महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1476, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनार्यं सुनृशंसं च धर्मपुत्रस्य मे श्रुतम् । युद्धेष्वपि प्रवृत्तानां ध्रुवं जयपराजयौ ॥ ५ ॥ द्वयमेतद् भवेद् राजन् वधस्तत्र प्रशस्यते । ‘धर्मपुत्र युधिष्ठिरका क्रूरतापूर्ण नीच कर्म मैंने सुन लिया। राजन्! जो लोग युद्धमें प्रवृत्त होते हैं, उन्हें विजय और पराजय अवश्य प्राप्त होती है। परंतु युद्धमें होनेवाले वधकी अधिक प्रशंसा की गयी है ॥ ५ १/२ ॥ न्यायवृत्तो वधो यस्तु संग्रामे युध्यतो भवेत् ॥ ६ ॥ न स दुःखाय भवति तथा दृष्टो हि स द्विजैः । ‘संग्राममें जूझते हुए वीरको यदि न्यायानुकूल वध प्राप्त हो जाय, तो वह दुःखका कारण नहीं होता; क्योंकि द्विजोंने युद्धके इस परिणामको देखा है ॥ ६ १/२ ॥ गतः स वीरलोकाय पिता मम न संशयः ॥ ७ ॥ न शोच्यः पुरुषव्याघ्र यस्तदा निधनं गतः । ‘पुरुषसिंह! इसमें संशय नहीं कि मेरे पिता वीरगतिको प्राप्त हुए हैं। उस समय वे मारे गये, इस बातको लेकर उनके लिये शोक करना उचित नहीं है ।। यत् तु धर्मप्रवृत्तः सन् केशग्रहणमाप्तवान् ॥ ८ ॥ पश्यतां सर्वसैन्यानां तन्मे मर्माणि कृन्तति ।