महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
प्रेत्य चेह च सम्प्राप्तास्त्रायन्ते महतो भयात् । ‘कुरुनन्दन! पांचालोंका वध करके ही मैं शान्ति पा सकूँगा। पुरुषसिंह! मनुष्य इसीलिये पुत्रोंकी इच्छा करते हैं कि वे प्राप्त होनेपर इहलोक और परलोकमें भी महान् भयसे रक्षा करेंगे ॥ १७ १/२ ॥
पित्रा तु मम सावस्था प्राप्ता निर्बन्धुना यथा ॥ १८ ॥ मयि शैलप्रतीकाशे पुत्रे शिष्ये च जीवति । ‘मेरे पिताने मुझ पर्वत-सरीखे पुत्र और शिष्यके जीते-जी बन्धुहीनकी भाँति वह दुरवस्था प्राप्त की है ॥
धिङ्ममास्त्राणि दिव्यानि धिग् बाहू धिक् पराक्रमम् ॥ १९ ॥ यं स्म द्रोणः सुतं प्राप्य केशग्रहमवाप्तवान् । ‘मेरे दिव्यास्त्रोंको धिक्कार है! मेरे इन दोनों भुजाओंको धिक्कार है! तथा मेरे पराक्रमको धिक्कार है!! जब कि मेरे-जैसे पुत्रको पाकर आचार्य द्रोणने केशग्रहणका अपमान उठाया ॥ १९ १/२ ॥
स तथाहं करिष्यामि यथा भरतसत्तम ॥ २० ॥ परलोकगतस्यापि भविष्याम्यनृणः पितुः । ‘भरतश्रेष्ठ! अब मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे परलोकमें गये हुए पिताके ऋणसे मुक्त हो सकूँ ॥ २० १/२ ॥
आर्येण हि न वक्तव्या कदाचित् स्तुतिरात्मनः ॥ २१ ॥ पितुर्वधममृष्यंस्तु वक्ष्याम्यद्येह पौरुषम् । ‘यद्यपि श्रेष्ठ पुरुषको कभी अपनी प्रशंसा नहीं करनी चाहिये, तथापि अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आज मैं यहाँ अपने पुरुषार्थका वर्णन कर रहा हूँ ॥ २१ १/२ ॥
अद्य पश्यन्तु मे वीर्यं पाण्डवाः सजनार्दनाः ॥ २२ ॥ मृद्नतः सर्वसैन्यानि युगान्तमिव कुर्वतः । ‘आज मैं सारी सेनाओंको रौंदता हुआ प्रलय-कालका दृश्य उपस्थित करूँगा। अतः आज श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव मेरा पराक्रम देखें ॥ २२ १/२ ॥
न हि देवा न गन्धर्वा नासुरा न च राक्षसाः ॥ २३ ॥ अद्य शक्ता रणे जेतुं रथस्थं मां नरर्षभाः । ‘आज रणभूमिमें रथपर बैठे हुए मुझ अश्वत्थामाको न तो देवता, न गन्धर्व, न असुर, न राक्षस और न कोई श्रेष्ठ मानव वीर ही परास्त कर सकते हैं ॥ २३ १/२ ॥
मदन्यो नास्ति लोकेऽस्मिन्नर्जुनाद् वास्त्रवित् क्वचित् ॥ २४ ॥ अहं हि ज्वलतां मध्ये मयूखानामिवांशुमान् । प्रयोक्ता देवसृष्टानामास्त्राणां पृतनागतः ॥ २५ ॥
'इस संसारमें मुझसे या अर्जुनसे बढ़कर दूसरा कोई अस्त्रवेत्ता कहीं नहीं है। आज मैं शत्रुके सेनामें घुसकर प्रकाशमान अंशुधारियोंके बीच अंशुमाली सूर्यके समान तपता हुआ देवनिर्मित अस्त्रोंका प्रयोग करूँगा ।। भृशमिष्वसनादद्य मत्प्रयुक्ता महाहवे । दर्शयन्तः शरा वीर्यं प्रमथिष्यन्ति पाण्डवान् ॥ २६ ॥ 'आज महासमरमें धनुषसे मेरे द्वारा छोड़े हुए बाण मेरा महान् पराक्रम दिखाते हुए पाण्डवयोद्धाओंको मथ डालेंगे ।। २६ ।। अद्य सर्वा दिशो राजन् धाराभिरिव संकुलाः । आवृताः पत्रिभिस्तीक्ष्णैर्द्रष्टारो मामकैरिह ॥ २७ ॥ 'राजन्! जैसे बरसती हुई जलधाराओंसे सम्पूर्ण दिशाएँ ढक जाती हैं, उसी प्रकार आज सब लोग मेरे तीखे बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित हुई देखेंगे ।। विकिरन् शरजालानि सर्वतो भैरवस्वनान् । शत्रून् निपातयिष्यामि महावात इव द्रुमान् ॥ २८ ॥ 'जैसे आँधी वृक्षोंको गिरा देती है, उसी प्रकार मैं सब ओर बाणसमूहोंकी वर्षा करके भयंकर गर्जना करनेवाले शत्रुओंको मार गिराऊँगा ।। २८ ।। न हि जानाति बीभत्सुस्तदस्त्रं न जनार्दनः । न भीमसेनो न यमौ न च राजा युधिष्ठिरः ॥ २९ ॥ न पार्षतो दुरात्मासौ न शिखण्डी न सात्यकिः । यदिदं मयि कौरव्य सकल्पं संनिवर्तनम् ॥ ३० ॥ 'आज मैं जिस अस्त्रका प्रयोग करूँगा, उसे न अर्जुन जानते हैं न श्रीकृष्ण, भीमसेन, नकुल-सहदेव और राजा युधिष्ठिरको भी उसका पता नहीं है। वह दुरात्मा धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और सात्यकि भी उसके ज्ञानसे शून्य हैं। कुरुनन्दन! वह तो प्रयोग और उपसंहारसहित केवल मेरे ही पास है ।। २९-३० ।। नारायणाय मे पित्रा प्रणम्य विधिपूर्वकम् । उपहारः पुरा दत्तो ब्रह्मरूप उपस्थितः ॥ ३१ ॥ तं स्वयं प्रतिगृह्याथ भगवान् स वरं ददौ । वव्रे पिता मे परममस्त्रं नारायणं ततः ॥ ३२ ॥ 'पूर्वकालकी बात है, मेरे पिताने भगवान् नारायणको प्रणाम करके उन्हें विधिपूर्वक वेदस्वरूप उपहार समर्पित किया (वैदिक मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति की)। भगवान्ने स्वयं उपस्थित होकर वह उपहार ग्रहण किया और पिताको वर दिया। मेरे पिताने वरके रूपमें उनसे सर्वोत्तम नारायणास्त्रकी याचना की ।। ३१-३२ ।। अथैनमब्रवीद् राजन् भगवान् देवसत्तमः । भविता त्वत्समो नान्यः कश्चिद् युधि नरः क्वचित् ॥ ३३ ॥
न त्विदं सहसा ब्रह्मन् प्रयोक्तव्यं कथंचन ।
न ह्येतदस्त्रमन्यत्र वधाच्छत्रोर्निवर्तते ॥ ३४ ॥
‘राजन्! तब देवश्रेष्ठ भगवान् नारायणने वह अस्त्र देकर उनसे इस प्रकार कहा—‘ब्रह्मन्! अब युद्धमें तुम्हारी समानता करनेवाला दूसरा कोई मनुष्य कहीं नहीं रह जायगा, परंतु तुम्हें सहसा इसका प्रयोग किसी तरह नहीं करना चाहिये; क्योंकि यह अस्त्र शत्रु का वध किये बिना पीछे नहीं लौटता है ।। ३३-३४ ।।
न चैतच्छक्यते ज्ञातुं कं न वध्येदिति प्रभो ।
अवध्यमपि हन्याद्धि तस्मान्नैतत् प्रयोजयेत् ॥ ३५ ॥
