भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1455

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ज्योतिर्भूतो महातपाः ।
स्मरित्वा देवदेवेशमक्षरं परमं प्रभुम् ।। ५२ ।।
दिवमाक्रामदाचार्यः साक्षात् सद्भिर्दुराक्रमाम् ।
उन्होंने मुँहको कुछ ऊपर उठाकर छातीको आगेकी ओर स्थिर किया। फिर विशुद्ध सत्त्वमें स्थित हो नेत्र बंद करके हृदयमें धारणाको दृढ़तापूर्वक धारण किया। साथ ही 'ओम्' इस एकाक्षर ब्रह्मका जप करते हुए वे महातपस्वी आचार्य द्रोण प्रणवके अर्थभूत देवदेवेश्वर अविनाशी परम प्रभु परमात्माका चिन्तन करते-करते ज्योतिःस्वरूप हो साक्षात् उस ब्रह्मलोकको चले गये, जहाँ पहुँचना बड़े-बड़े संतोंके लिये भी दुर्लभ है ।। ५१-५२ ½ ।।
द्वौ सूर्याविति नो बुद्धिरासीत् तस्मिंस्तथागते ।। ५३ ।।
आचार्य द्रोणके उस प्रकार उत्क्रमण करनेपर हमें ऐसा भान होने लगा, मानो आकाशमें दो सूर्य उदित हो गये हों ।। ५३ ।।
एकाग्रमिव चासीच्च ज्योतिर्भिः पूरितं नभः ।
समपद्यत चार्काभे भारद्वाजदिवाकरे ।। ५४ ।।
सूर्यके समान तेजस्वी द्रोणाचार्यरूपी दिवाकरके उदित होनेपर सारा आकाश तेजसे परिपूर्ण हो उस ज्योतिके साथ एकाग्र-सा हो रहा था ।। ५४ ।।