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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

राजन्! तदनन्तर भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर सेनाके बीचमें हर्षके मारे नाचने लगे ॥ ७९ १/२ ॥ अब्रवीच्च तदा भीमः पार्षतं शत्रुतापनम् ॥ ८० ॥ भूयोऽहं त्वां विजयिनं परिष्वक्ष्यामि पार्षत । सूतपुत्रे हते पापे धार्तराष्ट्रे च संयुगे ॥ ८१ ॥ उस समय भीमसेनने शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नसे कहा—'द्रुपदनन्दन! जब सूतपुत्र कर्ण और पापी दुर्योधन मारे जायँगे, उस समय विजयी हुए तुमको मैं फिर इसी प्रकार छातीसे लगाऊँगा' ॥ ८०-८१ ॥ एतावदुक्त्वा भीमस्तु हर्षेण महता युतः । बाहुशब्देन पृथिवीं कम्पयामास पाण्डवः ॥ ८२ ॥ इतना कहकर अत्यन्त हर्षमें भरे हुए पाण्डुनन्दन भीमसेन अपनी भुजाओंपर ताल ठोककर पृथ्वीको कम्पित-सी करने लगे ॥ ८२ ॥ तस्य शब्देन वित्रस्ताः प्राद्रवंस्तावका युधि । क्षत्रधर्मं समुत्सृज्य पलायनपरायणाः ॥ ८३ ॥ उनके उस शब्दसे भयभीत हो आपके सारे सैनिक युद्धसे भाग चले। वे क्षत्रियधर्मको छोड़कर पीठ दिखाने लग गये ॥ ८३ ॥ पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा हृष्टा ह्यासन् विशाम्पते । अरिक्षयं च संग्रामे तेन ते सुखमाप्नुवन् ॥ ८४ ॥ प्रजानाथ! पाण्डव विजय पाकर हर्षसे खिल उठे। संग्राममें जो शत्रुओंका भारी संहार हुआ था, उससे उन्हें बड़ा सुख मिला ॥ ८४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि द्रोणवधे द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें द्रोणवधविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥

(नारायणास्त्रमोक्षपर्व)

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(नारायणास्त्रमोक्षपर्व)

त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

कौरव-सैनिकों तथा सेनापतियोंका भागना, अश्वत्थामाके पूछनेपर कृपाचार्यका उसे द्रोणवधका वृत्तान्त सुनाना

संजय उवाच

ततो द्रोणे हते राजन् कुरवः शस्त्रपीडिताः ।
हतप्रवीरा विध्वस्ता भृशं शोकपरायणाः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! द्रोणाचार्यके मारे जानेपर शस्त्रोंके आघातसे पीड़ित हुए कौरव अपने प्रमुख वीरोंके मारे जानेसे भारी विध्वंसको प्राप्त हो अत्यन्त शोकमग्न हो गये ॥ १ ॥

उदीर्णांश्च परान् दृष्ट्वा कम्पमानाः पुनः पुनः ।
अश्रुपूर्णेक्षणास्त्रस्ता दीनास्त्वासन् विशाम्पते ॥ २ ॥
प्रजानाथ! शत्रुओंको उत्कर्ष प्राप्त करते देख वे दीन और भयभीत हो बारंबार काँपने और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे ॥ २ ॥

विचेतसो हतोत्साहाः कश्मलाभिहतौजसः ।
आर्तस्वरेण महता पुत्रं ते पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
उनकी चेतना लुप्त-सी हो गयी थी। मोहवश उनका तेज और बल नष्ट हो चला था। वे हतोत्साह होकर अत्यन्त आर्तस्वरसे विलाप करते हुए आपके पुत्रको घेरकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥

रजस्वला वेपमाना वीक्षमाणा दिशो दश ।
अश्रुकण्ठा यथा दैत्या हिरण्याक्षे पुरा हते ॥ ४ ॥
पूर्वकालमें हिरण्याक्षके मारे जानेपर दैत्योंकी जैसी अवस्था हुई थी, वैसी ही उनकी भी हो गयी। वे धूल-धूसर शरीरसे काँपते हुए दसों दिशाओंकी ओर देख रहे थे। आँसुओंसे उनका गला भर आया ॥ ४ ॥

स तैः परिवृतो राजा त्रस्तैः क्षुद्रमृगैरिव ।
अशक्नुवन्नवस्थातुमपायात् तनयस्तव ॥ ५ ॥
डरे हुए क्षुद्र मृगोंके समान उन सैनिकोंसे घिरा हुआ आपका पुत्र राजा दुर्योधन वहाँ खड़ा न रह सका। वह भागकर अन्यत्र चला गया ॥ ५ ॥

क्षुत्पिपासापरम्लानास्ते योधास्तव भारत।
आदित्येनेव संतप्ता भृशं विमनसोऽभवन् ॥ ६ ॥
भारत! आपके सभी सैनिक भूख-प्याससे व्याकुल एवं मलिन हो रहे थे, मानो सूर्यने उन्हें अपनी प्रचण्ड किरणोंसे झुलस दिया हो। वे अत्यन्त उदास हो गये थे ॥ ६ ॥
भास्करस्येव पतनं समुद्रस्येव शोषणम्।
विपर्यासं यथा मेरोर्वासवस्येव निर्जयम् ॥ ७ ॥
अमर्षणीयं तद् दृष्ट्वा भारद्वाजस्य पातनम्।
त्रस्तरूपतरा राजन् कौरवाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ८ ॥
राजन्! जैसे सूर्यका पृथ्वीपर गिर पड़ना, समुद्रका सूख जाना, मेरुपर्वतका उलटी दिशामें चला जाना और इन्द्रका पराजित हो जाना असम्भव है, उसी प्रकार द्रोणाचार्यका मारा जाना भी असम्भव समझा जाता था; परंतु द्रोणाचार्यके उस असहनीय वधको सम्भव हुआ देख सारे कौरव थर्रा उठे और भयके मारे भागने लगे ॥ ७-८ ॥
गान्धारराजः शकुनिस्त्रस्तस्त्रस्ततरैः सह ।
हतं रुक्मरथं श्रुत्वा प्राद्रवत् सहितो रथैः ॥ ९ ॥
सुवर्णमय रथवाले आचार्य द्रोणके मारे जानेका समाचार सुनकर गान्धारराज शकुनि त्रस्त हो उठा और अत्यन्त डरे हुए अपने रथियोंके साथ युद्धभूमिसे भाग चला ॥
वरूथिनीं वेगवतीं विद्रुतां सपताकिनीम्।
परिगृह्य महासेनां सूतपुत्रोऽपयाद् भयात् ॥ १० ॥
सूतपुत्र कर्ण भी ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित एवं बड़े वेगसे भागी हुई अपनी विशाल सेनाको साथ ले भयके मारे वहाँसे भाग खड़ा हुआ ॥ १० ॥
रथनागाश्वकलिलां पुरस्कृत्य तु वाहिनीम्।
मद्राणामीश्वरः शल्यो वीक्षमाणोऽपयाद् भयात् ॥ ११ ॥
मद्रराज शल्य भी रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई अपनी सेनाको आगे करके भयके मारे इधर-उधर देखते हुए भागने लगे ॥ ११ ॥
हतप्रवीरैर्भूयिष्ठैर्ध्वजैर्बहुपताकिभिः ।
वृतः शारद्वतोऽगच्छत् कष्टं कष्टमिति ब्रुवन् ॥ १२ ॥
शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य बहुसंख्यक ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित बहुत-से सैनिकोंद्वारा घिरे हुए थे। उनकी सेनाके प्रमुख वीर मारे गये थे। वे भी 'हाय! बड़े कष्टकी बात है, बड़े कष्टकी बात है' ऐसा कहते हुए युद्धभूमिसे खिसक गये ॥ १२ ॥
भोजानीकेन शिष्टेन कलिङ्गारट्टबाह्लिकैः ।
कृतवर्मा वृतो राजन् प्रायात् सुजवनैर्हयैः ॥ १३ ॥
राजन्! कृतवर्मा भी भोजवंशियोंकी अवशिष्ट सेना तथा कलिंग, अरट्ट और बाह्लिकोंकी विशाल वाहिनी साथ ले अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा भाग