‘प्रभो! यह नहीं जाना जा सकता कि यह अस्त्र किसको नहीं मारेगा। यह अवध्यका भी वध कर सकता है; अतः सहसा इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये ।। ३५ ।।
अथ संख्ये रथस्यैव शस्त्राणां च विसर्जनम् ।
प्रयाचतां च शत्रूणां गमनं शरणस्य च ॥ ३६ ॥
एते प्रशमने योगा महास्त्रस्य परंतप ।
सर्वथा पीडितो हि स्यादवध्यान् पीडयन् रणे ॥ ३७ ॥
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोण! युद्धभूमिमें रथ छोड़कर उतर जाना, अपने अस्त्र-शस्त्र रख देना, अभयकी याचना करना और शत्रु की शरण लेना—ये इस महान् अस्त्रको शान्त करनेके उपाय हैं। जो रणभूमिमें इस अस्त्रके द्वारा अवध्य मनुष्योंको पीड़ा देता है, वह स्वयं भी सब प्रकारसे पीड़ित हो सकता है’ ।। ३६-३७ ।।
तज्जग्राह पिता मह्यमब्रवीच्चैव स प्रभुः ।
त्वं वधिष्यसि सर्वाणि शस्त्रवर्षाण्यनेकशः ॥ ३८ ॥
अनेनास्त्रेण संग्रामे तेजसा च ज्वलिष्यसि ।
एवमुक्त्वा स भगवान् दिवमाचक्रमे प्रभुः ॥ ३९ ॥
‘तदनन्तर मेरे पिताने वह अस्त्र ग्रहण किया और उन पूज्य पिताने मुझे उसका उपदेश किया। (पिताको अस्त्र देते समय भगवान्ने यह भी कहा था—) ‘ब्रह्मन्! तुम संग्राममें इस अस्त्रके द्वारा सम्पूर्ण शस्त्र-वर्षाओंको बारंबार नष्ट करोगे और स्वयं भी तेजसे प्रकाशित होते रहोगे।’ ऐसा कहकर भगवान् नारायण अपने दिव्य धामको चले गये ।। ३८-३९ ।।
एतन्नारायणादस्त्रं तत् प्राप्तं पितृबन्धुना ।
तेनाहं पाण्डवांश्चैव पञ्चालान् मत्स्यकेकयान् ॥ ४० ॥
विद्रावयिष्यामि रणे शचीपतिरिवासुरान् ।
‘इस प्रकार पिताने भगवान् नारायणसे यह अस्त्र प्राप्त किया और उनसे मुझे इसकी प्राप्ति हुई है। उसी अस्त्रसे मैं रणभूमिमें पाण्डव, पांचाल, मत्स्य और केकय योद्धाओंको उसी प्रकार खदेडूंगा, जैसे शचीपति इन्द्रने असुरोंको मार भगाया था ।। ४० १/२ ।।
यथा यथाहमिच्छेयं तथा भूत्वा शरा मम ॥ ४१ ॥
निपतेयुः सपत्नेषु विक्रमत्स्वपि भारत । 'भारत! मैं जैसा-जैसा चाहूँगा, वैसा ही रूप धारण करके मेरे बाण शत्रुओंके पराक्रम करनेपर भी उनपर पड़ेंगे ॥ ४११/२ ॥
यथेष्टमश्मवर्षेण प्रवर्षिष्ये रणे स्थितः ॥ ४२ ॥ अयोमुखैश्च विहगैर्द्रावयिष्ये महारथान् । परश्वधांश्च निशितानुत्स्रक्ष्येऽहमसंशयम् ॥ ४३ ॥ 'मैं युद्धमें स्थित होकर अपनी इच्छाके अनुसार पत्थरोंकी वर्षा करूँगा, लोहेकी चोंचवाले पक्षियोंद्वारा बड़े-बड़े महारथियोंको भगा दूँगा तथा शत्रुओंपर तेज धारवाले फरसे भी बरसाऊँगा; इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ ४२-४३ ॥
सोऽहं नारायणास्त्रेण महता शत्रुतापनः । शत्रून् विध्वंसयिष्यामि कदर्थीकृत्य पाण्डवान् ॥ ४४ ॥ 'इस प्रकार शत्रुओंको संताप देनेवाला मैं महान् नारायणास्त्रका प्रयोग करके पाण्डवोंको पीड़ा देता हुआ अपने समस्त शत्रुओंका विध्वंस कर डालूँगा ॥ ४४ ॥
मित्रब्रह्मगुरुद्रोही जाल्मकः सुविगर्हितः । पाञ्चालापसदश्चाद्य न मे जीवन् विमोक्ष्यते ॥ ४५ ॥ 'मित्र, ब्राह्मण तथा गुरुसे द्रोह करनेवाला अत्यन्त निन्दित वह पांचालकुलकलंक पामर धृष्टद्युम्न भी आज मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा' ॥ ४५ ॥
तच्छ्रुत्वा द्रोणपुत्रस्य पर्यवर्तत वाहिनी । ततः सर्वे महाशङ्खान् दध्मुः पुरुषसत्तमाः ॥ ४६ ॥ द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी वह बात सुनकर कौरवोंकी सेना लौट आयी। फिर तो सभी पुरुषश्रेष्ठ वीर बड़े-बड़े शंख बजाने लगे ॥ ४६ ॥
भेरीश्चाभ्यहनन् हृष्टा डिण्डिमांश्च सहस्रशः । तथा ननाद वसुधा खुरनेमिप्रपीडिता ॥ ४७ ॥ स शब्दस्तुमुलः खं द्यां पृथिवीं च व्यनादयत् । सबने प्रसन्न होकर रणभेरियाँ बजायीं, सहस्रों डंके पीटे, घोड़ोंकी टापों और रथोंके पहियोंसे पीड़ित हुई रणभूमि मानो आर्तनाद करने लगी। वह तुमुल ध्वनि आकाश, अन्तरिक्ष और भूतलको गुँजाने लगी ॥
तं शब्दं पाण्डवाः श्रुत्वा पर्जन्यनिनदोपमम् ॥ ४८ ॥ समेत्य रथिनां श्रेष्ठाः सहिताश्चाप्यमन्त्रयन् । मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान उस तुमुलनादको सुनकर श्रेष्ठ पाण्डव महारथी एकत्र होकर गुप्त मन्त्रणा करने लगे ॥ ४८१/२ ॥
तथोक्त्वा द्रोणपुत्रस्तु वार्युपस्पृश्य भारत ॥ ४९ ॥ प्रादुश्चकार तद् दिव्यमस्त्रं नारायणं तदा ॥ ५० ॥
भारत! द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पूर्वोक्त बात कहकर जलसे आचमन करके उस समय उस दिव्य नारायणास्त्रको प्रकट किया ।। ४९-५० ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि अश्वत्थामक्रोधे पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अश्वत्थामाका क्रोधविषयक एक सौ पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९५ ।।
कौरव-सेनाका सिंहनाद सुनकर युधिष्ठिरका अर्जुनसे कारण पूछना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाके क्रोध एवं गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन
षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः
कौरव-सेनाका सिंहनाद सुनकर युधिष्ठिरका अर्जुनसे कारण पूछना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाके क्रोध एवं गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन
संजय उवाच
प्रादुर्भूते ततस्तस्मिन्नस्त्रे नारायणे प्रभो।
