भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1405

शूरवीरोंके हाथोंमें उठकर विपक्षी योद्धाओंके शस्त्रोंसे टकराये हुए खड्गोंका शब्द वैसा ही जान पड़ता था, जैसे धोबियोंके पटहोंपर पीटे जानेवाले कपड़ोंका शब्द होता है ।। १४ ।। अर्धासिभिस्तथा खड्गैस्तोमरैः सपरश्वधैः । निकृष्टयुद्धं संसक्तं महदासीत् सुदारुणम् ।। १५ ।। एक ओर धारवाली और दुधारी तलवारों, तोमरों तथा फरसोंद्वारा जो अत्यन्त निकटसे युद्ध चल रहा था, वह भी बहुत ही क्रूरतापूर्ण एवं भयंकर था ।। १५ ।। गजाश्वकायप्रभवां नरदेहप्रवाहिनीम् । शस्त्रमत्स्यसुसम्पूर्णां मांसशोणितकर्दमाम् ।। १६ ।। आर्तनादस्वनवतीं पताकाशस्त्रफेनिलाम् । नदीं प्रावर्तयन् वीराः परलोकौघगामिनीम् ।। १७ ।। वहाँ युद्ध करनेवाले वीरोंने खूनकी नदी बहा दी, जिसका प्रवाह परलोककी ओर ले जानेवाला था। वह रक्तकी नदी हाथी और घोड़ोंकी लाशोंसे प्रकट हुई थी। मनुष्योंके शरीरोंको बहाये लिये जाती थी। उसमें शस्त्ररूपी मछलियाँ भरी थीं। मांस और रक्त ही उसकी कीचड़ थे। पीड़ितोंके आर्तनाद ही उसकी कलकल ध्वनि थे तथा पताका और शस्त्र उसमें फेनके समान जान पड़ते थे ।। १६-१७ ।। शरशक्त्यर्दिताः क्लान्ता रात्रिमूढाल्पचेतसः । विष्टभ्य सर्वगात्राणि व्यतिष्ठन् गजवाजिनः ।। १८ ।। रात्रिके युद्धसे मोहित, अल्प चेतनावाले, बाणों और शक्तियोंसे पीड़ित तथा थके-माँदे हाथी एवं घोड़े आदि वाहन अपने सारे अंगोंको स्तब्ध करके वहाँ खड़े थे ।। १८ ।। बाहुभिः कवचैश्चित्रैः शिरोभिश्चारुकुण्डलैः । युद्धोपकरणैश्चान्यैस्तत्र तत्र चकाशिरे ।। १९ ।। योद्धाओंकी कटी हुई भुजाओं, विचित्र कवचों, मनोहर कुण्डलमण्डित मस्तकों तथा इधर-उधर बिखरी हुई अन्यान्य युद्ध-सामग्रियोंसे रणभूमिके विभिन्न प्रदेश प्रकाशित हो रहे थे ।। १९ ।। क्रव्यादासङ्घैराकीर्णं मृतैरर्धमृतैरपि । नासीद् रथपथस्तत्र सर्वमायोधनं प्रति ।। २० ।। कहीं कच्चा मांस खानेवाले प्राणियोंका समुदाय भरा था, कहीं मरे और अधमरे जीव पड़े थे। इन सबके कारण उस सारी युद्धभूमिमें कहीं भी रथ जानेके लिये रास्ता नहीं मिलता था ।। २० ।। मज्जत्सु चक्रेषु रथान् सत्त्वमास्थाय वाजिनः । कथंचिदवहञ्छ्रान्ता वेपमानाः शरार्दिताः ।। २१ ।। कुलसत्त्वबलोपेता वाजिनो वारणोपमाः ।