भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1477

'परंतु धर्ममें तत्पर रहनेपर भी जो समस्त सैनिकोंके देखते-देखते उनका केश पकड़ा गया, वह अपमान ही मेरे मर्मस्थानोंको विदीर्ण किये देता है॥ मयि जीवति यत् तातः केशग्रहमवाप्तवान् ॥ ९ ॥ कथमन्ये करिष्यन्ति पुत्रेभ्यः पुत्रिणः स्पृहाम् । 'मेरे जीते-जी यदि पिताको अपने केश पकड़े जानेका अपमानपूर्ण कष्ट उठाना पड़ा, तब दूसरे पुत्रवान् पुरुष किसलिये पुत्रोंकी अभिलाषा करेंगे? ॥ ९१/२ ॥ कामात् क्रोधादविज्ञानाद्धर्षाद् बाल्येन वा पुनः ॥ १० ॥ विधर्माणि कुर्वन्ति तथा परिभवन्ति च । तदिदं पार्षतेनेह महदाधर्मिकं कृतम् ॥ ११ ॥ अवज्ञाय च मां नूनं नृशंसेन दुरात्मना । तस्यानुबन्धं द्रष्टासौ धृष्टद्युम्नः सुदारुणम् ॥ १२ ॥ 'लोग काम, क्रोध, अज्ञान, हर्ष अथवा बालोचित चपलताके कारण धर्मके विरुद्ध कार्य करते तथा श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान कर बैठते हैं। क्रूर एवं दुरात्मा द्रुपदपुत्रने निश्चय ही मेरी अवहेलना करके यह महान् पाप कर्म कर डाला है। अतः उस धृष्टद्युम्नको उस पापका अत्यन्त भयंकर परिणाम भोगना पड़ेगा ॥ १०-१२ ॥ अकार्यं परमं कृत्वा मिथ्यावादी च पाण्डवः । यो ह्यसौ छद्मनाऽऽचार्यं शस्त्रं संन्यासयत् तदा ॥ १३ ॥ तस्याद्य धर्मराजस्य भूमिः पास्यति शोणितम् । 'साथ ही मिथ्यावादी पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको भी यह अत्यन्त नीच कर्म करनेके कारण इसका दारुण परिणाम देखना पड़ेगा। जिसने छल करके आचार्यसे उस समय शस्त्र रखवा दिया था, उस धर्मराज युधिष्ठिरका रक्त आज यह पृथ्वी पीयेगी ॥ १३१/२ ॥ शपे सत्येन कौरव्य इष्टापूर्तेन चैव ह ॥ १४ ॥ अहत्वा सर्वपाञ्चालान् जीवेयं न कथंचन । सर्वोपायैर्यतिष्यामि पञ्चालानामहं वधे ॥ १५ ॥ 'कुरुनन्दन! मैं अपने सत्य, इष्ट (यज्ञ-यागादि) और आपूर्त (वापी-तड़ागनिर्माण आदि) कर्मोंकी शपथ खाकर कहता हूँ कि समस्त पांचालोंका वध किये बिना किसी तरह जीवित नहीं रह सकूँगा। सभी उपायोंसे पांचालोंको मार डालनेका प्रयत्न करूँगा ॥ १४-१५ ॥ धृष्टद्युम्नं च समरे हन्ताहं पापकारिणम् । कर्मणा येन तेनेह मृदुना दारुणेन च ॥ १६ ॥ 'समरभूमिमें पापाचारी धृष्टद्युम्नको मैं कोमल और कठोर जिस किसी भी कर्मके द्वारा अवश्य मार डालूँगा ॥ पञ्चालानां वधं कृत्वा शान्तिं लब्धास्मि कौरव । यदर्थं पुरुषव्याघ्र पुत्रानिच्छन्ति मानवाः ॥ १७ ॥