प्रावात् सपृषतो वायुरनभ्रे स्तनयित्नुमान्॥ १॥
संजय कहते हैं—प्रभो! तदनन्तर उस नारायणास्त्रके प्रकट होनेपर जलकी बूँदोंके साथ प्रचण्ड वायु चलने लगी। बिना बादलोंके ही आकाशमें मेघोंकी गर्जना होने लगी॥ १॥
चचाल पृथिवी चापि चुक्षुभे च महोदधिः।
प्रतिस्रोतः प्रवृत्ताश्च गन्तुं तत्र समुद्रगाः॥ २॥
पृथ्वी काँप उठी, समुद्रमें ज्वार आ गया और समुद्रमें मिलनेवाली बड़ी-बड़ी नदियाँ अपने प्रवाहकी प्रतिकूल दिशामें बहने लगीं॥ २॥
शिखराणि व्यशीर्यन्त गिरीणां तत्र भारत।
अपसव्यं मृगाश्चैव पाण्डुसेनां प्रचक्रिरे॥ ३॥
भारत! पर्वतोंके शिखर टूट-टूटकर गिरने लगे। हरिणोंके झुंड पाण्डव-सेनाको अपने दायें करके चले गये॥ ३॥
तमसा चावकीर्यन्त सूर्यश्च कलुषोऽभवत्।
सम्पतन्ति च भूतानि क्रव्यादानि प्रहृष्टवत्॥ ४॥
सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया, सूर्य मलिन हो गये और मांसभोजी जीव-जन्तु प्रसन्न-से होकर दौड़ लगाने लगे॥ ४॥
देवदानवगन्धर्वास्त्रस्तास्त्वासन् विशाम्पते।
कथंकथाभवत् तीव्रा दृष्ट्वा तद् व्याकुलं महत्॥ ५॥
प्रजानाथ! वह महान् उत्पात देखकर देवता, दानव और गन्धर्व भी त्रस्त हो उठे तथा सब लोगोंमें यह तीव्र गतिसे चर्चा होने लगी कि 'अब क्या करना चाहिये'॥ ५॥
व्यथिताः सर्वराजानस्त्रस्ताश्चासन् विशाम्पते।
तद् दृष्ट्वा घोररूपं वै द्रौणेरस्त्रं भयावहम्॥ ६॥
महाराज! अश्वत्थामाके उस घोर एवं भयंकर अस्त्रको देखकर समस्त भूपाल व्यथित एवं भयभीत हो गये॥ ६॥
धृतराष्ट्र उवाच
निवर्तितेषु सैन्येषु द्रोणपुत्रेण संयुगे । भृशं शोकाभितप्तेन पितुर्वधममृष्यता ॥ ७ ॥ कुरूनापततो दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नस्य रक्षणे । को मन्त्रः पाण्डवेष्वासीत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ८ ॥ **धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! अपने पिताके वधको सहन न कर सकनेवाला अत्यन्त शोकसंतप्त द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके साथ जब सारी सेनाएँ युद्धस्थलमें लौट आयीं, तब कौरवोंको आते देख पाण्डवदलमें धृष्टद्युम्नकी रक्षाके लिये क्या विचार हुआ, वह मुझे बताओ ॥
संजय उवाच
प्रागेव विद्रुतान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् युधिष्ठिरः । पुनश्च तुमुलं शब्दं श्रुत्वार्जुनमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! राजा युधिष्ठिरने पहले तो आपके सैनिकोंको भागते देखा था। फिर उन्होंने वह भयंकर शब्द सुनकर अर्जुनसे कहा ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
आचार्ये निहते द्रोणे धृष्टद्युम्नेन संयुगे । निहते वज्रहस्तेन यथा वृत्रे महासुरे ॥ १० ॥ नाशंसन्तो जयं युद्धे दीनात्मानो धनंजय । आत्मत्राणे मतिं कृत्वा प्राद्रवन् कुरवो रणात् ॥ ११ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**धनंजय! पूर्वकालमें जैसे वज्रधारी इन्द्रने महान् असुर वृत्रासुरको मार डाला था, उसी प्रकार युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नद्वारा आचार्य द्रोणके मारे जानेपर युद्धमें अपनी विजयसे निराश हो दीनचित्त कौरव आत्मरक्षाका विचार करके रणभूमिसे भागे जा रहे थे ॥
केचिद् भ्रान्तै रथैस्तूर्णं निहतैः पार्ष्णियन्तृभिः । विपताकध्वजच्छत्रैः पार्थिवाः शीर्णकूबरैः ॥ १२ ॥ भग्ननीडैराकुलाश्वैः प्ररुग्णाश्च विशेषतः । भग्नाक्षयुगचक्रैश्च व्याकृष्यन्त समन्ततः ॥ १३ ॥ जिनके पार्श्वक्षक और सारथि मारे गये थे, ध्वजा, पताका और छत्र नष्ट हो गये थे, कूबर टूटकर बिखर गये थे, बैठनेके स्थान चौपट हो चुके थे तथा धुरे, जूए और पहिये भी टूट-फूट गये थे, वैसे रथ भी व्याकुल घोड़ोंसे आकृष्ट हो वहाँ चक्कर लगा रहे थे और उनके द्वारा कुछ विशेष घायल हुए नरेश चारों ओर खिंचे चले जा रहे थे ॥ १२-१३ ॥
भीताः पादैर्हयान् केचित् त्वरयन्तः स्वयं रथान् । रथान् विशीर्णानुत्सृज्य पद्भिः केचिच्च विद्रुताः ॥ १४ ॥
कुछ लोग भयभीत हो घोड़ोंको पैरोंसे मार-मारकर स्वयं ही जल्दी-जल्दी रथ हाँक रहे थे और कुछ लोग टूटे हुए रथोंको छोड़कर पैदल ही भागने लगे थे ॥ १४ ॥
हयपृष्ठगताश्चान्ये कृष्यन्तेऽर्धच्युतासनाः ।
गजस्कन्धेषु संस्यूता नाराचैश्चलितासनाः ॥ १५ ॥
शरार्तैर्विद्रुतैर्नागैर्हृताः केचिद् दिशो दश ।
कितने ही योद्धा घोड़ोंकी पीठपर बैठे, परंतु उनका आधा आसन खिसक गया और उसी अवस्थामें घोड़ोंके साथ खिंचे चले गये। कुछ लोग नाराचोंकी मार खाकर अपने आसनसे भ्रष्ट हो हाथियोंके कंधोंसे चिपक गये थे और उसी अवस्थामें बाणोंसे पीड़ित हो भागते हुए हाथी उन्हें दसों दिशाओंमें लिये जाते थे ॥ १५ १/२ ॥
विशस्त्रकवचाश्चान्ये वाहनेभ्यः क्षितिं गताः ॥ १६ ॥
संछिन्ना नेमिभिश्चैव मृदिताश्च हयद्विपैः ।
कुछ लोगोंके अस्त्र-शस्त्र और कवच कट गये और वे अपने वाहनोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े। उस दशामें रथके पहियोंकी नेमिसे दबकर उनके शरीरके टुकड़े-टुकड़े हो गये और कितने ही घोड़ों तथा हाथियोंसे कुचल गये ॥ १६ १/२ ॥
क्रोशन्तस्तात पुत्रेति पलायन्ते परे भयात् ॥ १७ ॥
नाभिजानन्ति चान्योन्यं कश्मलाभिहतौजसः ।
