भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1460

ऋषेः प्रसादात् कृष्णस्य सत्यवत्याः सुतस्य च । नरेश्वर! द्रोणाचार्य आकाशमें पहुँचकर नक्षत्रोंके पथमें प्रविष्ट हो गये। उस समय सत्यवतीनन्दन महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनके प्रसादसे मैंने भी द्रोणाचार्यकी वह दिव्य मृत्यु प्रत्यक्ष देख ली ।। ७२ ½ ।। विधूममिह संयान्तीमुल्कां प्रज्वलितामिव ।। ७३ ।। अपश्याम दिवं स्तब्ध्वा गच्छन्तं तं महाद्युतिम् । महातेजस्वी द्रोण जब आकाशको स्तब्ध करके ऊपरको जा रहे थे, उस समय हमलोगोंनें यहाँसे उन्हें एक स्थानसे दूसरे स्थानको जाती हुई धूमरहित प्रज्वलित उल्काके समान देखा था ।। ७३ ½ ।। हते द्रोणे निरुत्साहान् कुरून् पाण्डवसृञ्जयाः ।। ७४ ।। अभ्यद्रवन् महावेगास्ततः सैन्यं व्यदीर्यत । द्रोणाचार्यके मारे जानेपर कौरव-सैनिक युद्धका उत्साह खो बैठे, फिर पाण्डवों और सृञ्जयोंने उनपर बड़े वेगसे आक्रमण कर दिया। इससे कौरव-सेनामें भगदड़ मच गयी ।। ७४ ½ ।। निहता हतभूयिष्ठाः संग्रामे निशितैः शरैः ।। ७५ ।। तावका निहते द्रोणे गतासव इवाभवन् । युद्धमें आपके बहुत योद्धा तीखे बाणोंद्वारा मारे गये थे और बहुत-से अधमरे हो रहे थे। द्रोणाचार्यके मारे जानेपर वे सभी निष्प्राण-से हो गये ।। ७५ ½ ।। पराजयमथावाप्य परत्र च महद् भयम् ।। ७६ ।। उभयेनैव ते हीना नाविन्दन् धृतिमात्मनः । इस लोकमें पराजय और परलोकमें महान् भय पाकर दोनों ही लोकोंसे वंचित हो वे अपने भीतर धैर्य न धारण कर सके ।। ७६ ½ ।। अन्विच्छन्तः शरीरं तु भारद्वाजस्य पार्थिवाः ।। ७७ ।। नान्वगच्छन् महाराज कबन्धायुतसंकुले । महाराज! हमारे पक्षके राजाओंने द्रोणाचार्यके शरीरको बहुत खोजा, परंतु हजारों लाशोंसे भरे हुए युद्धस्थलमें वे उसे पा न सके ।। ७७ ½ ।। पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा परत्र च महद् यशः ।। ७८ ।। बाणशङ्खरवांश्चक्रुः सिंहनादांश्च पुष्कलान् । पाण्डव इस लोकमें विजय और परलोकमें महान् यश पाकर वे धनुषपर बाण रखकर उसकी टंकार करने, शंख बजाने और बारंबार सिंहनाद करने लगे ।। भीमसेनस्ततो राजन् धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।। ७९ ।। वरूथिन्यामन्नृत्येतां परिष्वज्य परस्परम् ।