भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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षोडशोऽध्यायः

वृषसेनका पराक्रम, कौरव-पाण्डववीरोंका तुमुल युद्ध, द्रोणाचार्यके द्वारा पाण्डवपक्षके अनेक वीरोंका वध तथा अर्जुनकी विजय

संजय उवाच

तद् बलं सुमहद् दीर्णं त्वदीयं प्रेक्ष्य वीर्यवान् ।
दधारैको रणे राजन् वृषसेनोऽस्त्रमायया ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! आपकी विशाल सेनाको तितर-बितर हुई देख एकमात्र पराक्रमी वृषसेनने अपने अस्त्रोंकी मायासे रणक्षेत्रमें उसे धारण किया (भागनेसे रोका) ॥ १ ॥

शरा दश दिशो मुक्ता वृषसेनेन संयुगे ।
विचेरुस्ते विनिर्भिद्य नरवाजिरथद्विपान् ॥ २ ॥
उस युद्धस्थलमें वृषसेनके छोड़े हुए बाण हाथी, घोड़े, रथ और मनुष्योंको विदीर्ण करते हुए दसों दिशाओंमें विचरने लगे ॥ २ ॥

तस्य दीप्ता महाबाणा विनिश्चेरुः सहस्रशः ।
भानोरिव महाराज घर्मकाले मरीचयः ॥ ३ ॥
महाराज! जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें सूर्यसे निकलकर सहस्रों किरणें सब ओर फैलती हैं, उसी प्रकार वृषसेनके धनुषसे सहस्रों तेजस्वी महाबाण निकलने लगे ॥ ३ ॥

तेनार्दिता महाराज रथिनः सादिनस्तथा ।
निपेतुरुर्व्यां सहसा वातभग्ना इव द्रुमाः ॥ ४ ॥
राजन्! जैसे प्रचण्ड आँधीसे सहसा बड़े-बड़े वृक्ष टूटकर गिर जाते हैं, उसी प्रकार वृषसेनके द्वारा पीड़ित हुए रथी और अन्य योद्धागण सहसा धरतीपर गिरने लगे ॥ ४ ॥

हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च महारथः ।
अपातयद् रणे राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! उस महारथी वीरने रणभूमिमें घोड़ों, रथों और हाथियोंके सैकड़ों-हजारों समूहोंको मार गिराया ॥ ५ ॥

दृष्ट्वा तमेकं समरे विचरन्तमभीतवत् ।
सहिताः सर्वराजानः परिवव्रुः समन्ततः ॥ ६ ॥
उसे अकेले ही समरभूमिमें निर्भय विचरते देख सब राजाओंने एक साथ आकर सब ओरसे घेर लिया ॥ ६ ॥