दूसरे बहुत-से योद्धा 'हा तात! हा पुत्र!' की रट लगाते हुए भयभीत होकर भाग रहे थे। मोहसे बल और उत्साह नष्ट हो जानेके कारण वे ऐसे अचेत हो रहे थे कि एक-दूसरेको पहचान भी नहीं पाते थे ॥ १७ १/२ ॥
पुत्रान् पितॄन् सखीन् भ्रातॄन् समारोप्य दृढ़क्षतान् ॥ १८ ॥
जलेन क्लेदयन्त्यन्ये विमुच्य कवचान्यपि ।
कितने ही सैनिक अधिक चोट खाये हुए अपने पुत्र, पिता, मित्र और भाइयोंको रथपर चढ़ाकर तथा उनके कवच खोलकर उनके घावोंको जलसे भिगो रहे थे ॥ १८ १/२ ॥
अवस्थां तादृशीं प्राप्य हते द्रोणे द्रुतं बलम् ॥ १९ ॥
पुनरावर्तितं केन यदि जानासि शंस मे ।
आचार्य द्रोणके मारे जानेपर वैसी दुरवस्थामें पड़कर जो सेना भाग गयी थी, उसे फिर किसने लौटाया है? यदि तुम जानते हो तो मुझे बताओ ॥ १९ १/२ ॥
हयानां हेषतां शब्दः कुञ्जराणां च बृंहताम् ॥ २० ॥
रथनेमिस्वनैश्चात्र विमिश्रः श्रूयते महान् ।
रथके पहियोंकी घर्घराहटसे मिला हुआ हिनहिनाते हुए घोड़ों और गर्जते हुए गजराजोंका महान् शब्द सुनायी पड़ता है ॥ २० १/२ ॥
एते शब्दा भृशं तीव्राः प्रवृत्ताः कुरुसागरे ॥ २१ ॥
मुहुर्मुहुरुदीर्यन्ते कम्पयन्त्यपि मामकान् ।
कौरव-सेनारूपी समुद्रमें यह कोलाहल अत्यन्त तीव्र वेगसे होने लगा है और बारंबार
बढ़ता जा रहा है, जो मेरे सैनिकोंको कम्पित किये देता है ।। २१ १/२ ।।
य एष तुमुलः शब्दः श्रूयते लोमहर्षणः ।। २२ ।।
सेन्द्रानप्येष लोकांस्त्रीन् ग्रसेदिति मतिर्मम ।
यह जो महाभयंकर रोमांचकारी शब्द सुनायी देता है, यह इन्द्रसहित तीनों लोकोंको
ग्रस लेगा, ऐसा मुझे जान पड़ता है ।। २२ १/२ ।।
मन्ये वज्रधरस्यैष निनादो भैरवस्वनः ।। २३ ।।
द्रोणे हते कौरवार्थं व्यक्तमभ्येति वासवः ।
मैं समझता हूँ, यह भयंकर शब्द वज्रधारी इन्द्रकी गर्जना है। द्रोणाचार्यके मारे जानेपर
कौरवोंकी सहायताके लिये साक्षात् इन्द्र आ रहे हैं, यह स्पष्ट जान पड़ता है ।।
प्रहृष्टरोमकूपाश्च संविग्ना रथपुङ्गवाः ।। २४ ।।
धनंजय गुरुं श्रुत्वा तत्र नादं सुभीषणम् ।
धनंजय! यह अत्यन्त भीषण और भारी सिंहनाद सुनकर हमारे श्रेष्ठ रथी भी उद्विग्न हो
उठे हैं और इनके रोंगटे खड़े हो गये हैं ।। २४ १/२ ।।
क एष कौरवान् दीर्नानवस्थाप्य महारथः ।। २५ ।।
निवर्तयति युद्धार्थं मृधे देवेश्वरो यथा ।
देवराज इन्द्रके समान यह कौन महारथी भागे हुए कौरवोंको खड़ा करके उन्हें पुनः
युद्धके लिये रणभूमिमें लौटा रहा है? ।। २५ १/२ ।।
अर्जुन उवाच
उद्यम्यात्मानमुग्राय कर्मणे वीर्यमास्थिताः ।। २६ ।।
धमन्ति कौरवाः शङ्खान् यस्य वीर्यं समाश्रिताः ।
यत्र ते संशयो राजन् न्यस्तशस्त्रे गुरौ हते ।। २७ ।।
धार्तराष्ट्रानवस्थाप्य क एष नदतीति हि ।
ह्रीमन्तं तं महाबाहुं मत्तद्विरदगामिनम् ।। २८ ।।
(इन्द्रविष्णुसमं वीर्ये कोपेऽन्तकमिव स्थितम् ।
बृहस्पतिसमं बुद्ध्या नीतिमन्तं महारथम् ।।)
आख्यास्याम्युग्रकर्माणं कुरूणामभयंकरम् ।
अर्जुनने कहा—राजन्! जिसके विषयमें आपको यह संदेह होता है कि शस्त्रोंका
परित्याग कर देनेवाले गुरुदेव द्रोणाचार्यके मारे जानेपर यह कौन वीर कौरव-सैनिकोंको
दृढ़तापूर्वक स्थापित करके सिंहनाद कर रहा है तथा जिसके बल और पराक्रमका आश्रय
लेकर पराक्रमी कौरव अपनेको भयंकर कर्म करनेके लिये उद्यत करके शंखध्वनि कर रहे
हैं; जो महाबाहु मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलनेवाला और लज्जाशील है, जो
बलमें इन्द्र और विष्णुके समान, क्रोधमें यमराजके सदृश तथा बुद्धिमें बृहस्पतिके तुल्य है,
जो नीतिमान्, महारथी, उग्र कर्म करनेमें समर्थ तथा कौरवोंको अभयदान देनेवाला है, उस
वीरका परिचय देता हूँ, सुनिये ॥ २६—२८१/२ ॥
यस्मिञ्जाते ददौ द्रोणो गवां दशशतं धनम् ॥ २९ ॥
ब्राह्मणेभ्यो महार्हेभ्यः सोऽश्वत्थामैष गर्जति ।
जिसके जन्म लेनेपर आचार्य द्रोणने परम सुयोग्य ब्राह्मणोंको एक सहस्र गौएँ दान की
थीं, वही अश्वत्थामा यह गर्जना कर रहा है ॥ २९१/२ ॥
जातमात्रेण वीरेण येनोच्चैःश्रवसा यथा ॥ ३० ॥
हेषता कम्पिता भूमिर्लोकाश्च सकलास्त्रयः ।
तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतं नाम तस्याकरोत् तदा ॥ ३१ ॥
अश्वत्थामेति सोऽद्यैष शूरो नदति पाण्डव ।
पाण्डुनन्दन! जिस वीरने जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा अश्वके समान हिनहिनाकर पृथ्वी
तथा तीनों लोकोंको कम्पित कर दिया था और उस शब्दको सुनकर किसी अदृश्य प्राणीने
उस समय उसका नाम 'अश्वत्थामा' रख दिया था, यह वही शूरवीर अश्वत्थामा सिंहनाद
कर रहा है ॥ ३०-३११/२ ॥
यो ह्यनाथ इवाक्रम्य पार्षतेन हतस्तथा ॥ ३२ ॥
कर्मणा सुनृशंसेन तस्य नाथो व्यवस्थितः ।
द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने जिनपर आक्रमण करके अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मके द्वारा जिन्हें
अनाथके समान मार डाला था, उन्हींका यह रक्षक या सहायक उठ खड़ा हुआ है ॥ ३२१/२
॥
गुरुं मे यत्र पाञ्चाल्यः केशपक्षे परामृशत् ॥ ३३ ॥
तन्न जातु क्षमेद् द्रौणिर्जानन् पौरुषमात्मनः ।
पांचालराजकुमारने जो मेरे गुरुदेवका केश पकड़कर खींचा था, उसे अपने पुरुषार्थको
जाननेवाला अश्वत्थामा कभी क्षमा नहीं कर सकता ॥ ३३१/२ ॥
उपतीर्णो गुरुर्मिथ्या भवता राज्यकारणात् ॥ ३४ ॥
धर्मज्ञेन सता नाम सोऽधर्मः सुमहान् कृतः ।
