भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1417

महाराज! उन दोनों पुरुषप्रवर वीरोंको देखकर आकाशमें छिपे हुए तथा प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले प्राणी भी सब ओर यही बातें कह रहे थे ॥ ४७ ॥ ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं प्रादुश्चक्रे महामतिः । संतापयन् रणे पार्थं भूतान्यन्तर्हितानि च ॥ ४८ ॥ तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् द्रोणाचार्यने रणभूमिमें अर्जुनको तथा आकाशवर्ती अदृश्य प्राणियोंको संताप देते हुए ब्रह्मास्त्र प्रकट किया ॥ ४८ ॥ ततश्चचाल पृथिवी सपर्वतवनद्रुमा । ववौ च विषमो वायुः सागराश्चापि चुक्षुभुः ॥ ४९ ॥ फिर तो पर्वत, वन और वृक्षोंसहित धरती डोलने लगी, आँधी उठ गयी और समुद्रोंमें ज्वार आ गया ॥ ४९ ॥ ततस्त्रासो महानासीत् कुरुपाण्डवसेनयोः । सर्वेषां चैव भूतानामुद्यतेऽस्त्रे महात्मना ॥ ५० ॥ महामना द्रोणके द्वारा ब्रह्मास्त्रके उठाये जाते ही कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंपर तथा समस्त प्राणियोंमें बड़ा भारी आतंक छा गया ॥ ५० ॥ ततः पार्थोऽप्यसम्भ्रान्तस्तदस्त्रं प्रतिजघ्निवान् । ब्रह्मास्त्रेणैव राजेन्द्र ततः सर्वमशीशमत् ॥ ५१ ॥ राजेन्द्र! तब अर्जुनने भी बिना किसी घबराहटके ब्रह्मास्त्रसे ही द्रोणाचार्यके उस अस्त्रको दबा दिया; फिर सारा उपद्रव शान्त हो गया ॥ ५१ ॥ यदा न गम्यते पारं तयोरन्यतरस्य वा । ततः संकुलयुद्धेन तद् युद्धं व्याकुलीकृतम् ॥ ५२ ॥ जब द्रोणाचार्य और अर्जुनमेंसे कोई भी किसीको परास्त न कर सका, तब सामूहिक युद्धके द्वारा उस संग्रामको व्यापक बना दिया गया ॥ ५२ ॥ नाज्ञायत ततः किंचित् पुनरेव विशाम्पते । प्रवृत्ते तुमुले युद्धे द्रोणपाण्डवयोर्मृधे ॥ ५३ ॥ प्रजानाथ! रणभूमिमें द्रोणाचार्य और अर्जुनमें घमासान युद्ध छिड़ जानेपर फिर किसीको कुछ सूझ नहीं रहा था ॥ ५३ ॥ (द्रोणो मुक्त्वा रणे पार्थं पञ्चालानन्वधावत । अर्जुनोऽपि रणे द्रोणं त्यक्त्वा प्राद्रावयत् कुरून् ॥ द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें अर्जुनको छोड़कर पांचालोंपर धावा किया और अर्जुनने भी वहाँ द्रोणाचार्यका मुकाबला छोड़कर कौरव-सैनिकोंको वेगपूर्वक खदेड़ना आरम्भ किया। शरौघैरथ ताभ्यां तु छायाभूतं महामृधे । तुमुलं प्रबभौ राजन् सर्वस्य जगतो भयम् ॥)