निकला ॥ १३ ॥ पदातिगणसंयुक्तस्त्रस्तो राजन् भयार्दितः । उलूकः प्राद्रवत् तत्र दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥ १४ ॥ नरेश्वर! द्रोणाचार्यको वहाँ मारा गया देख उलूक भी भयसे पीड़ित हो थर्रा उठा और पैदल योद्धाओंके साथ जोर-जोरसे भागने लगा ॥ १४ ॥ दर्शनीयो युवा चैव शौर्येण कृतलक्षणः । दुःशासनो भृशोद्विग्नः प्राद्रवद् गजसंवृतः ॥ १५ ॥ जिसके शरीरमें शौर्यके चिह्न बन गये थे, वह दर्शनीय युवक दुःशासन भी भयसे अत्यन्त उद्विग्न हो अपनी गजसेनाके साथ भाग खड़ा हुआ ॥ १५ ॥ रथानामयुतं गृह्य त्रिसाहस्रं च दन्तिनाम् । वृषसेनो ययौ तूर्णं दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥ १६ ॥ द्रोणाचार्य धराशायी हो गये, यह देखकर वृषसेन भी दस हजार रथों और तीन हजार हाथियोंकी सेना साथ ले तुरंत वहाँसे चल दिया ॥ १६ ॥ गजाश्वरथसंयुक्तो वृतश्चैव पदातिभिः । दुर्योधनो महाराज प्रायात् तत्र महारथः ॥ १७ ॥ महाराज! हाथी, घोड़े और रथोंकी सेनासे युक्त तथा पैदल सैनिकोंसे घिरा हुआ महारथी दुर्योधन भी रणभूमिसे भाग चला ॥ १७ ॥ संशप्तकगणान् गृह्य हतशेषान् किरीटिना । सुशर्मा प्राद्रवद् राजन् दृष्ट्वा द्रोणं निपातितम् ॥ १८ ॥ राजन्! द्रोणाचार्यको रणभूमिमें गिराया गया देख अर्जुनके मारनेसे बचे हुए संशप्तकोंको साथ ले सुशर्मा वहाँसे भाग निकला ॥ १८ ॥ गजान् रथान् समारुह्य व्युदस्य च हयाञ्जनाः । प्राद्रवन् सर्वतः संख्ये दृष्ट्वा रुक्मरथं हतम् ॥ १९ ॥ युद्धस्थलमें सुवर्णमय रथवाले द्रोणका वध हुआ देख बहुतेरे सैनिक हाथियों और रथोंपर आरूढ़ हो तथा कितने ही योद्धा अपने घोड़ोंको भी छोड़कर सब ओरसे पलायन करने लगे ॥ १९ ॥ त्वरयन्तः पितृनन्ये भ्रातॄनन्येऽथ मातुलान् । पुत्रानन्ये वयस्यांश्च प्राद्रवन् कुरवस्तदा ॥ २० ॥ कुछ कौरव पिता, ताऊ और चाचा आदिको, कुछ भाइयोंको, कुछ मामाओंको तथा कितने ही पुत्रों और मित्रोंको जल्दीसे भागनेकी प्रेरणा देते हुए उस समय मैदान छोड़कर चल दिये ॥ २० ॥ चोदयन्तश्च सैन्यानि स्वस्रीयांश्च तथापरे । सम्बन्धिनस्तथान्ये च प्राद्रवन्त दिशो दश ॥ २१ ॥

कितने ही योद्धा अपनी सेनाओंको, दूसरे लोग भानजोंको और कितने ही अपने सगे-सम्बन्धियोंको भागनेकी आज्ञा देते हुए दसों दिशाओंकी ओर भाग खड़े हुए ॥ २१ ॥

प्रकीर्णकेशा विध्वस्ता न द्वावेकत्र धावतः ।
नेदमस्तीति मन्वाना हतोत्साहा हतौजसः ॥ २२ ॥
उन सबके बाल बिखरे हुए थे। वे गिरते-पड़ते भाग रहे थे। दो सैनिक एक साथ या एक ओर नहीं भागते थे। उन्हें विश्वास हो गया था कि अब यह सेना नहीं बचेगी; इसीलिये उनके उत्साह और बल नष्ट हो गये थे ॥ २२ ॥

उत्सृज्य कवचानन्ये प्राद्रवंस्तावका विभो ।
अन्योन्यं ते समाक्रोशन् सैनिका भरतर्षभ ॥ २३ ॥
भरतश्रेष्ठ! प्रभो! आपके कितने ही सैनिक कवच उतारकर एक-दूसरेको पुकारते हुए भाग रहे थे ॥ २३ ॥

तिष्ठ तिष्ठेति न च ते स्वयं तत्रावतस्थिरे ।
धुर्यानुन्मुच्य च रथाद्धतसूतात् स्वलंकृतान् ।
अधिरुह्य हयान् योधाः क्षिप्रं पद्भिरचोदयन् ॥ २४ ॥
कुछ योद्धा दूसरोंसे 'ठहरो, ठहरो' कहते, परंतु स्वयं नहीं ठहरते थे। कितने ही योद्धा सारथिशून्य रथसे सजे-सजाये घोड़ोंको खोलकर उनपर सवार हो जाते और पैरोंसे ही शीघ्रतापूर्वक उन्हें हाँकने लगते थे ॥ २४ ॥

द्रवमाणे तथा सैन्ये त्रस्तरूपे हतौजसि ।
प्रतिस्रोत इव ग्राहो द्रोणपुत्रः परानियात् ॥ २५ ॥
इस प्रकार जब सारी सेना भयभीत हो बल और उत्साह खोकर भाग रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामा शत्रुओंकी ओर बढ़ा आ रहा था, मानो कोई ग्राह नदीके प्रवाहके प्रतिकूल जा रहा हो ॥ २५ ॥

तस्यासीत् सुमहद् युद्धं शिखण्डिप्रमुखैर्गणैः ।
प्रभद्रकैश्च पाञ्चालैश्चेदिभिश्च सकेकयैः ॥ २६ ॥
इससे पहले अश्वत्थामाका उन प्रभद्रक, पांचाल, चेदि और केकय आदि गणोंके साथ महान् युद्ध हो रहा था, जिनका प्रधान नेता शिखण्डी था (इसीलिये उसे पिताकी मृत्युका समाचार नहीं ज्ञात हुआ।) ॥ २६ ॥

