा शत्रुओंको भी शत्रुपक्षके योद्धा मार डालते थे ।। १२ ।। वीरबाहुविमृष्टाश्च योधेषु च गजेषु च । राशयः प्रत्यदृश्यन्त वाससां नेजनेष्विव ।। १३ ।। जैसे कपड़े धोनेके घाटोंपर ढेर-के-ढेर वस्त्र दिखायी देते हैं, उसी प्रकार योद्धाओं और हाथियोंपर वीरोंकी भुजाओंद्वारा छोड़े गये अस्त्र-शस्त्रोंकी राशियाँ दिखायी देती थीं ।। १३ ।। उद्यतप्रतिपिष्टानां खड्गानां वीरबाहुभिः । स एव शब्दस्तद्रूपो वाससां निज्यतामिव ।। १४ ।।