भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1456

निमेषमात्रेण च तज्ज्योतिरन्तरधीयत । आसीत् किलकिलाशब्दः प्रहृष्टानां दिवौकसाम् ॥ ५५ ॥ ब्रह्मलोकगते द्रोणे धृष्टद्युम्ने च मोहिते । पलक मारते-मारते वह ज्योति आकाशमें जाकर अदृश्य हो गयी। द्रोणाचार्यके ब्रह्मलोक चले जाने और धृष्टद्युम्नके अपमानसे मोहित हो जानेपर हर्षोल्लाससे भरे हुए देवताओंका कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ ५५ १/२ ॥ वयमेव तदाद्राक्ष्म पञ्च मानुषयोनयः ॥ ५६ ॥ योगयुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् । अहं धनंजयः पार्थो कृपः शारद्वतस्तथा ॥ ५७ ॥ वासुदेवश्च वार्ष्णेयो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः । उस समय मैं, कुन्तीपुत्र अर्जुन, शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य, वृष्णिवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर—इन पाँच मनुष्योंने ही योगयुक्त महात्मा द्रोणको परम धामकी ओर जाते देखा था ॥ अन्ये तु सर्वे नापश्यन् भारद्वाजस्य धीमतः ॥ ५८ ॥ महिमानं महाराज योगयुक्तस्य गच्छतः । महाराज! अन्य सब लोगोंने योगयुक्त हो ऊर्ध्वगतिको जाते हुए बुद्धिमान् द्रोणाचार्यकी महिमाका साक्षात्कार नहीं किया ॥ ५८ १/२ ॥ ब्रह्मलोकं महत् दिव्यं देवगुह्यं हि तत् परम् ॥ ५९ ॥ गतिं परमिकां प्राप्तमजानन्तो नृयोनयः । नापश्यन् गच्छमानं हि तं सार्धमृषिपुङ्गवैः ॥ ६० ॥ आचार्यं योगमास्थाय ब्रह्मलोकमरिंदमम् । ब्रह्मलोक महान्, दिव्य, देवगुह्य, उत्कृष्ट तथा परम गतिस्वरूप है। शत्रुदमन आचार्य द्रोण योगका आश्रय लेकर श्रेष्ठ महर्षियोंके साथ उसी ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए हैं। अज्ञानी मनुष्योंने उन्हें वहाँ जाते समय नहीं देखा था ॥ वितुन्नाङ्गं शरव्रातैर्न्यस्तायुधमसृक्क्षरम् ॥ ६१ ॥ धिक्कृतः पार्षदस्तं तु सर्वभूतैः परामृशत् । उनका सारा शरीर बाणसमूहोंसे क्षत-विक्षत हो गया था। उससे रक्तकी धारा बह रही थी और वे अपना अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल चुके थे। उस दशामें धृष्टद्युम्नने उनके शरीरका स्पर्श किया। उस समय सारे प्राणी उन्हें धिक्कार रहे थे ॥ ६१ १/२ ॥ तस्य मूर्धानमालम्ब्य गतसत्त्वस्य देहिनः ॥ ६२ ॥ किंचिदब्रुवतः कायाद् विचकर्तासिना शिरः ।