महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1461, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! तदनन्तर भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर सेनाके बीचमें हर्षके मारे नाचने लगे ॥ ७९ १/२ ॥ अब्रवीच्च तदा भीमः पार्षतं शत्रुतापनम् ॥ ८० ॥ भूयोऽहं त्वां विजयिनं परिष्वक्ष्यामि पार्षत । सूतपुत्रे हते पापे धार्तराष्ट्रे च संयुगे ॥ ८१ ॥ उस समय भीमसेनने शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नसे कहा—'द्रुपदनन्दन! जब सूतपुत्र कर्ण और पापी दुर्योधन मारे जायँगे, उस समय विजयी हुए तुमको मैं फिर इसी प्रकार छातीसे लगाऊँगा' ॥ ८०-८१ ॥ एतावदुक्त्वा भीमस्तु हर्षेण महता युतः । बाहुशब्देन पृथिवीं कम्पयामास पाण्डवः ॥ ८२ ॥ इतना कहकर अत्यन्त हर्षमें भरे हुए पाण्डुनन्दन भीमसेन अपनी भुजाओंपर ताल ठोककर पृथ्वीको कम्पित-सी करने लगे ॥ ८२ ॥ तस्य शब्देन वित्रस्ताः प्राद्रवंस्तावका युधि । क्षत्रधर्मं समुत्सृज्य पलायनपरायणाः ॥ ८३ ॥ उनके उस शब्दसे भयभीत हो आपके सारे सैनिक युद्धसे भाग चले। वे क्षत्रियधर्मको छोड़कर पीठ दिखाने लग गये ॥ ८३ ॥ पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा हृष्टा ह्यासन् विशाम्पते । अरिक्षयं च संग्रामे तेन ते सुखमाप्नुवन् ॥ ८४ ॥ प्रजानाथ! पाण्डव विजय पाकर हर्षसे खिल उठे। संग्राममें जो शत्रुओंका भारी संहार हुआ था, उससे उन्हें बड़ा सुख मिला ॥ ८४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि द्रोणवधे द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें द्रोणवधविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