हत्वा बहुविधाः सेनाः पाण्डूनां युद्धदुर्मदः ।
कथंचित् संकटान्मुक्तो मत्तद्विरदविक्रमः ॥ २७ ॥
मतवाले हाथीके समान पराक्रमी रणदुर्मद अश्वत्थामा पाण्डवोंकी विविध सेनाओंका संहार करके किसी प्रकार उस युद्ध-संकटसे मुक्त हुआ था ॥ २७ ॥

द्रवमाणं बलं दृष्ट्वा पलायनकृतक्षणम् ।
दुर्योधनं समासाद्य द्रोणपुत्रोऽब्रवीदिदम् ॥ २८ ॥

इतनेहीमें उसने देखा कि सारी कौरव-सेना भागी जा रही है और सभी लोग पलायन करनेमें उत्साह दिखा रहे हैं। तब द्रोणपुत्रने दुर्योधनके पास जाकर इस प्रकार पूछा— ॥ २८ ॥

किमियं द्रवते सेना त्रस्तरूपेव भारत ।
द्रवमाणां च राजेन्द्र नावस्थापयसे रणे ॥ २९ ॥
‘भरतनन्दन! क्यों यह सेना भयभीत-सी होकर भागी जा रही है? राजेन्द्र! इस भागती हुई सेनाको आप युद्धमें ठहरानेका प्रयत्न क्यों नहीं करते? ॥ २९ ॥

त्वं चापि न यथापूर्वं प्रकृतिस्थो नराधिप ।
कर्णप्रभृतयश्चेमे नावतिष्ठन्ति पार्थिव ॥ ३० ॥
‘नरेश्वर! तुम भी पहलेके समान स्वस्थ नहीं दिखायी देते। भूपाल! ये कर्ण आदि वीर भी रणभूमिमें खड़े नहीं हो रहे हैं। इसका क्या कारण है? ॥ ३० ॥

अन्येष्वपि च युद्धेषु नैव सेनाद्रवत् तदा ।
कच्चित् क्षेमं महाबाहो तव सैन्यस्य भारत ॥ ३१ ॥
‘अन्य संग्रामोंमें भी आपकी सेना इस प्रकार नहीं भागी थी। महाबाहु भरतनन्दन! आपकी सेना सकुशल तो है न? ॥ ३१ ॥

कस्मिन्निदं हते राजन् रथसिंहे बलं तव ।
एतामवस्थां सम्प्राप्तं तन्ममाचक्ष्व कौरव ॥ ३२ ॥
‘राजन्! कुरुनन्दन! किस सिंहके समान पराक्रमी रथीके मारे जानेपर आपकी यह सेना इस दुरवस्थाको पहुँच गयी है। यह मुझे बताइये' ॥ ३२ ॥

तत्तु दुर्योधनः श्रुत्वा द्रोणपुत्रस्य भाषितम् ।
घोरमप्रियमाख्यातुं नाशक्नोत् पार्थिवर्षभः ॥ ३३ ॥
द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी यह बात सुनकर नृपश्रेष्ठ दुर्योधन यह घोर अप्रिय समाचार स्वयं उससे न कह सका ॥ ३३ ॥

भिन्ना नौरिव ते पुत्रो मग्नः शोकमहार्णवे ।
बाष्पेणापिहितो दृष्ट्वा द्रोणपुत्रं रथे स्थितम् ॥ ३४ ॥
मानो आपके पुत्रकी नाव मझधारमें टूट गयी थी और वह शोकके समुद्रमें डूब रहा था। रथपर बैठे हुए द्रोणकुमारको देखकर उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे ॥ ३४ ॥

ततः शारद्वतं राजा सव्रीडमिदमब्रवीत् ।
शंसात्र भद्रं ते सर्वं यथा सैन्यमिदं द्रुतम् ॥ ३५ ॥
उस समय राजा दुर्योधनने कृपाचार्यसे संकोचपूर्वक कहा—'गुरुदेव! आपका कल्याण हो। आप ही वह सब समाचार बता दीजिये, जिससे यह सब सेना भागी जा रही है' ॥ ३५ ॥

अथ शारद्वतो राजन्नार्तिमाच्छन् पुनः पुनः ।

शशंस द्रोणपुत्राय यथा द्रोणो निपातितः ॥ ३६ ॥ राजन्! उस समय शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य बारंबार पीड़ाका अनुभव करते हुए जिस प्रकार द्रोणाचार्य मारे गये थे, वह समाचार उनके पुत्रको सुनाने लगे ॥ ३६ ॥

कृप उवाच

वयं द्रोणं पुरस्कृत्य पृथिव्यां प्रवरं रथम् । प्रावर्तयाम संग्रामं पञ्चालैरेव केवलम् ॥ ३७ ॥ **कृपाचार्य बोले—**वत्स! हमलोगों ने भूमण्डलके श्रेष्ठ महारथी आचार्य द्रोणको आगे करके केवल पांचालोंके साथ युद्ध आरम्भ किया था ॥ ३७ ॥

ततः प्रवृत्ते संग्रामे विमिश्राः कुरुसोमकाः । अन्योन्यमभिगर्जन्तः शस्त्रैर्देहानपातयन् ॥ ३८ ॥ युद्ध आरम्भ हो जानेपर कौरव तथा सोमकयोद्धा परस्पर मिश्रित हो गये और एक-दूसरेके निकट गर्जना करते हुए शस्त्रोंद्वारा अपने-अपने शत्रुओंके शरीरोंको धराशायी करने लगे ॥ ३८ ॥

वर्तमाने तथा युद्धे क्षीयमाणेषु संयुगे । धार्तराष्ट्रेषु संक्रुद्धः पिता तेऽस्त्रमुदैरयत् ॥ ३९ ॥ इस प्रकार युद्ध चालू होनेपर जब कौरवयोद्धा क्षीण होने लगे, तब तुम्हारे पिताने अत्यन्त कुपित होकर ब्रह्मास्त्र प्रकट किया ॥ ३९ ॥

ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं विकुर्वाणो नरर्षभः । व्यहनच्छात्रवान् भल्लैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४० ॥ ब्रह्मास्त्र प्रकट करते हुए नरश्रेष्ठ द्रोणने सैकड़ों और हजारों भल्लोंद्वारा शत्रु-सैनिकोंका संहार कर डाला ॥

पाण्डवाः केकया मत्स्याः पञ्चालाश्च विशेषतः । संख्ये द्रोणरथं प्राप्य व्यनशन् कालचोदिताः ॥ ४१ ॥ पाण्डव, केकय, मत्स्य तथा विशेषतः पांचाल योद्धा कालसे प्रेरित हो युद्धमें द्रोणाचार्यके रथके पास आकर नष्ट हो गये ॥ ४१ ॥

सहस्रं नरसिंहानां द्विसाहस्रं च दन्तिनाम् । द्रोणो ब्रह्मास्त्रयोगेन प्रेषयामास मृत्यवे ॥ ४२ ॥ द्रोणाचार्यने ब्रह्मास्त्रके प्रयोगद्वारा मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी एक हजार श्रेष्ठ योद्धाओं तथा दो हजार हाथियोंको मौतके हवाले कर दिया ॥ ४२ ॥

