भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1423

यत्र युध्यामहे सर्वे धनलोभात् समागताः । हमें धनसे या धन पानेकी इच्छासे क्या प्रयोजन है? जो हम सब लोग यहाँ धनके लोभसे एकत्र होकर जूझ रहे हैं ॥ २९ १/२ ॥

संजय उवाच

तं तथावादिनं तत्र राजानं माधवोऽब्रवीत् ॥ ३० ॥ एवंवृत्तं सदा क्षात्रं युध्यन्तीह गुरून्नपि । यदि तेऽहं प्रियो राजन् जहि मां मा चिरं कृथाः ॥ ३१ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! ऐसी बात कहनेवाले राजा दुर्योधनसे सात्यकिने इस प्रकार कहा—'राजन्! क्षत्रियोंका सनातन आचार ही ऐसा है कि वे यहाँ गुरुजनोंके साथ भी युद्ध करते हैं। यदि मैं तुम्हारा प्रिय हूँ तो तुम मुझे शीघ्र मार डालो, विलम्ब न करो ॥ ३०-३१ ॥

त्वत्कृते सुकृताँल्लोकान् गच्छेयं भरतर्षभ । या ते शक्तिर्बलं यच्च तत् क्षिप्रं मयि दर्शय ॥ ३२ ॥ नेच्छामि तदहं द्रष्टुं मित्राणां व्यसनं महत् । 'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे ऐसा करनेपर मैं पुण्यवानोंके लोकोंमें जाऊँगा। तुममें जितनी शक्ति और बल है, वह सब शीघ्र मेरे ऊपर दिखाओ; क्योंकि मैं अपने मित्रोंका वह महान् संकट नहीं देखना चाहता हूँ' ॥ ३२ १/२ ॥

इत्येवं व्यक्तमाभाष्य प्रतिभाष्य च सात्यकिः ॥ ३३ ॥ अभ्ययात् तूर्णमव्यग्रो दयां नाकुरुतात्मनि । इस प्रकार स्पष्ट बोलकर दुर्योधनकी बातका उत्तर दे सात्यकि निःशंक होकर तुरंत आगे बढ़े, उन्होंने अपने ऊपर दया नहीं दिखायी ॥ ३३ १/२ ॥

तमायान्तं महाबाहुं प्रत्यगृह्णात् तवात्मजः ॥ ३४ ॥ शरैश्चावाकिरद् राजन् शैनेयं तनयस्तव । राजन्! सामने आते हुए उन महाबाहु सात्यकिको आपके पुत्रने रोका और उन्हें बाणोंसे ढक दिया ॥ ३४ १/२ ॥

ततः प्रवृत्ते युद्धं कुरुमाधवसिंहयोः ॥ ३५ ॥ अन्योन्यं क्रुद्धयोर्घोरं यथा द्विरदसिंहयोः । तदनन्तर हाथी और सिंहके समान क्रोधमें भरे हुए उन कुरुवंशी और मधुवंशी सिंहोंमें परस्पर घोर युद्ध होने लगा ॥ ३५ १/२ ॥

ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः सात्वतं युद्धदुर्मदम् ॥ ३६ ॥ दुर्योधनः प्रत्यविध्यत् कुपितो दशभिः शरैः ।