आपने धर्मज्ञ होते हुए भी राज्यके लोभसे झूठ बोलकर जो अपने गुरुको धोखा दिया,
वह महान् पाप किया है ॥ ३४१/२ ॥
चिरं स्थास्यति चाकीर्तिस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ३५ ॥
रामे वालिवधाद् यद्वदेवं द्रोणे निपातिते ।
अतः छिपकर वालीका वध करनेके कारण जैसे श्रीरामचन्द्रजीको अपयश मिला, उसी प्रकार झूठ बोलकर द्रोणाचार्यको मरवा देनेके कारण चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें आपकी अकीर्ति चिरस्थायिनी हो जायगी ॥ ३५ १/२ ॥
सर्वधर्मोपपन्नोऽयं स मे शिष्यश्च पाण्डवः ॥ ३६ ॥
नायं वदति मिथ्येति प्रत्ययं कृतवांस्त्वयि ।
आचार्यने यह समझकर आपपर विश्वास किया था कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर सब धर्मोंके ज्ञाता और मेरे शिष्य हैं। ये कभी झूठ नहीं बोलते हैं ॥ ३६ १/२ ॥
स सत्यकञ्चुकं नाम प्रविष्टेन ततोऽनृतम् ॥ ३७ ॥
आचार्य उक्तो भवता हतः कुञ्जर इत्युत ।
परंतु आपने सत्यका चोला पहनकर आचार्यसे झूठे ही कह दिया कि 'अश्वत्थामा मारा गया।' उसी नामका हाथी मारा गया था, इसलिये आपने उसकी आड़ लेकर झूठ कहा ॥ ३७ १/२ ॥
ततः शस्त्रं समुत्सृज्य निर्ममो गतचेतनः ॥ ३८ ॥
आसीत् सुविह्वलो राजन् यथा दृष्टस्त्वया विभुः ।
फिर वे हथियार डालकर अपने प्राणोंकी ममतासे रहित हो अचेत हो गये। राजन्! उस समय शक्तिशाली होनेपर भी वे कितने व्याकुल हो गये थे, यह आपने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ३८ १/२ ॥
स तु शोकसमाविष्टो विमुखः पुत्रवत्सलः ॥ ३९ ॥
शाश्वतं धर्ममुत्सृज्य गुरुः शस्त्रेण घातितः ।
पुत्रवत्सल गुरुदेव बेटेके शोकमें मग्न होकर युद्धसे विमुख हो गये थे। उस अवस्थामें आपने सनातनधर्मकी अवहेलना करके उन्हें शस्त्रसे मरवा डाला ॥ ३९ १/२ ॥
न्यस्तशस्त्रमधर्मेण घातयित्वा गुरुं भवान् ॥ ४० ॥
रक्षत्विदानीं सामात्यो यदि शक्तोऽसि पार्षतम् ।
ग्रस्तमाचार्यपुत्रेण क्रुद्धेन हतबन्धुना ॥ ४१ ॥
जिसके पिता मारे गये हैं, वह आचार्यपुत्र अश्वत्थामा आज कुपित होकर धृष्टद्युम्नको कालका ग्रास बनाना चाहता है। अस्त्र त्यागकर निहत्थे हुए गुरुदेवको अधर्मपूर्वक मरवाकर अब आप मन्त्रियों-सहित उसके सामने जाइये और यदि शक्ति हो तो धृष्टद्युम्नकी रक्षा कीजिये ॥ ४१-४१ ॥
सर्वे वयं परित्रातुं न शक्ष्यामोऽद्य पार्षतम् ।
सौहार्दं सर्वभूतेषु यः करोत्यतिमानुषः ।
सोऽद्य केशग्रहं श्रुत्वा पितुर्धक्ष्यति नो रणे ॥ ४२ ॥
आज हम सब लोग मिलकर भी धृष्टद्युम्नको नहीं बचा सकेंगे। जो अश्वत्थामा अतिमानव (अलौकिक पुरुष) है और समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, वही आज अपने पिताके केश पकड़े जानेकी बात सुनकर समरांगणमें हम सब लोगोंको जलाकर भस्म कर देगा ।। ४२ ।।
विक्रोशमाने हि मयि भृशमाचार्यगृद्धिनि । अपाकीर्य स्वयं धर्मं शिष्येण निहतो गुरुः ।। ४३ ।। मैं आचार्यके प्राणोंकी रक्षा चाहता हुआ बारंबार पुकारता ही रह गया, परंतु स्वयं शिष्य होकर भी धृष्टद्युम्नने धर्मको लात मारकर अपने गुरुकी हत्या कर डाली ।। ४३ ।।
यदा गतं वयो भूयः शिष्टमल्पतरं च नः । तस्येदानीं विकारोऽयमधर्मोऽयं कृतो महान् ।। ४४ ।। अब हमलोगोंकी आयुका अधिकांश भाग बीत चुका है और बहुत थोड़ा ही शेष रह गया है। इसीसे इस समय हमारा मस्तिष्क खराब हो गया और हमलोगोंने यह महान् पाप कर डाला है ।। ४४ ।।
पितेव नित्यं सौहार्दात् पितेव हि च धर्मतः । सोऽल्पकालस्य राज्यस्य कारणाद् घातितो गुरुः ।। ४५ ।। जो सदा पिताकी भाँति हमलोगोंपर स्नेह रखते और हमारा हित चाहते थे, धर्मदृष्टिसे भी जो हमारे पिताके ही तुल्य थे, उन्हीं गुरुदेवको हमने इस क्षणभंगुर राज्यके लिये मरवा दिया ।। ४५ ।।
धृतराष्ट्रेण भीष्माय द्रोणाय च विशाम्पते । विसृष्टा पृथिवी सर्वा सह पुत्रैश्च तत्परैः ।। ४६ ।। प्रजानाथ! धृतराष्ट्रने भीष्म और द्रोणको उनकी सेवामें रहनेवाले अपने पुत्रोंके साथ ही इस सारी पृथिवीका राज्य सौंप दिया था ।। ४६ ।।
सम्प्राप्य तादृशीं वृत्तिं सत्कृतः सततं परैः । अवृणीत सदा पुत्रान् मामेवाभ्यधिकं गुरुः ।। ४७ ।। हमारे शत्रु सदा आचार्यका सत्कार किया करते थे। उनके द्वारा वैसी उत्तम जीविका-वृत्ति पाकर भी आचार्य सदा मुझे ही अपने पुत्रसे बढ़कर मानते रहे हैं ।। ४७ ।।
अवेक्षमाणस्त्वां मां च न्यस्तास्त्रश्चाहवे हतः । न त्वेनं युध्यमानं वै हन्यादपि शतक्रतुः ।। ४८ ।। उन्होंने आपको और मुझको देखकर युद्धमें हथियार डाल दिया और मारे गये। यदि वे युद्ध करते होते तो साक्षात् इन्द्र भी उन्हें मार नहीं सकते थे ।। ४८ ।।
तस्याचार्यस्य वृद्धस्य द्रोहो नित्योपकारिणः । कृत्वे ह्यनार्यैरस्माभी राज्यार्थे लुब्धबुद्धिभिः ।। ४९ ।।
हमारी बुद्धि लोभसे ग्रस्त है, हम नीचोंने राज्यके लिये सदा उपकार करनेवाले बूढ़े आचार्यके साथ द्रोह किया है ।।
अहो बत महत् पापं कृतं कर्म सुदारुणम् ।
यद् राज्यसुखलोभेन द्रोणोऽयं साधु घातितः ॥ ५० ॥
ओह! हमने यह अत्यन्त भयंकर महान् पापकर्म कर डाला है, जो कि राज्य-सुखके लोभमें पड़कर इन आचार्य द्रोणकी पूर्णतः हत्या करा दी ॥ ५० ॥
पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄन् दाराञ्जीवितं चैव वासविः ।
त्यजेत् सर्वं मम प्रेम्णा जानात्येवं हि मे गुरुः ॥ ५१ ॥