आकर्णपलितः श्यामो वयसाशीतिपञ्चकः । रणे पर्यचरद् द्रोणो वृद्धः षोडशवर्षवत् ॥ ४३ ॥

जिनकी अंग-कान्ति श्याम थी, जिनके कानोंतकके बाल पक गये थे तथा जो चार सौ वर्षकी अवस्था पूरे कर चुके थे, वे बूढ़े द्रोणाचार्य रणभूमिमें सोलह वर्षके तरुणकी भाँति सब ओर विचरते रहे ॥ ४३ ॥ क्लिश्यमानेषु सैन्येषु वध्यमानेषु राजसु । अमर्षवशमापन्नाः पञ्चाला विमुखाऽभवन् ॥ ४४ ॥ जब इस प्रकार सेनाएँ कष्ट पाने लगीं तब बहुत-से नरेश कालके गालमें जाने लगे, तब अमर्षमें भरे हुए पांचाल युद्धसे विमुख हो गये ॥ ४४ ॥ तेषु किंचित् प्रभग्नेषु विमुखेषु सपत्नजित् । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणो बभूवार्क इवोदितः ॥ ४५ ॥ वे कुछ हतोत्साह होकर जब युद्धसे विमुख हो गये, तब दिव्य अस्त्र प्रकट करनेवाले शत्रुविजयी द्रोणाचार्य उदित हुए सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे ॥ स मध्यं प्राप्य पाण्डूनां शररश्मिः प्रतापवान् । मध्यंगत इवादित्यो दुष्प्रेक्ष्यस्ते पिताभवत् ॥ ४६ ॥ पाण्डव-सेनाके बीचमें आकर बाणमयी रश्मियोंसे सुशोभित तुम्हारे प्रतापी पिता द्रोण दोपहरके सूर्यकी भाँति तपने लगे। उस समय उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था ॥ ४६ ॥ ते दह्यमाना द्रोणेन सूर्येणेव विराजता । दग्धवीर्या निरुत्साहा बभूवुर्गतचेतसः ॥ ४७ ॥ प्रकाशमान सूर्यके समान तेजस्वी द्रोणाचार्यद्वारा दग्ध किये जाते हुए पांचालोंके बल और पराक्रम भी दग्ध हो गये थे। वे उत्साहशून्य तथा अचेत हो गये थे ॥ तान् दृष्ट्वा पीडितान् बाणैर्द्रोणेन मधुसूदनः । जयैषी पाण्डुपुत्राणामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८ ॥ उन सबको द्रोणाचार्यके बाणोंद्वारा पीड़ित देख पाण्डवोंकी विजय चाहनेवाले मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा— ॥ ४८ ॥ नैष जातु नरैः शक्यो जेतुं शस्त्रभृतां वरः । अपि वृत्रहणा संख्ये रथयूथपयूथपः ॥ ४९ ॥ ‘ये द्रोणाचार्य शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ एवं रथयूथ-पतियोंके भी यूथपति हैं। इन्हें युद्धमें मनुष्य कदापि नहीं जीत सकते। देवराज इन्द्रके लिये भी इनपर विजय पाना असम्भव है ॥ ४९ ॥ ते यूयं धर्ममुत्सृज्य जयं रक्षत पाण्डवाः । यथा वः संयुगे सर्वान् न हन्याद् रुक्मवाहनः ॥ ५० ॥ ‘अतः पाण्डव! तुमलोग धर्मका विचार छोड़कर विजयकी रक्षाका प्रयत्न करो, जिससे सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें तुम सब लोगोंका संहार न कर सकें ॥

अश्वत्थाम्नि हते नैष युध्येदिति मतिर्मम । हतं तं संयुगे कश्चिदाख्यात्वस्मै मृषा नरः ॥ ५१ ॥ 'मेरा ऐसा विश्वास है कि अश्वत्थामाके मारे जानेपर ये युद्ध नहीं कर सकते; अतः कोई मनुष्य इनसे झूठे ही कह दे कि 'युद्धमें अश्वत्थामा मारा गया' ॥ ५१ ॥

एतन्नारोचयद् वाक्यं कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अरोचयंस्तु सर्वेऽन्ये कृच्छ्रेण तु युधिष्ठिरः ॥ ५२ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनको यह बात अच्छी नहीं लगी। परंतु और सब लोगोंको जँच गयी। युधिष्ठिर बड़ी कठिनाईसे इसके लिये तैयार हुए ॥ ५२ ॥

भीमसेनस्तु सव्रीडमब्रवीत् पितरं तव । अश्वत्थामा हत इति तं नाबुध्यत ते पिता ॥ ५३ ॥ तब भीमसेनने लजाते-लजाते तुम्हारे पितासे कहा—'अश्वत्थामा मारा गया'। परंतु उनकी इस बातपर तुम्हारे पिताको विश्वास नहीं हुआ ॥ ५३ ॥

स शङ्कमानस्तन्मिथ्या धर्मराजमपृच्छत । हतं वाप्यहतं वाऽऽजौ त्वां पिता पुत्रवत्सलः ॥ ५४ ॥ उनके मनमें यह संदेह हुआ कि यह समाचार झूठा है; अतः तुम्हारे पुत्रवत्सल पिताने युद्धभूमिमें धर्मराज युधिष्ठिरसे पूछा कि 'अश्वत्थामा मारा गया या नहीं' ॥ ५४ ॥

तमतथ्यभये मग्नो जये सक्तो युधिष्ठिरः । अश्वत्थामानमायोधे हतं दृष्ट्वा महागजम् ॥ ५५ ॥ भीमेन गिरिवर्ष्माणं मालवस्येन्द्रवर्मणः । उपसृत्य तदा द्रोणमुच्चैरिदमुवाच ह ॥ ५६ ॥ युधिष्ठिर असत्यके भयमें डूबे होनेपर भी विजयमें आसक्त थे, अतः मालवनरेश इन्द्रवर्माके पर्वताकार महान् गजराज अश्वत्थामाको भीमसेनके द्वारा युद्धस्थलमें मारा गया देख द्रोणाचार्यके पास जाकर वे उच्चस्वरसे इस प्रकार बोले— ॥ ५५-५६ ॥

यस्यार्थे शस्त्रमादत्से यमवेक्ष्य च जीवसि । पुत्रस्ते दयितो नित्यं सोऽश्वत्थामा निपातितः ॥ ५७ ॥ शेते विनिहतो भूमौ वने सिंहशिशुर्यथा ॥ ५८ ॥ 'आचार्य! तुम जिसके लिये हथियार उठाते हो और जिसका मुँह देखकर जीते हो, वह तुम्हारा सदाका प्यारा पुत्र अश्वत्थामा पृथ्वीपर मार गिराया गया है। जैसे वनमें सिंहका बच्चा सोता है, उसी प्रकार वह रणभूमिमें मरा पड़ा है' ॥ ५७-५८ ॥

जानन्नप्यनृतस्याथ दोषान् स द्विजसत्तमम् । अव्यक्तमब्रवीद् राजा हतः कुञ्जर इत्युत ॥ ५९ ॥ असत्य बोलनेके दोषोंको जानते हुए भी राजा युधिष्ठिरने द्विजश्रेष्ठ द्रोणसे वैसी बात कह दी। फिर वे अस्फुट स्वरमें बोले—'वास्तवमें इस नामका हाथी मारा गया' ॥ ५९ ॥

