भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 141

ततो गदाग्राभिहतौ क्षणेन रुधिरोक्षितौ ।
ददृशाते महात्मानौ किंशुकाविव पुष्पितौ ॥ २३ ॥
एक ही क्षणमें गदाके अग्रभागसे घायल होकर वे दोनों महामनस्वी वीर खूनसे लथपथ हो फूलोंसे भरे हुए दो पलाश वृक्षोंके समान दिखायी देने लगे ॥ २३ ॥
शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तयोः पुरुषसिंहयोः ।
गदाभिघातसंह्रादः शक्राशनिरवोपमः ॥ २४ ॥
उन दोनों पुरुषसिंहोंकी गदाओंके टकरानेका शब्द इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें सुनायी देता था ॥ २४ ॥
गदया मद्रराजेन सव्यदक्षिणमाहतः ।
नाकम्पत तदा भीमो भिद्यमान इवाचलः ॥ २५ ॥
उस समय मद्रराजकी गदासे बायें-दायें चोट खाकर भी भीमसेन विचलित नहीं हुए। जैसे पर्वत वज्रका आघात सहकर भी अविचलभावसे खड़ा रहता है ॥ २५ ॥
तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो महाबलः ।
धैर्यान्मद्राधिपस्तस्थौ वज्रैर्गिरिरिवाहतः ॥ २६ ॥
इसी प्रकार भीमसेनकी गदाके वेगसे आहत होकर महाबली मद्रराज वज्राघातसे पीड़ित पर्वतकी भाँति धैर्यपूर्वक खड़े रहे ॥ २६ ॥
आपेततुर्महावेगौ समुच्छ्रितगदावुभौ ।
पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतुः ॥ २७ ॥
वे दोनों महावेगशाली वीर गदा उठाये एक-दूसरेपर टूट पड़े। फिर अन्तर्मार्गमें स्थित हो मण्डलाकार गतिसे विचरने लगे ॥ २७ ॥
अथाप्लुत्य पदान्यष्टौ संनिपत्य गजाविव ।
सहसा लोहदण्डाभ्यामन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् आठ पग चलकर दोनों दो हाथियोंकी भाँति परस्पर टूट पड़े और सहसा लोहेके डंडोंसे एक-दूसरेको मारने लगे ॥ २८ ॥
तौ परस्परवेगाच्च गदाभ्यां च भृशाहतौ ।
युगपत् पेततुर्वीरौ क्षिताविन्द्रध्वजाविव ॥ २९ ॥
वे दोनों वीर परस्परके वेगसे और गदाओंद्वारा अत्यन्त घायल हो दो इन्द्रध्वजोंके समान एक ही समय पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २९ ॥
ततो विह्वलमानं तं निःश्वसन्तं पुनः पुनः ।
शल्यमभ्यपतत् तूर्णं कृतवर्मा महारथः ॥ ३० ॥
उस समय शल्य अत्यन्त विह्वल होकर बारंबार लम्बी साँस खींच रहे थे। इतनेहीमें महारथी कृतवर्मा तुरंत राजा शल्यके पास आ पहुँचा ॥ ३० ॥
दृष्ट्वा चैनं महाराज गदयाभिनिपीडितम् ।