भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1478, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1478

प्रेत्य चेह च सम्प्राप्तास्त्रायन्ते महतो भयात् । ‘कुरुनन्दन! पांचालोंका वध करके ही मैं शान्ति पा सकूँगा। पुरुषसिंह! मनुष्य इसीलिये पुत्रोंकी इच्छा करते हैं कि वे प्राप्त होनेपर इहलोक और परलोकमें भी महान् भयसे रक्षा करेंगे ॥ १७ १/२ ॥

पित्रा तु मम सावस्था प्राप्ता निर्बन्धुना यथा ॥ १८ ॥ मयि शैलप्रतीकाशे पुत्रे शिष्ये च जीवति । ‘मेरे पिताने मुझ पर्वत-सरीखे पुत्र और शिष्यके जीते-जी बन्धुहीनकी भाँति वह दुरवस्था प्राप्त की है ॥

धिङ्ममास्त्राणि दिव्यानि धिग् बाहू धिक् पराक्रमम् ॥ १९ ॥ यं स्म द्रोणः सुतं प्राप्य केशग्रहमवाप्तवान् । ‘मेरे दिव्यास्त्रोंको धिक्कार है! मेरे इन दोनों भुजाओंको धिक्कार है! तथा मेरे पराक्रमको धिक्कार है!! जब कि मेरे-जैसे पुत्रको पाकर आचार्य द्रोणने केशग्रहणका अपमान उठाया ॥ १९ १/२ ॥

स तथाहं करिष्यामि यथा भरतसत्तम ॥ २० ॥ परलोकगतस्यापि भविष्याम्यनृणः पितुः । ‘भरतश्रेष्ठ! अब मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे परलोकमें गये हुए पिताके ऋणसे मुक्त हो सकूँ ॥ २० १/२ ॥

आर्येण हि न वक्तव्या कदाचित् स्तुतिरात्मनः ॥ २१ ॥ पितुर्वधममृष्यंस्तु वक्ष्याम्यद्येह पौरुषम् । ‘यद्यपि श्रेष्ठ पुरुषको कभी अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, तथापि अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आज मैं यहाँ अपने पुरुषार्थका वर्णन कर रहा हूँ ॥ २१ १/२ ॥

अद्य पश्यन्तु मे वीर्यं पाण्डवाः सजनार्दनाः ॥ २२ ॥ मृद्नतः सर्वसैन्यानि युगान्तमिव कुर्वतः । ‘आज मैं सारी सेनाओंको रौंदता हुआ प्रलय-कालका दृश्य उपस्थित करूँगा। अतः आज श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव मेरा पराक्रम देखें ॥ २२ १/२ ॥

न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः ॥ २३ ॥ अद्य शक्ता रणे जेतुं रथस्थं मां नरर्षभाः । ‘आज रणभूमिमें रथपर बैठे हुए मुझ अश्वत्थामाको न तो देवता, न गन्धर्व, न असुर, न राक्षस और न कोई श्रेष्ठ मानव वीर ही परास्त कर सकते हैं ॥ २३ १/२ ॥

मदन्यो नास्ति लोकेऽस्मिन्नर्जुनाद् वास्त्रवित् क्वचित् ॥ २४ ॥ अहं हि ज्वलतां मध्ये मयूखानामिवांशुमान् । प्रयोक्ता देवसृष्टानामास्त्राणां पृतनागतः ॥ २५ ॥