स त्वां निहतमाक्रन्दे श्रुत्वा संतापतापितः । नियम्य दिव्यान्यस्त्राणि नायुध्यत यथा पुरा ॥ ६० ॥ इस प्रकार युद्धमें तुम्हारे मारे जानेकी बात सुनकर वे शोकाग्निके तापसे संतप्त हो उठे और अपने दिव्यास्त्रोंका प्रयोग बंद करके उन्होंने पहलेके समान युद्ध करना छोड़ दिया ॥ ६० ॥

तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकातुरमचेतसम् । पांचालराजस्य सुतः क्रूरकर्मा समाद्रवत् ॥ ६१ ॥ उन्हें अत्यन्त उद्विग्न, शोकाकुल और अचेत हुआ देख पांचालराजका क्रूरकर्मा पुत्र धृष्टद्युम्न उनकी ओर दौड़ा ॥ ६१ ॥

तं दृष्ट्वा विहितं मृत्युं लोकतत्त्वविचक्षणः । दिव्यान्यस्त्राण्यथोत्सृज्य रणे प्रायमुपाविशत् ॥ ६२ ॥ लोकतत्त्वके ज्ञानमें निपुण आचार्य अपनी दैवविहित मृत्युरूप धृष्टद्युम्नको सामने देख दिव्यास्त्रोंका परित्याग करके आमरण उपवासका नियम ले रणभूमिमें बैठ गये ॥ ६२ ॥

ततोऽस्य केशान् सव्येन गृहीत्वा पाणिना तदा । पार्षतः क्रोशमानानां वीराणामच्छिनच्छिरः ॥ ६३ ॥ तब उस द्रुपदपुत्रने समस्त वीरोंके पुकार-पुकारकर मना करनेपर भी उनकी बातें अनसुनी करके बायें हाथसे आचार्यके केश पकड़ लिये और दाहिने हाथसे उनका सिर काट लिया ॥ ६३ ॥

न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सर्वतोऽब्रुवन् । तथैव चार्जुनो वाहादवरुह्यैनमाद्रवत् ॥ ६४ ॥ वे सब वीर चारों ओरसे यही कह रहे थे कि 'न मारो, न मारो'। अर्जुन भी यही कहते हुए अपने रथसे उतरकर उसकी ओर दौड़ पड़े ॥ ६४ ॥

उद्यम्य त्वरितो बाहुं ब्रुवाणश्च पुनः पुनः । जीवन्तमानयाचार्यं मा वधीरिति धर्मवित् ॥ ६५ ॥ वे धर्मके ज्ञाता हैं, अतः अपनी एक बाँह उठाकर बड़ी उतावलीके साथ बारंबार यह कहने लगे कि 'आचार्यको जीते-जी ले आओ, मारो मत' ॥ ६५ ॥

तथा निवार्यमाणेन कौरवैरर्जुनेन च । हत एव नृशंसेन पिता तव नरर्षभ ॥ ६६ ॥ नरश्रेष्ठ! इस प्रकार कौरवों तथा अर्जुनके रोकनेपर भी उस नृशंसने तुम्हारे पिताकी हत्या कर ही डाली ॥ ६६ ॥

सैनिकाश्च ततः सर्वे प्राद्रवन्त भयार्दिताः । वयं चापि निरुत्साहा हते पितरि तेऽनघ ॥ ६७ ॥

अनघ! इस प्रकार तुम्हारे पिताके मारे जानेपर समस्त सैनिक भयसे पीड़ित होकर भाग चले हैं और हमलोग उत्साहशून्य होकर लौटे आ रहे हैं ।। ६७ ।।

संजय उवाच

तच्छ्रुत्वा द्रोणपुत्रस्तु निधनं पितुराहवे ।
क्रोधमाहारयत् तीव्रं पदाहत इवोरगः ॥ ६८ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! युद्धमें इस प्रकार पिताके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पैरोंसे ठुकराये हुए सर्पके समान अत्यन्त कुपित हो उठा ।। ६८ ।।
ततः क्रुद्धो रणे द्रौणिर्भृशं जज्वल मारिष ।
यथेन्धनं महत् प्राप्य प्राज्वलद्धव्यवाहनः ॥ ६९ ॥
माननीय नरेश! जैसे अग्निदेव सूखे काठकी बहुत बड़ी राशि पाकर प्रचण्डरूपसे प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें अश्वत्थामा अत्यन्त क्रोधसे जलने लगा ।।
तलं तलेन निष्पिष्य दन्तैर्दन्तानुपास्पृशत् ।
निःश्वसन्नुरगो यद्वल्लोहिताक्षोऽभवत् तदा ॥ ७० ॥
उसने हाथसे हाथ मलकर दाँतोंसे दाँत पीसे और फुफकारते हुए सर्पके समान वह लंबी साँसें खींचने लगा, उस समय उसकी आँखें लाल हो गयी थीं ।। ७० ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वण्यश्वत्थामक्रोधे
त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अश्वत्थामाका क्रोधविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९३ ।।

१९४-

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चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका प्रश्न

धृतराष्ट्र उवाच

अधर्मेण हतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन संजय ।
ब्राह्मणं पितरं वृद्धमश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! अपने बूढ़े पिता ब्राह्मण द्रोणाचार्यके धृष्टद्युम्नद्वारा अधर्मपूर्वक मारे जानेका समाचार सुनकर अश्वत्थामाने क्या कहा? ॥ १ ॥

मानवं वारुणाग्नेयं ब्राह्ममस्त्रं च वीर्यवान् ।
ऐन्द्रं नारायणं चैव यस्मिन् नित्यं प्रतिष्ठितम् ॥ २ ॥
तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन संयुगे ।
श्रुत्वा निहतमाचार्यं सोऽश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ ३ ॥
जिनमें मानव, वारुण, आग्नेय, ब्राह्म, ऐन्द्र और नारायण नामक अस्त्र सदा प्रतिष्ठित थे, उन धर्मात्मा आचार्यको धृष्टद्युम्नद्वारा अधर्मपूर्वक युद्धमें मारा गया सुनकर पराक्रमी अश्वत्थामाने क्या कहा? ॥ २-३ ॥

येन रामादवाप्येह धनुर्वेदं महात्मना ।
प्रोक्तान्यस्त्राणि दिव्यानि पुत्राय गुणकाङ्क्षिणा ॥ ४ ॥
गुणोंकी अभिलाषा रखनेवाले उन महात्मा द्रोणने इस लोकमें परशुरामजीसे धनुर्वेदकी शिक्षा पाकर वे समस्त दिव्यास्त्र अपने पुत्रको भी सिखाये थे ॥ ४ ॥

एकमेव हि लोकेऽस्मिन्नात्मनो गुणवत्तरम् ।
इच्छन्ति पुरुषाः पुत्रं लोके नान्यं कथंचन ॥ ५ ॥
मनुष्य इस जगत्‌में केवल पुत्रको ही अपनेसे भी अधिक गुणवान् बनाना चाहते हैं, दूसरेको किसी प्रकार भी नहीं ॥ ५ ॥

आचार्याणां भवन्त्येव रहस्यानि महात्मनाम् ।
तानि पुत्राय वा दद्युः शिष्यायानुगताय वा ॥ ६ ॥
महात्मा आचार्योंके पास बहुत-सी रहस्यकी बातें होती हैं, जिन्हें या तो वे अपने पुत्रको दे सकते हैं या अनुगत शिष्यको ॥ ६ ॥

