भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1416

नरेश्वर! वहाँ द्रोणाचार्य और अर्जुनकी स्तुतिसे युक्त अदृश्य व्यक्तियोंके मुखोंसे निकली हुई बातें बारंबार सुनायी देने लगीं ।। ३९ १/२ ।।
विसृज्यमानेष्वस्त्रेषु ज्वालयत्सु दिशो दश ।। ४० ।।
अब्रुवंस्तत्र सिद्धाश्च ऋषयश्च समागताः ।
जब दिव्यास्त्रोंके प्रयोग होने लगे और उनके तेजसे दसों दिशाएँ प्रकाशित हो उठीं, उस समय आकाशमें एकत्र हुए सिद्ध और ऋषि इस प्रकार वार्तालाप करने लगे— ।। ४० १/२ ।।
नैवेदं मानुषं युद्धं नासुरं न च राक्षसम् ।। ४१ ।।
न दैवं न च गान्धर्वं ब्राह्मं ध्रुवमिदं परम् ।
विचित्रमिदमाश्चर्यं न नो दृष्टं न च श्रुतम् ।। ४२ ।।
‘यह युद्ध न तो मनुष्योंका है, न असुरोंका, न राक्षसोंका है और न देवताओं एवं गन्धर्वोंका ही। निश्चय ही यह परम उत्तम ब्राह्म युद्ध है। ऐसा विचित्र एवं आश्चर्यजनक संग्राम हमलोगोंने न तो कभी देखा था और न सुना ही था ।। ४१-४२ ।।
अति पाण्डवमाचार्यो द्रोणं चाप्यति पाण्डवः ।
नानयोरन्तरं शक्यं द्रष्टुमन्येन केनचित् ।। ४३ ।।
‘आचार्य द्रोण पाण्डुपुत्र अर्जुनसे बढ़कर हैं और पाण्डुपुत्र अर्जुन भी आचार्य द्रोणसे बढ़कर हैं। इन दोनोंमें कितना अन्तर है, इसे दूसरा कोई नहीं देख सकता ।।
यदि रुद्रो द्विधाकृत्य युध्येतात्मानमात्मना ।
तत्र शक्योपमा कर्तुमन्यत्र तु न विद्यते ।। ४४ ।।
‘यदि भगवान् शंकर अपने दो रूप बनाकर स्वयं ही अपने साथ युद्ध करें तो उसी युद्धसे इनकी उपमा दी जा सकती है और कहीं इन दोनोंकी समता नहीं है ।। ४४ ।।
ज्ञानमेकस्थमाचार्ये ज्ञानं योगश्च पाण्डवे ।
शौर्यमेकस्थमाचार्ये बलं शौर्यं च पाण्डवे ।। ४५ ।।
‘आचार्य द्रोणमें सारा ज्ञान एकत्र संचित है; परंतु पाण्डुपुत्र अर्जुनमें ज्ञानके साथ-साथ योग भी है। इसी प्रकार आचार्य द्रोणमें सारा शौर्य एक स्थानपर आ गया है; परंतु पाण्डुनन्दन अर्जुनमें शौर्यके साथ बल भी है ।। ४५ ।।
नेमौ शक्यौ महेष्वासौ युद्धे क्षपयितुं परैः ।
इच्छमानौ पुनरिमौ हन्येतां सामरं जगत् ।। ४६ ।।
‘ये दोनों महाधनुर्धर वीर युद्धमें दूसरे किन्हीं योद्धाओंके द्वारा नहीं मारे जा सकते। परंतु यदि ये दोनों चाहें तो देवताओंसहित सम्पूर्ण जगत्‌का विनाश कर सकते हैं’ ।। ४६ ।।
इत्यब्रुवन् महाराज दृष्ट्वा तौ पुरुषर्षभौ ।
अन्तर्हितानि भूतानि प्रकाशानि च सर्वशः ।। ४७ ।।