मेरे गुरुदेव ऐसा समझते थे कि अर्जुन मेरे प्रेमवश आवश्यकता हो तो अपने पिता, पुत्र, भाई, स्त्री तथा प्राण—सबका त्याग कर सकता है ॥ ५१ ॥
स मया राज्यकामेन हन्यमानो ह्युपेक्षितः ।
तस्मादर्वाक्शिरा राजन् प्राप्तोऽस्मि नरकं प्रभो ॥ ५२ ॥
किंतु मैंने राज्यके लोभमें पड़कर उनके मारे जानेकी उपेक्षा कर दी। राजन्! प्रभो! इस पापके कारण अब मैं नीचे सिर करके नरकमें डाला जाऊँगा ॥ ५२ ॥
ब्राह्मणं वृद्धमाचार्यं न्यस्तशस्त्रं महामुनिम् ।
घातयित्वाद्य राज्यार्थे मृतं श्रेयो न जीवितम् ॥ ५३ ॥
एक तो वे ब्राह्मण, दूसरे वृद्ध और तीसरे अपने आचार्य थे। इसके सिवा उन्होंने हथियार नीचे डाल दिया था और महान् मुनिवृत्तिका आश्रय लेकर बैठे हुए थे। इस अवस्थामें राज्यके लिये उनकी हत्या कराकर मैं जीनेकी अपेक्षा मर जाना ही अच्छा समझता हूँ ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि अर्जुनवाक्ये
षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५४ श्लोक हैं।)
१९७-
सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेनके वीरोचित उद्गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन
संजय उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नोचुस्तत्र महारथाः । अप्रियं वा प्रियं वापि महाराज धनंजयम् ॥ १ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! अर्जुनकी यह बात सुनकर वहाँ बैठे हुए सब महारथी मौन रह गये। उनसे प्रिय या अप्रिय कुछ नहीं बोले ॥ १ ॥
ततः क्रुद्धो महाबाहुर्भीमसेनोऽभ्यभाषत । कुत्सयन्निव कौन्तेयमर्जुनं भरतर्षभ ॥ २ ॥ भरतश्रेष्ठ! तब महाबाहु भीमसेनको क्रोध चढ़ आया। उन्होंने कुन्तीकुमार अर्जुनको फटकारते हुए-से कहा ॥ २ ॥
मुनिर्यथारण्यगतो भाषसे धर्मसंहितम् । न्यस्तदण्डो यथा पार्थ ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ ३ ॥ 'पार्थ! वनवासी मुनि अथवा किसी भी प्राणीको दण्ड न देते हुए कठोर व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण जिस प्रकार धर्मका उपदेश करता है, उसी प्रकार तुम भी धर्मसम्मत बातें कह रहे हो ॥ ३ ॥
क्षतत्राता क्षताज्जीवन् क्षन्ता स्त्रीष्वपि साधुषु । क्षत्रियः क्षितिमाप्नोति क्षिप्रं धर्मं यशः श्रियः ॥ ४ ॥ 'परंतु जो क्षति (संकट)-से अपना तथा दूसरोंका त्राण करता है, युद्धमें शत्रुओंको क्षति पहुँचाना ही जिसकी जीविका है तथा जो स्त्रियों और साधु पुरुषोंपर क्षमाभाव रखता है, वही क्षत्रिय है और उसे ही शीघ्र इस पृथ्वीके राज्य, धर्म, यश और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥
स भवान् क्षत्रियगुणैर्युक्तः सर्वैः कुलोद्वहः । अविपश्चिद् यथा वाचं व्याहरन् नाद्य शोभसे ॥ ५ ॥ 'तुम समस्त क्षत्रियोचित गुणोंसे सम्पन्न और इस कुलका भार वहन करनेमें समर्थ होते हुए भी आज मूर्खके समान बातें कर रहे हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता ॥ ५ ॥
पराक्रमस्ते कौन्तेय शक्रस्येव शचीपतेः । न चाति वर्तसे धर्मं वेलामिव महोदधिः ॥ ६ ॥
‘कुन्तीनन्दन! तुम्हारा पराक्रम शचीपति इन्द्रके समान है। महासागर जैसे अपनी तट-भूमिका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार तुम भी कभी धर्म-मर्यादाका उल्लंघन नहीं करते हो ॥ ६ ॥
न पूजयेत् त्वां को न्वद्य यत् त्रयोदशवार्षिकम् ।
अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा धर्ममेवाभिकाङ्क्षसे ॥ ७ ॥
‘आज तेरह वर्षोंसे संचित किये हुए अमर्षको पीछे करके जो तुम धर्मकी ही अभिलाषा रखते हो, इसके लिये कौन तुम्हारी पूजा नहीं करेगा? ॥ ७ ॥
दिष्ट्या तात मनस्तेऽद्य स्वधर्ममनुवर्तते ।
आनृशंस्ये च ते दिष्ट्या बुद्धिः सततमच्युत ॥ ८ ॥
‘तात! सौभाग्यकी बात है कि इस समय भी तुम्हारा मन अपने धर्मका ही अनुसरण करता है। धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले मेरे भाई! तुम्हारी बुद्धि क्रूरताकी ओर न जाकर जो सदा दयाभावमें ही रम रही है, यह भी कम सौभाग्यकी बात नहीं है ॥ ८ ॥
यत् तु धर्मप्रवृत्तस्य हृतं राज्यमधर्मतः ।
द्रौपदी च परामृष्टा सभामानीय शत्रुभिः ॥ ९ ॥
वनं प्रब्राजिताश्चास्म वल्कलाजिनवाससः ।
अनर्हमाणास्तं भावं त्रयोदश समाः परैः ॥ १० ॥
‘परंतु धर्ममें तत्पर रहनेपर भी जो शत्रुओंने अधर्मसे हमारा राज्य छीन लिया, द्रौपदीको सभामें लाकर अपमानित किया तथा हमें वल्कल और मृगचर्म पहनाकर तेरह वर्षोंके लिये जो वनमें निर्वासित कर दिया, हम वैसे बर्तावके योग्य कदापि नहीं थे ॥ ९-१० ॥
एतान्यमर्षस्थानानि मर्षितानि मयानघ ।
क्षत्रधर्मप्रसक्तेन सर्वमेतदनुष्ठितम् ॥ ११ ॥
‘अनघ! ये सारे अन्याय अमर्षके स्थान थे—असह्य थे, परंतु मैंने सब चुपचाप सह लिये। क्षत्रिय-धर्ममें आसक्त होनेके कारण ही यह सब कुछ सहन किया गया है ॥ ११ ॥
तमधर्ममपाकृष्टं स्मृत्वाद्य सहितस्त्वया ।
सानुबन्धान् हनिष्यामि क्षुद्रान् राज्यहरानहम् ॥ १२ ॥
‘परंतु अब उनके उन नीचतापूर्ण पापकर्मोंको याद करके मैं तुम्हारे साथ रहकर अपने राज्यका अपहरण करनेवाले इन नीच शत्रुओंको उनके सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा ॥ १२ ॥
त्वया हि कथितं पूर्वं युद्धायाभ्यागता वयम् ।
घटामहे यथाशक्ति त्वं तु नोऽद्य जुगुप्ससे ॥ १३ ॥