स शिष्यः प्राप्य तत् सर्वं सविशेषं च संजय ।
शूरः शारद्वतीपुत्रः संख्ये द्रोणादनन्तरः ॥ ७ ॥
संजय! कृपीका शूरवीर पुत्र अश्वत्थामा शिष्यभावसे विशेष रहस्यसहित सारा धनुर्वेद अपने पिता द्रोणाचार्यसे प्राप्त करके युद्धस्थलमें उनके बाद वही उस योग्यताका रह गया है ॥ ७ ॥

रामस्य तु समः शस्त्रे पुरंदरसमो युधि । कार्तवीर्यसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ ॥ ८ ॥ महीधरसमः स्थैर्ये तेजसाग्निसमो युवा । समुद्र इव गाम्भीर्ये क्रोधे चाशीविषोपमः ॥ ९ ॥ स रथी प्रथमो लोके दृढधन्वा जितक्लमः । शीघ्रोऽनिल इवाक्रन्दे चरन् क्रुद्ध इवान्तकः ॥ १० ॥ शस्त्रविद्यामें परशुरामके समान, युद्धकलामें इन्द्रके समान, बल-पराक्रममें कृतवीर्यपुत्र अर्जुनके समान, बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश, स्थिरता एवं धैर्यमें पर्वतके तुल्य, तेजमें अग्निके समान, गम्भीरतामें समुद्रके सदृश और क्रोधमें विषधर सर्पके समान नवयुवक अश्वत्थामा संसारका प्रधान रथी और सुदृढ़ धनुर्धर है। उसने श्रम और थकावटको जीत लिया है। वह संग्राममें वायुके समान वेगपूर्वक विचरनेवाला तथा क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान भयंकर है ॥ ८—१० ॥ अस्यता येन संग्रामे धरण्यभिनिपीडिता । यो न व्यथति संग्रामे वीरः सत्यपराक्रमः ॥ ११ ॥ वेदस्नातो व्रतस्नातो धनुर्वेदे च पारगः । महोदधिरिवाक्षोभ्यो रामो दाशरथिर्यथा ॥ १२ ॥ अश्वत्थामा जब रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करने लगता है, तब धरती भी अत्यन्त पीडित हो उठती है। वह सत्यपराक्रमी वीर संग्राममें कभी व्यथित नहीं होता है। वह वेदाध्ययन समाप्त करके स्नातक बन चुका है। ब्रह्मचर्यव्रतकी अवधि पूरी करके उसका भी स्नातक हो चुका है और धनुर्वेदका भी पारंगत विद्वान् है। महासागर तथा दशरथपुत्र श्रीरामके समान उसे कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता ॥ ११-१२ ॥ तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन संयुगे । श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ १३ ॥ उसी अश्वत्थामाने अपने धर्मिष्ठ पिता आचार्य द्रोणको युद्धमें धृष्टद्युम्नके हाथसे अधर्मपूर्वक मारा गया सुनकर क्या कहा? ॥ १३ ॥ धृष्टद्युम्नस्य यो मृत्युः सृष्टस्तेन महात्मना । यथा द्रोणस्य पाञ्चाल्यो यज्ञसेनसुतोऽभवत् ॥ १४ ॥ (हमने सुन रखा है कि) जैसे द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये पांचालदेशीय द्रुपदकुमारका जन्म हुआ था, उसी प्रकार महात्मा द्रोणने धृष्टद्युम्नकी मृत्युके लिये अश्वत्थामाको जन्म दिया था ॥ १४ ॥ तं नृशंसेन पापेन क्रूरेणादीर्घदर्शिना । श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ १५ ॥

उस नृशंस, पापी, क्रूर और अदूरदर्शी धृष्टद्युम्नके हाथसे आचार्यका वध हुआ सुनकर अश्वत्थामाने क्या कहा? ।। १५ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृतराष्ट्रप्रश्ने
चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृतराष्ट्रप्रश्नविषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९४ ।।

१९५-

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पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

अश्वत्थामाके क्रोधपूर्ण उद्गार और उसके द्वारा नारायणास्त्रका प्राकट्य

संजय उवाच

छद्मना निहतं श्रुत्वा पितरं पापकर्मणा ।
बाष्पेणापूर्यत द्रौणि रोषेण च नरर्षभ ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! पापी धृष्टद्युम्नने मेरे पिताको छलसे मार डाला है, यह सुनकर अश्वत्थामाके नेत्रोंमें आँसू भर आये। फिर वह रोषसे जल उठा ॥ १ ॥

तस्य क्रुद्धस्य राजेन्द्र वपुर्दीप्तमदृश्यत ।
अन्तकस्येव भूतानि जिहीर्षोः कालपर्यये ॥ २ ॥
राजेन्द्र! जैसे प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंके संहारकी इच्छावाले यमराजका तेजोमय शरीर प्रज्वलित हो उठता है, उसी प्रकार वहाँ देखा गया कि क्रोधसे भरे हुए अश्वत्थामाका शरीर तमतमा उठा है ॥ २ ॥

अश्रुपूर्णे ततो नेत्रे व्यपमृज्य पुनः पुनः ।
उवाच कोपान्निःश्वस्य दुर्योधनमिदं वचः ॥ ३ ॥
अपने आँसूभरे नेत्रोंको बारंबार पोंछकर क्रोधसे लंबी साँस खींचते हुए अश्वत्थामाने दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३ ॥

पिता मम यथा क्षुद्रैर्न्यस्तशस्त्रो निपातितः ।
धर्मध्वजवता पापं कृतं तद् विदितं मम ॥ ४ ॥
‘राजन्! मेरे पिताने जिस प्रकार हथियार डाल दिया, जिस तरह उन नीचोंने उन्हें मार गिराया तथा धर्मका ढोंग रचनेवाले युधिष्ठिरने जो पाप किया है, वह सब मुझे मालूम हो गया ॥ ४ ॥

अनार्यं सुनृशंसं च धर्मपुत्रस्य मे श्रुतम् । युद्धेष्वपि प्रवृत्तानां ध्रुवं जयपराजयौ ॥ ५ ॥ द्वयमेतद् भवेद् राजन् वधस्तत्र प्रशस्यते । ‘धर्मपुत्र युधिष्ठिरका क्रूरतापूर्ण नीच कर्म मैंने सुन लिया। राजन्! जो लोग युद्धमें प्रवृत्त होते हैं, उन्हें विजय और पराजय अवश्य प्राप्त होती है। परंतु युद्धमें होनेवाले वधकी अधिक प्रशंसा की गयी है ॥ ५ १/२ ॥ न्यायवृत्तो वधो यस्तु संग्रामे युध्यतो भवेत् ॥ ६ ॥ न स दुःखाय भवति तथा दृष्टो हि स द्विजैः । ‘संग्राममें जूझते हुए वीरको यदि न्यायानुकूल वध प्राप्त हो जाय, तो वह दुःखका कारण नहीं होता; क्योंकि द्विजोंने युद्धके इस परिणामको देखा है ॥ ६ १/२ ॥ गतः स वीरलोकाय पिता मम न संशयः ॥ ७ ॥ न शोच्यः पुरुषव्याघ्र यस्तदा निधनं गतः । ‘पुरुषसिंह! इसमें संशय नहीं कि मेरे पिता वीरगतिको प्राप्त हुए हैं। उस समय वे मारे गये, इस बातको लेकर उनके लिये शोक करना उचित नहीं है ।। यत् तु धर्मप्रवृत्तः सन् केशग्रहणमाप्तवान् ॥ ८ ॥ पश्यतां सर्वसैन्यानां तन्मे मर्माणि कृन्तति ।

