भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1450, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1450

'आज महासमरमें इनके जैसे रूप दिखायी देते हैं, उनसे यह ज्ञात होता है कि रणभूमिमें कुपित हुए धृष्टद्युम्न सब प्रकारसे द्रोणाचार्यका वध कर डालेंगे। इसलिये तुम सब लोग एक साथ होकर कुम्भजन्मना द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करो' ॥ १४ १/२ ॥
युधिष्ठिरसमाज्ञाप्ताः सृञ्जयानां महारथाः ॥ १५ ॥
अभ्यद्रवन्त संयत्ता भारद्वाजजिघांसवः ।
युधिष्ठिरकी यह आज्ञा पाकर सृंजय महारथी द्रोणाचार्यको मार डालनेकी अभिलाषासे पूर्ण सावधान हो उनपर टूट पड़े ॥ १५ १/२ ॥
तान् समापततः सर्वान् भारद्वाजो महारथः ॥ १६ ॥
अभ्यवर्तत वेगेन मर्तव्यमिति निश्चितः ।
महारथी द्रोणाचार्यने मरनेका निश्चय करके उन समस्त आक्रमणकारियोंका बड़े वेगसे सामना किया ॥
प्रयाते सत्यसंधे तु समकम्पत मेदिनी ॥ १७ ॥
ववुर्वाताः सनिर्घातास्त्रासयाना वरूथिनीम् ।
सत्यप्रतिज्ञ द्रोणाचार्यके आगे बढ़ते ही पृथ्वी काँपने लगी और वज्रपातकी आवाजके साथ ही प्रचण्ड आँधी चलने लगी, जो सारी सेनाको डरा रही थी ॥
पपात महती चोल्का आदित्यान्निश्चरन्त्युत ॥ १८ ॥
दीपयन्ती उभे सेने शंसन्तीव महत् भयम् ।
सूर्यमण्डलसे बड़ी भारी उल्का निकलकर दोनों सेनाओंको प्रकाशित करती और महान् भयकी सूचना-सी देती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १८ १/२ ॥
जज्वलुश्चैव शस्त्राणि भारद्वाजस्य मारिष ॥ १९ ॥
रथाः स्वनन्ति चात्यर्थं हयाश्चाश्रुण्यवासृजन् ।
माननीय नरेश! द्रोणाचार्यके शस्त्र जलने लगे, रथसे बड़े जोरकी आवाज उठने लगी और घोड़े आँसू बहाने लगे ॥ १९ १/२ ॥
हतौजा इव चाप्यासीद् भारद्वाजो महारथः ॥ २० ॥
प्रास्फुरन्नयनं चास्य वामं बाहुस्तथैव च ।
महारथी द्रोणाचार्य उस समय तेजोहिन-से हो रहे थे। उनकी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही थी ॥
विमनाश्चाभवद् युद्धे दृष्ट्वा पार्षतमग्रतः ॥ २१ ॥
ऋषीणां ब्रह्मवादानां स्वर्गस्य गमनं प्रति ।
सुयुद्धेन ततः प्राणानुत्स्रष्टुमुपचक्रमे ॥ २२ ॥
वे युद्धमें अपने सामने धृष्टद्युम्नको देखकर मन-ही-मन उदास हो गये। साथ ही ब्रह्मवादी महर्षियोंके ब्रह्मलोकमें चलनेके सम्बन्धमें कहे हुए वचनोंका स्मरण करके उन्होंने उत्तम युद्धके द्वारा अपने प्राणोंको त्याग देनेका विचार किया ॥ २१-२२ ॥