‘तुमने ही पहले युद्धके लिये कहा था और उसीके अनुसार हम यहाँ आकर यथाशक्ति उसके लिये प्रयत्न कर रहे हैं, परंतु आज तुम्हीं हमारी निन्दा करते हो! ॥ १३ ॥
स्वधर्मं नेच्छसे ज्ञातुं मिथ्यावचनमेव ते । भयार्दितानामस्माकं वाचा मर्माणि कृन्तसि ॥ १४ ॥ ‘तुम अपने क्षत्रिय-धर्मको नहीं जानना चाहते। तुम्हारी ये सारी बातें मिथ्या ही हैं। एक तो हम स्वयं ही भयसे पीड़ित हो रहे हैं, ऊपरसे तुम भी अपने वाग्बाणोंद्वारा हमारे मर्मस्थानोंको छेदे डालते हो ॥ १४ ॥
वपन् व्रणे क्षारमिव क्षतानां शत्रुकर्शन । विदीर्यते मे हृदयं त्वया वाक्शल्यपीडितम् ॥ १५ ॥ ‘शत्रुसूदन! जैसे कोई घायल मनुष्योंके घावपर नमक बिखेर दे (और वे वेदनासे छटपटाने लगें), उसी प्रकार तुम अपने वाग्बाणोंसे पीड़ित करके मेरे हृदयको विदीर्ण किये डालते हो ॥ १५ ॥
अधर्ममेनं विपुलं धार्मिकः सन् न बुध्यसे । यत् त्वामात्मानमस्मांश्च प्रशस्यान् न प्रशंससि ॥ १६ ॥ ‘यद्यपि तुम और हम प्रशंसाके पात्र हैं, तो भी तुम जो अपनी और हमारी प्रशंसा नहीं करते हो, यह बहुत बड़ा अधर्म है और तुम धार्मिक होते हुए इस अधर्मको नहीं समझ रहे हो ॥ १६ ॥
वासुदेवे स्थिते चापि द्रोणपुत्रं प्रशंससि । यः कलां षोडशीं पूर्णां धनंजय न तेऽर्हति ॥ १७ ॥ ‘धनंजय! भगवान् श्रीकृष्णके रहते हुए भी तुम द्रोणपुत्रकी प्रशंसा करते हो, जो तुम्हारी पूरी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है ॥ १७ ॥
स्वयमेवात्मनो दोषान् ब्रुवाणः किन्न लज्जसे । दारयेयं महीं क्रोधाद् विकिरेयं च पर्वतान् ॥ १८ ॥ आविध्येतां गदां गुर्वीं भीमां काञ्चनमालिनीम् । गिरिप्रकाशान् क्षितिजान् भञ्जेयमनिलो यथा ॥ १९ ॥ ‘स्वयं ही अपने दोषोंका वर्णन करते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती है? आज मैं अपनी इस सुवर्णभूषित भयंकर एवं भारी गदाको क्रोधपूर्वक घुमाकर इस पृथ्वीको विदीर्ण कर सकता हूँ, पर्वतोंको चूर-चूर करके बिखेर सकता हूँ तथा प्रचण्ड आँधीकी तरह पर्वतपर प्रकाशित होनेवाले ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको भी तोड़ और उखाड़ सकता हूँ ॥ १८-१९ ॥
द्रावयेयं शरैश्चापि सेन्द्रान् देवान् समागतान् । सराक्षसगणान् पार्थ सासुरोरगमानवान् ॥ २० ॥ ‘पार्थ! असुर, नाग, मानव तथा राक्षसगणोंसहित सम्पूर्ण देवता और इन्द्र भी आ जायँ तो मैं उन्हें बाणोंद्वारा मारकर भगा सकता हूँ ॥ २० ॥
स त्वमेवंविधं जानन् भ्रातरं मां नरर्षभ ।
द्रोणपुत्राद् भयं कर्तुं नार्हस्यमितविक्रम ॥ २१ ॥
'अमित पराक्रमी नरश्रेष्ठ अर्जुन! मुझ अपने भ्राताको ऐसा जानकर तुम्हें द्रोणपुत्रसे भय नहीं करना चाहिये ॥ २१ ॥
अथवा तिष्ठ बीभत्सो सह सर्वैः सहोदरैः ।
अहमेनं गदापाणिर्जेष्याम्येको महाहवे ॥ २२ ॥
'अथवा अर्जुन! तुम अपने समस्त भाइयोंके साथ यहीं खड़े रहो। मैं हाथमें गदा लेकर इस महासमरमें अकेला ही अश्वत्थामाको परास्त करूँगा' ॥ २२ ॥
ततः पाञ्चालराजस्य पुत्रः पार्थमथाब्रवीत् ।
संक्रुद्धमिव नर्दन्तं हिरण्यकशिपुर्हरिम् ॥ २३ ॥
तदनन्तर जैसे पूर्वकालमें अत्यन्त क्रुद्ध होकर दहाड़ते हुए नृसिंहावतारधारी भगवान् विष्णुसे दैत्यराज हिरण्यकशिपुने बातें की थी, उसी प्रकार वहाँ अर्जुनसे पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने इस प्रकार कहा ॥ २३ ॥
धृष्टद्युम्न उवाच
बीभत्सो विप्रकर्माणि विदितानि मनीषिणाम् ।
याजनाध्यापने दानं तथा यज्ञप्रतिग्रहौ ॥ २४ ॥
षष्ठमध्ययनं नाम तेषां कस्मिन् प्रतिष्ठितः ।
हतो द्रोणो मया ह्येवं किं मां पार्थ विगर्हसे ॥ २५ ॥
अपक्रान्तः स्वधर्माच्च क्षात्रधर्मं व्यपाश्रितः ।
अमानुषेण हन्त्यस्मानस्त्रेण क्षुद्रकर्मकृत् ॥ २६ ॥
धृष्टद्युम्न बोला—'अर्जुन! यज्ञ करना और कराना, वेदोंको पढ़ना और पढ़ाना तथा दान देना और प्रतिग्रह स्वीकार करना—ये छः कर्म ही ब्राह्मणोंके लिये मनीषी पुरुषोंमें प्रसिद्ध हैं। इनमेंसे किस कर्ममें द्रोणाचार्य प्रतिष्ठित थे। अपने धर्मसे भ्रष्ट होकर उन्होंने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय ले रखा था। पार्थ! ऐसी अवस्थामें यदि मैंने द्रोणाचार्यका वध किया तो तुम इसके लिये मेरी निन्दा क्यों करते हो। वह नीच कर्म करनेवाला ब्राह्मण दिव्यास्त्रोंद्वारा हमलोगोंका संहार करता था ॥ २४–२६ ॥
तथा मायां प्रयुञ्जानमसह्यं ब्राह्मणब्रुवम् ।
माययैव विहन्याद् यो न युक्तं पार्थ तत्र किम् ॥ २७ ॥
कुन्तीनन्दन! जो ब्राह्मण कहलाकर भी दूसरोंके लिये मायाका प्रयोग करता हो और असह्य हो उठा हो, उसे यदि कोई मायासे ही मार डाले तो इसमें अनुचित क्या है? ॥ २७ ॥
तस्मिंस्तथा मया शस्ते यदि द्रौणायनी रुषा ।
कुरुते भैरवं नादं तत्र किं मम हीयते ॥ २८ ॥