'परंतु धर्ममें तत्पर रहनेपर भी जो समस्त सैनिकोंके देखते-देखते उनका केश पकड़ा गया, वह अपमान ही मेरे मर्मस्थानोंको विदीर्ण किये देता है॥ मयि जीवति यत् तातः केशग्रहमवाप्तवान् ॥ ९ ॥ कथमन्ये करिष्यन्ति पुत्रेभ्यः पुत्रिणः स्पृहाम् । 'मेरे जीते-जी यदि पिताको अपने केश पकड़े जानेका अपमानपूर्ण कष्ट उठाना पड़ा, तब दूसरे पुत्रवान् पुरुष किसलिये पुत्रोंकी अभिलाषा करेंगे? ॥ ९१/२ ॥ कामात् क्रोधादविज्ञानाद्धर्षाद् बाल्येन वा पुनः ॥ १० ॥ विधर्माणि कुर्वन्ति तथा परिभवन्ति च । तदिदं पार्षतेनेह महदाधर्मिकं कृतम् ॥ ११ ॥ अवज्ञाय च मां नूनं नृशंसेन दुरात्मना । तस्यानुबन्धं द्रष्टासौ धृष्टद्युम्नः सुदारुणम् ॥ १२ ॥ 'लोग काम, क्रोध, अज्ञान, हर्ष अथवा बालोचित चपलताके कारण धर्मके विरुद्ध कार्य करते तथा श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान कर बैठते हैं। क्रूर एवं दुरात्मा द्रुपदपुत्रने निश्चय ही मेरी अवहेलना करके यह महान् पाप कर्म कर डाला है। अतः उस धृष्टद्युम्नको उस पापका अत्यन्त भयंकर परिणाम भोगना पड़ेगा ॥ १०-१२ ॥ अकार्यं परमं कृत्वा मिथ्यावादी च पाण्डवः । यो ह्यसौ छद्मनाऽऽचार्यं शस्त्रं संन्यासयत् तदा ॥ १३ ॥ तस्याद्य धर्मराजस्य भूमिः पास्यति शोणितम् । 'साथ ही मिथ्यावादी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको भी यह अत्यन्त नीच कर्म करनेके कारण इसका दारुण परिणाम देखना पड़ेगा। जिसने छल करके आचार्यसे उस समय शस्त्र रखवा दिया था, उस धर्मराज युधिष्ठिरका रक्त आज यह पृथ्वी पीयेगी ॥ १३१/२ ॥ शपे सत्येन कौरव्य इष्टापूर्तेन चैव ह ॥ १४ ॥ अहत्वा सर्वपाञ्चालान् जीवेयं न कथंचन । सर्वोपायैर्यतिष्यामि पञ्चालानामहं वधे ॥ १५ ॥ 'कुरुनन्दन! मैं अपने सत्य, इष्ट (यज्ञ-यागादि) और आपूर्त (वापी-तड़ागनिर्माण आदि) कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि समस्त पांचालोंका वध किये बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकूँगा। सभी उपायोंसे पांचालोंको मार डालनेका प्रयत्न करूँगा ॥ १४-१५ ॥ धृष्टद्युम्नं च समरे हन्ताहं पापकारिणम् । कर्मणा येन तेनेह मृदुना दारुणेन च ॥ १६ ॥ 'समरभूमिमें पापाचारी धृष्टद्युम्नको मैं कोमल और कठोर जिस किसी भी कर्मके द्वारा अवश्य मार डालूँगा ॥ पञ्चालानां वधं कृत्वा शान्तिं लब्धास्मि कौरव । यदर्थं पुरुषव्याघ्र पुत्रानिच्छन्ति मानवाः ॥ १७ ॥

प्रेत्य चेह च सम्प्राप्तास्त्रायन्ते महतो भयात् । ‘कुरुनन्दन! पांचालोंका वध करके ही मैं शान्ति पा सकूँगा। पुरुषसिंह! मनुष्य इसीलिये पुत्रोंकी इच्छा करते हैं कि वे प्राप्त होनेपर इहलोक और परलोकमें भी महान् भयसे रक्षा करेंगे ॥ १७ १/२ ॥

पित्रा तु मम सावस्था प्राप्ता निर्बन्धुना यथा ॥ १८ ॥ मयि शैलप्रतीकाशे पुत्रे शिष्ये च जीवति । ‘मेरे पिताने मुझ पर्वत-सरीखे पुत्र और शिष्यके जीते-जी बन्धुहीनकी भाँति वह दुरवस्था प्राप्त की है ॥

धिङ्ममास्त्राणि दिव्यानि धिग् बाहू धिक् पराक्रमम् ॥ १९ ॥ यं स्म द्रोणः सुतं प्राप्य केशग्रहमवाप्तवान् । ‘मेरे दिव्यास्त्रोंको धिक्कार है! मेरे इन दोनों भुजाओंको धिक्कार है! तथा मेरे पराक्रमको धिक्कार है!! जब कि मेरे-जैसे पुत्रको पाकर आचार्य द्रोणने केशग्रहणका अपमान उठाया ॥ १९ १/२ ॥

स तथाहं करिष्यामि यथा भरतसत्तम ॥ २० ॥ परलोकगतस्यापि भविष्याम्यनृणः पितुः । ‘भरतश्रेष्ठ! अब मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे परलोकमें गये हुए पिताके ऋणसे मुक्त हो सकूँ ॥ २० १/२ ॥

आर्येण हि न वक्तव्या कदाचित् स्तुतिरात्मनः ॥ २१ ॥ पितुर्वधममृष्यंस्तु वक्ष्याम्यद्येह पौरुषम् । ‘यद्यपि श्रेष्ठ पुरुषको कभी अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, तथापि अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आज मैं यहाँ अपने पुरुषार्थका वर्णन कर रहा हूँ ॥ २१ १/२ ॥

अद्य पश्यन्तु मे वीर्यं पाण्डवाः सजनार्दनाः ॥ २२ ॥ मृद्नतः सर्वसैन्यानि युगान्तमिव कुर्वतः । ‘आज मैं सारी सेनाओंको रौंदता हुआ प्रलय-कालका दृश्य उपस्थित करूँगा। अतः आज श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव मेरा पराक्रम देखें ॥ २२ १/२ ॥

न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः ॥ २३ ॥ अद्य शक्ता रणे जेतुं रथस्थं मां नरर्षभाः । ‘आज रणभूमिमें रथपर बैठे हुए मुझ अश्वत्थामाको न तो देवता, न गन्धर्व, न असुर, न राक्षस और न कोई श्रेष्ठ मानव वीर ही परास्त कर सकते हैं ॥ २३ १/२ ॥

मदन्यो नास्ति लोकेऽस्मिन्नर्जुनाद् वास्त्रवित् क्वचित् ॥ २४ ॥ अहं हि ज्वलतां मध्ये मयूखानामिवांशुमान् । प्रयोक्ता देवसृष्टानामास्त्राणां पृतनागतः ॥ २५ ॥

