महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1459, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआकर्णपलितः श्यामो वयसाशीतिपञ्चकः ।। ६४ ।।
त्वत्कृते व्यचरत् संख्ये स तु षोडशवर्षवत् ।
आचार्यके शरीरका रंग साँवला था। उनकी अवस्था चार सौ वर्षकी हो चुकी थी और उनके ऊपरसे लेकर कानतकके बाल सफेद हो गये थे, तो भी आपके हितके लिये वे संग्राममें सोलह वर्षकी उम्रवाले तरुणके समान विचरते थे ।। ६४ १/२ ।।
उक्तवांश्च महाबाहुः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। ६५ ।।
जीवन्तमानयाचार्यं मा वधीर्द्रुपदात्मज ।
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सैनिकाश्च ह ।। ६६ ।।
यद्यपि उस समय महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुनने बहुत कहा—'ओ द्रुपदकुमार! तुम आचार्यको जीते-जी ले आओ। उनका वध न करना।' आपके सैनिक भी बारंबार कहते ही रह गये कि 'न मारो, न मारो' ।। ६५-६६ ।।
उत्क्रोशन्नर्जुनश्चैव सानुक्रोशस्तमाव्रजत् ।
क्रोशमानेऽर्जुने चैव पार्थिवेषु च सर्वशः ।। ६७ ।।
धृष्टद्युम्नोऽवधीद् द्रोणं रथतल्पे नरर्षभम् ।
अर्जुन तो दयावश चिल्लाते हुए धृष्टद्युम्नके पास आने लगे। परंतु उनके तथा अन्य सब राजाओंके पुकारते रहनेपर भी धृष्टद्युम्नने रथकी बैठकमें नरश्रेष्ठ द्रोणका वध कर ही डाला ।। ६७ १/२ ।।
शोणितेन परिक्लिन्नो रथाद् भूमिमथापतत् ।। ६८ ।।
लोहिताङ्ग इवादित्यो दुर्धर्षः समपद्यत ।
दुर्धर्ष द्रोणाचार्यका शरीर खूनसे लथपथ हो रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो लाल अंगकान्तिवाले सूर्य डूब गये हों ।। ६८ १/२ ।।
एवं तं निहतं संख्ये ददृशे सैनिको जनः ।। ६९ ।।
धृष्टद्युम्नस्तु तद् राजन् भारद्वाजशिरोऽहरत् ।
तावकानां महेष्वासः प्रमुखे तत् समाक्षिपत् ।। ७० ।।
इस प्रकार सब सैनिकोंने द्रोणाचार्यका मारा जाना अपनी आँखोंसे देखा। राजन्! महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यका वह सिर उठा लिया और उसे आपके पुत्रोंके सामने फेंक दिया ।। ६९-७० ।।
ते तु दृष्ट्वा शिरो राजन् भारद्वाजस्य तावकाः ।
पलायनकृतोत्साहा दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ।। ७१ ।।
महाराज! द्रोणाचार्यके उस कटे हुए सिरको देखकर आपके सारे सैनिकोंने केवल भागनेमें ही उत्साह दिखाया और वे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ।। ७१ ।।
द्रोणस्तु दिवमास्थाय नक्षत्रपथमाविशत् ।
अहमेव तदाद्राक्षं द्रोणस्य निधनं नृप ।। ७२ ।।