मेरे द्वारा द्रोणाचार्यके इस अवस्थामें मारे जानेपर यदि द्रोणपुत्र क्रोधपूर्वक भयानक गर्जना करता हो तो उसमें मेरी क्या हानि है? ।। २८ ।। न चाद्भुतमिदं मन्ये यद् द्रौणिर्युद्धसंज्ञया । घातयिष्यति कौरव्यान् परित्रातुमशक्नुवन् ।। २९ ।। मैं इसे कोई अद्भुत बात नहीं मान रहा हूँ; अश्वत्थामा इस युद्धके द्वारा कौरवोंको मरवा डालेगा; क्योंकि वह स्वयं उनकी रक्षा करनेमें असमर्थ है ।। २९ ।। यच्च मां धार्मिको भूत्वा ब्रवीषि गुरुघातिनम् । तदर्थमहमुत्पन्नः पाञ्चाल्यस्य सुतोऽनलात् ।। ३० ।। इसके सिवा तुम धार्मिक होकर जो मुझे गुरुकी हत्या करनेवाला बता रहे हो, वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि मैं इसीलिये अग्निकुण्डसे पांचालराजका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ था ।। ३० ।। यस्य कार्यमकार्यं वा युध्यतः स्यात् समं रणे । तं कथं ब्राह्मणं ब्रूयाः क्षत्रियं वा धनंजय ।। ३१ ।। धनंजय! रणभूमिमें युद्ध करते समय जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों समान हों, उसे तुम ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय कैसे कह सकते हो? ।। ३१ ।। यो ह्यनस्त्रविदो हन्याद् ब्रह्मास्त्रैः क्रोधमूर्च्छितः । सर्वोपायैर्न स कथं वध्यः पुरुषसत्तम ।। ३२ ।। पुरुषप्रवर! जो क्रोधसे व्याकुल होकर ब्रह्मास्त्र न जाननेवालोंको भी ब्रह्मास्त्रसे ही मार डाले, उसका सभी उपायोंसे वध करना कैसे उचित नहीं है? ।। ३२ ।। विधर्मिणं धर्मविद्भिः प्रोक्तं तेषां विषोपमम् । जानन् धर्मार्थतत्त्वज्ञ किं मामर्जुन गर्हसे ।। ३३ ।। धर्म और अर्थका तत्त्व जाननेवाले अर्जुन! जो अपना धर्म छोड़कर परधर्म ग्रहण कर लेता है, उस विधर्मीको धर्मज्ञ पुरुषोंने धर्मात्माओंके लिये विषके तुल्य बताया है। यह सब जानते हुए भी तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो? ।। ३३ ।। नृशंसः स मयाऽऽक्रम्य रथ एव निपातितः । तन्मामनिन्द्यं बीभत्सो किमर्थं नाभिनन्दसे ।। ३४ ।। बीभत्सो! द्रोणाचार्य क्रूर एवं नृशंस थे, इसलिये मैंने रथपर ही आक्रमण करके उनको मार गिराया। अतः मैं निन्दाका पात्र नहीं हूँ। फिर तुम किसलिये मेरा अभिनन्दन नहीं करते हो? ।। ३४ ।। कालानलसमं पार्थ ज्वलनार्कविषोपमम् । भीमं द्रोणशिरश्छिन्नं न प्रशंससि मे कथम् ।। ३५ ।। पार्थ! द्रोणका मस्तक प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त भयंकर तथा लौकिक अग्नि, सूर्य एवं विषके तुल्य संताप देनेवाला था, अतः मैंने उसका छेदन किया है। इसके
लिये तुम मेरी प्रशंसा क्यों नहीं करते? ॥ ३५ ॥ योऽसौ ममैव नान्यस्य बान्धवान् युधि जघ्निवान् । छित्त्वापि तस्य मूर्धानं नैवास्मि विगतज्वरः ॥ ३६ ॥ जिसने युद्धके मैदानमें दूसरे किसीके नहीं, मेरे ही बन्धु-बान्धवोंका वध किया था, उसका मस्तक काट लेनेपर भी मेरा क्रोध और संताप शान्त नहीं हुआ ॥ ३६ ॥ तच्च मे कृन्तते मर्म यन्न तस्य शिरो मया । निषादविषये क्षिप्तं जयद्रथशिरो यथा ॥ ३७ ॥ जैसे तुमने जयद्रथके मस्तकको दूर फेंका था, उसी प्रकार मैंने द्रोणाचार्यके मस्तकको जो निषादोंके स्थानमें नहीं फेंक दिया, वह भूल मेरे मर्मस्थानोंका छेदन कर रही है ॥ अथावधश्च शत्रूणामधर्मः श्रूयतेऽर्जुन । क्षत्रियस्य हि धर्मोऽयं हन्याद्धन्येत वा पुनः ॥ ३८ ॥ अर्जुन! सुननेमें आया है कि शत्रुओंका वध न करना भी अधर्म ही है। क्षत्रियके लिये तो यह धर्म ही है कि वह युद्धमें शत्रुको मार डाले या फिर स्वयं उसके हाथसे मारा जाय ॥ ३८ ॥ स शत्रुर्निहतः संख्ये मया धर्मेण पाण्डव । यथा त्वया हतः शूरो भगदत्तः पितुः सखा ॥ ३९ ॥ पाण्डुनन्दन! द्रोणाचार्य मेरे शत्रु थे, अतः मैंने युद्धमें धर्मके अनुसार ही उनका वध किया है। ठीक उसी तरह, जैसे तुमने अपने पिताके प्रिय मित्र शूरवीर भगदत्तका वध किया था ॥ ३९ ॥ पितामहं रणे हत्वा मन्यसे धर्ममात्मनः । मया शत्रौ हते कस्मात् पापे धर्मं न मन्यसे ॥ ४० ॥ तुम युद्धमें पितामहको मारकर भी अपने लिये तो धर्म ही मानते हो, किंतु मेरे द्वारा एक पापी शत्रुके मारे जानेपर भी इस कार्यको धर्म नहीं समझते; इसका क्या कारण है? ॥ सम्बन्धावनतं पार्थ न मां त्वं वक्तुमर्हसि । स्वगात्रकृतसोपानं निष्षण्णमिव दन्तिनम् ॥ ४१ ॥ पार्थ! जैसे हाथी सम्बन्ध स्थापित कर लेनेपर लोगोंको अपने ऊपर चढ़ानेके लिये अपने ही शरीरकी सीढ़ी बनाकर बैठ जाता है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ सम्बन्ध होनेके कारण नतमस्तक होता हूँ; अतः तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिये ॥ ४१ ॥ क्षमामि ते सर्वमेव वाग्व्यतिक्रममर्जुन । द्रौपद्या द्रौपदेयानां कृते नान्येन हेतुना ॥ ४२ ॥ अर्जुन! मैं अपनी बहिन द्रौपदी और उसके पुत्रोंके नाते ही तुम्हारी इन सारी उलटी या कड़वी बातोंको सहे लेता हूँ, दूसरे किसी कारणसे नहीं ॥ ४२ ॥
कुलक्रमागतं वैरं ममाचार्येण विश्रुतम् । तथा जानात्ययं लोको न यूयं पाण्डुनन्दनाः ॥ ४३ ॥ द्रोणाचार्यके साथ मेरा वंशपरम्परागत वैर चला आ रहा है, जो बहुत प्रसिद्ध है। उसे यह सारा संसार जानता है; क्या तुम पाण्डवोंको इसका पता नहीं है? ॥ ४३ ॥ नानृती पाण्डवो ज्येष्ठो नाहं वाधार्मिकोऽर्जुन । शिष्यद्रोही हतः पापो युध्यस्व विजयस्तव ॥ ४४ ॥ अर्जुन! तुम्हारे बड़े भाई पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर असत्यवादी नहीं हैं और न मैं ही अधर्मी हूँ। द्रोणाचार्य पापी और शिष्यद्रोही थे, इसलिये मारे गये। अब तुम युद्ध करो; विजय तुम्हारे हाथमें है ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृष्टद्युम्नवाक्ये सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृष्टद्युम्नवाक्यविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९७ ॥