भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1449, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1449

क्रूरमायोधनं जज्ञे तस्मिन् राजसमागमे । रुद्रस्येव हि क्रुद्धस्य निघ्नतस्तान् पशून् पुरा ॥ ७ ॥ राजाओंमें वह संघर्ष छिड़ जानेपर उस युद्ध-स्थलमें क्रूरताका ताण्डव होने लगा। जैसे पूर्व (प्रलय) कालमें क्रोधमें भरे हुए रुद्रदेवके द्वारा पशुओं (प्राणियों)-का संहार होते समय निर्दयताका दृश्य उपस्थित हुआ था ॥ ७ ॥ हस्तानामुत्तमाङ्गानां कार्मुकाणां च भारत । छत्राणां चापविद्धानां चामराणां च संचयैः ॥ ८ ॥ राशयः स्म व्यदृश्यन्त तत्र तत्र रणाजिरे । भारत! कटकर गिरे हुए हाथों, मस्तकों, धनुषों, छत्रों और चँवरोंके संग्रहोंसे उस समरांगणके विभिन्न प्रदेशोंमें उक्त वस्तुओंके ढेर-के-ढेर दिखायी दे रहे थे ॥ भग्नचक्रै रथैश्चापि पातितैश्च महाध्वजैः ॥ ९ ॥ सादिभिश्च हतैः शूरैः संकीर्णा वसुधाभवत् । टूटे पहियेवाले रथों, गिराये हुए विशाल ध्वजों और मारे गये शूरवीर घुड़सवारोंसे वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी ॥ ९ १/२ ॥ बाणपातनिकृत्तास्तु योधास्ते कुरुसत्तम ॥ १० ॥ चेष्टन्तो विविधाश्चेष्टा व्यदृश्यन्त महाहवे । कुरुश्रेष्ठ! बाणोंके आघातसे कटे हुए योद्धा उस महासमरमें अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते और छटपटाते दिखायी देते थे ॥ १० १/२ ॥ वर्तमाने तथा युद्धे घोरे देवासुरोपमे ॥ ११ ॥ अब्रवीत् क्षत्रियांस्तत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः । अभिद्रवत संयत्ताः कुम्भयोनिं महारथाः ॥ १२ ॥ देवासुर-संग्रामके समान जब वह घोर युद्ध चल रहा था, उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने अपने पक्षके क्षत्रिय योद्धाओंसे इस प्रकार कहा—'महारथियो! तुम सब लोग पूर्णतः सावधान होकर द्रोणाचार्यपर धावा करो ॥ एषो हि पार्षतो वीरो भारद्वाजेन संगतः । घटते च यथाशक्ति भारद्वाजस्य नाशने ॥ १३ ॥ 'ये वीर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यके साथ जूझ रहे हैं और उनके विनाशके लिये यथाशक्ति चेष्टा कर रहे हैं ॥ १३ ॥ यादृशानि हि रूपाणि दृश्यन्तेऽस्य महारणे । अद्य द्रोणं रणे क्रुद्धो घातयिष्यति पार्षतः ॥ १४ ॥ ते यूयं सहिता भूत्वा युध्यध्वं कुम्भसम्भवम् ।

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