महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1424, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्पश्चात् कुपित हुए दुर्योधनने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये दस बाणोंद्वारा रणदुर्मद सात्यकिको घायल कर दिया ।। ३६ १/२ ।। तं सात्यकिः प्रत्यविध्यत् तथैवावाकिरच्छरैः ।। ३७ ।। पञ्चाशता पुनश्चाजौ त्रिंशता दशभिश्च ह । इसी प्रकार सात्यकिने भी युद्धस्थलमें पहले पचास, फिर तीस और फिर दस बाणोंद्वारा दुर्योधनको बींध डाला और उसे भी अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ।। सात्यकिं तु रणे राजन् प्रहसंस्तनयस्तव ।। ३८ ।। आकर्णपूर्णैर्निशितैर्विव्याध त्रिंशता शरैः । राजन्! तब हँसते हुए आपके पुत्रने धनुषको कानतक खींचकर छोड़े हुए तीस तीखे बाणोंद्वारा रणभूमिमें सात्यकिको क्षत-विक्षत कर डाला ।। ३८ १/२ ।। ततोऽस्य सशरं चापं क्षुरप्रेण द्विधाच्छिनत् ।। ३९ ।। सोऽन्यत् कार्मुकमादाय लघुहस्तस्ततो दृढम् । सात्यकिर्व्यसृजच्चापि शरश्रेणीं सुतस्य ते ।। ४० ।। इसके बाद उसने क्षुरप्रसे सात्यकिके बाणसहित धनुषको काटकर उसके दो टुकड़े कर डाले। तब सात्यकिने दूसरा सुदृढ़ धनुष हाथमें लेकर शीघ्रतापूर्वक हाथ चलाते हुए वहाँ आपके पुत्रपर बाणोंकी श्रेणियाँ बरसानी आरम्भ कर दीं ।। ३९-४० ।। तामापतन्तीं सहसा शरश्रेणीं जिघांसया । चिच्छेद बहुधा राजा तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ।। ४१ ।। वधके लिये अपने ऊपर सहसा आती हुई उन बाण पंक्तियोंके राजा दुर्योधनने अनेक टुकड़े कर डाले; इससे सब लोग हर्षध्वनि करने लगे ।। ४१ ।। सात्यकिं च त्रिसप्तत्या पीडयामास वेगितः । स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैराकर्णपूर्णनिःसृतैः ।। ४२ ।। फिर शिलापर साफ किये हुए सुनहरी पाँखवाले तिहत्तर बाणोंसे, जो धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये थे, दुर्योधनने वेगपूर्वक सात्यकिको पीड़ित कर दिया ।। तस्य संदधतश्चेषुं संहितेषुं च कार्मुकम् । आच्छिनत् सात्यकिस्तूर्णं शरैश्चाप्यविव्यधत् ।। ४३ ।। तब सात्यकिने संधान करते हुए दुर्योधनके बाणको और जिसपर वह बाण रखा गया था उस धनुषको तुरंत ही काट डाला तथा बहुत-से बाण मारकर दुर्योधनको भी घायल कर दिया ।। ४३ ।। स गाढविद्धो व्यथितः प्रत्यपायाद् रथान्तरे । दुर्योधनो महाराज दाशार्हशरपीडितः ।। ४४ ।। महाराज! उस समय दुर्योधन सात्यकिके बाणोंसे गहरी चोट खाकर पीड़ित एवं व्यथित हो उठा और रथके भीतर चला गया ।। ४४ ।।