'इस संसारमें मुझसे या अर्जुनसे बढ़कर दूसरा कोई अस्त्रवेत्ता कहीं नहीं है। आज मैं शत्रुके सेनामें घुसकर प्रकाशमान अंशुधारियोंके बीच अंशुमाली सूर्यके समान तपता हुआ देवनिर्मित अस्त्रोंका प्रयोग करूँगा ।। भृशमिष्वसनादद्य मत्प्रयुक्ता महाहवे । दर्शयन्तः शरा वीर्यं प्रमथिष्यन्ति पाण्डवान् ॥ २६ ॥ 'आज महासमरमें धनुषसे मेरे द्वारा छोड़े हुए बाण मेरा महान् पराक्रम दिखाते हुए पाण्डवयोद्धाओंको मथ डालेंगे ।। २६ ।। अद्य सर्वा दिशो राजन् धाराभिरिव संकुलाः । आवृताः पत्रिभिस्तीक्ष्णैर्द्रष्टारो मामकैरिह ॥ २७ ॥ 'राजन्! जैसे बरसती हुई जलधाराओंसे सम्पूर्ण दिशाएँ ढक जाती हैं, उसी प्रकार आज सब लोग मेरे तीखे बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित हुई देखेंगे ।। विकिरन् शरजालानि सर्वतो भैरवस्वनान् । शत्रून् निपातयिष्यामि महावात इव द्रुमान् ॥ २८ ॥ 'जैसे आँधी वृक्षोंको गिरा देती है, उसी प्रकार मैं सब ओर बाणसमूहोंकी वर्षा करके भयंकर गर्जना करनेवाले शत्रुओंको मार गिराऊँगा ।। २८ ।। न हि जानाति बीभत्सुस्तदस्त्रं न जनार्दनः । न भीमसेनो न यमौ न च राजा युधिष्ठिरः ॥ २९ ॥ न पार्षतो दुरात्मासौ न शिखण्डी न सात्यकिः । यदिदं मयि कौरव्य सकल्पं संनिवर्तनम् ॥ ३० ॥ 'आज मैं जिस अस्त्रका प्रयोग करूँगा, उसे न अर्जुन जानते हैं न श्रीकृष्ण, भीमसेन, नकुल-सहदेव और राजा युधिष्ठिरको भी उसका पता नहीं है। वह दुरात्मा धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और सात्यकि भी उसके ज्ञानसे शून्य हैं। कुरुनन्दन! वह तो प्रयोग और उपसंहारसहित केवल मेरे ही पास है ।। २९-३० ।। नारायणाय मे पित्रा प्रणम्य विधिपूर्वकम् । उपहारः पुरा दत्तो ब्रह्मरूप उपस्थितः ॥ ३१ ॥ तं स्वयं प्रतिगृह्याथ भगवान् स वरं ददौ । वव्रे पिता मे परममस्त्रं नारायणं ततः ॥ ३२ ॥ 'पूर्वकालकी बात है, मेरे पिताने भगवान् नारायणको प्रणाम करके उन्हें विधिपूर्वक वेदस्वरूप उपहार समर्पित किया (वैदिक मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति की)। भगवान्‌ने स्वयं उपस्थित होकर वह उपहार ग्रहण किया और पिताको वर दिया। मेरे पिताने वरके रूपमें उनसे सर्वोत्तम नारायणास्त्रकी याचना की ।। ३१-३२ ।। अथैनमब्रवीद् राजन् भगवान् देवसत्तमः । भविता त्वत्समो नान्यः कश्चिद् युधि नरः क्वचित् ॥ ३३ ॥

न त्विदं सहसा ब्रह्मन् प्रयोक्तव्यं कथंचन ।
न ह्येतदस्त्रमन्यत्र वधाच्छत्रोर्निवर्तते ॥ ३४ ॥
‘राजन्! तब देवश्रेष्ठ भगवान् नारायणने वह अस्त्र देकर उनसे इस प्रकार कहा—‘ब्रह्मन्! अब युद्धमें तुम्हारी समानता करनेवाला दूसरा कोई मनुष्य कहीं नहीं रह जायगा, परंतु तुम्हें सहसा इसका प्रयोग किसी तरह नहीं करना चाहिये; क्योंकि यह अस्त्र शत्रु का वध किये बिना पीछे नहीं लौटता है ।। ३३-३४ ।।
न चैतच्छक्यते ज्ञातुं कं न वध्येदिति प्रभो ।
अवध्यमपि हन्याद्धि तस्मान्नैतत् प्रयोजयेत् ॥ ३५ ॥
‘प्रभो! यह नहीं जाना जा सकता कि यह अस्त्र किसको नहीं मारेगा। यह अवध्यका भी वध कर सकता है; अतः सहसा इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये ।। ३५ ।।
अथ संख्ये रथस्यैव शस्त्राणां च विसर्जनम् ।
प्रयाचतां च शत्रूणां गमनं शरणस्य च ॥ ३६ ॥
एते प्रशमने योगा महास्त्रस्य परंतप ।
सर्वथा पीडितो हि स्यादवध्यान् पीडयन् रणे ॥ ३७ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोण! युद्धभूमिमें रथ छोड़कर उतर जाना, अपने अस्त्र-शस्त्र रख देना, अभयकी याचना करना और शत्रु की शरण लेना—ये इस महान् अस्त्रको शान्त करनेके उपाय हैं। जो रणभूमिमें इस अस्त्रके द्वारा अवध्य मनुष्योंको पीड़ा देता है, वह स्वयं भी सब प्रकारसे पीड़ित हो सकता है’ ।। ३६-३७ ।।
तज्जग्राह पिता मह्यमब्रवीच्चैव स प्रभुः ।
त्वं वधिष्यसि सर्वाणि शस्त्रवर्षाण्यनेकशः ॥ ३८ ॥
अनेनास्त्रेण संग्रामे तेजसा च ज्वलिष्यसि ।
एवमुक्त्वा स भगवान् दिवमाचक्रमे प्रभुः ॥ ३९ ॥
‘तदनन्तर मेरे पिताने वह अस्त्र ग्रहण किया और उन पूज्य पिताने मुझे उसका उपदेश किया। (पिताको अस्त्र देते समय भगवान्‌ने यह भी कहा था—) ‘ब्रह्मन्! तुम संग्राममें इस अस्त्रके द्वारा सम्पूर्ण शस्त्र-वर्षाओंको बारंबार नष्ट करोगे और स्वयं भी तेजसे प्रकाशित होते रहोगे।’ ऐसा कहकर भगवान् नारायण अपने दिव्य धामको चले गये ।। ३८-३९ ।।
एतन्नारायणादस्त्रं तत् प्राप्तं पितृबन्धुना ।
तेनाहं पाण्डवांश्चैव पञ्चालान् मत्स्यकेकयान् ॥ ४० ॥
विद्रावयिष्यामि रणे शचीपतिरिवासुरान् ।
‘इस प्रकार पिताने भगवान् नारायणसे यह अस्त्र प्राप्त किया और उनसे मुझे इसकी प्राप्ति हुई है। उसी अस्त्रसे मैं रणभूमिमें पाण्डव, पांचाल, मत्स्य और केकय योद्धाओंको उसी प्रकार खदेडूंगा, जैसे शचीपति इन्द्रने असुरोंको मार भगाया था ।। ४० १/२ ।।
यथा यथाहमिच्छेयं तथा भूत्वा शरा मम ॥ ४१ ॥