महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंविचेष्टन्तं यथा नागं मूर्च्छयाभिपरिप्लुतम् ॥ ३१ ॥
महाराज! आकर उसने देखा कि राजा शल्य गदासे पीड़ित एवं मूर्च्छासे अचेत हो आहत हुए नागकी भाँति छटपटा रहे हैं ॥ ३१ ॥
ततः स्वरथमारोप्य मद्राणामधिपं रणे ।
अपोवाह रणात् तूर्णं कृतवर्मा महारथः ॥ ३२ ॥
यह देख महारथी कृतवर्मा युद्धस्थलमें मद्रराज शल्यको अपने रथपर बिठाकर तुरंत ही रणभूमिसे बाहर हटा ले गया ॥ ३२ ॥
क्षीबवद् विह्वलो वीरो निमेषात् पुनरुत्थितः ।
भीमोऽपि सुमहाबाहुर्गदापाणिर्दृश्यत ॥ ३३ ॥
तदनन्तर महाबाहु वीर भीमसेन भी मदोन्मत्तकी भाँति विह्वल हो पलक मारते-मारते उठकर खड़े हो गये और हाथमें गदा लिये दिखायी देने लगे ॥ ३३ ॥
ततो मद्राधिपं दृष्ट्वा तव पुत्राः पराङ्मुखम् ।
सनागपत्त्यश्वरथाः समकम्पन्त मारिष ॥ ३४ ॥
आर्य! उस समय मद्रराज शल्यको युद्धसे विमुख हुआ देख हाथी, घोड़े, रथ और पैदल-सेनाओंसहित आपके सारे पुत्र भयसे काँप उठे ॥ ३४ ॥
ते पाण्डवैरर्द्यमानास्तावका जितकाशिभिः ।
भीता दिशोऽन्वपद्यन्त वातनुन्ना घना इव ॥ ३५ ॥
विजयसे सुशोभित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा पीड़ित हो आपके सभी सैनिक भयभीत हो हवाके उड़ाये हुए बादलोंकी भाँति चारों दिशाओंमें भाग गये ॥ ३५ ॥
निर्जित्य धार्तराष्ट्रांस्तु पाण्डवेया महारथाः ।
व्यरोचन्त रणे राजन् दीप्यमाना इवाग्नयः ॥ ३६ ॥
राजन्! इस प्रकार आपके पुत्रोंको जीतकर महारथी पाण्डव प्रज्वलित अग्नियोंकी भाँति रणक्षेत्रमें प्रकाशित होने लगे ॥ ३६ ॥
सिंहनादान् भृशं चक्रुः शङ्खान् दध्मुश्च हर्षिताः ।
भेरीश्च वादयामासुर्मृदङ्गांश्चानकैः सह ॥ ३७ ॥
उन्होंने हर्षित होकर बारंबार सिंहनाद किये और बहुत-से शंख बजाये; साथ ही उन्होंने भेरी, मृदंग और आनक आदि वाद्योंको भी बजवाया ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि शल्यापयाने पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें शल्यका पलायनविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