महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1487, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं; जो महाबाहु मतवाले हाथीके समान मस्तानी चालसे चलनेवाला और लज्जाशील है, जो
बलमें इन्द्र और विष्णुके समान, क्रोधमें यमराजके सदृश तथा बुद्धिमें बृहस्पतिके तुल्य है,
जो नीतिमान्, महारथी, उग्र कर्म करनेमें समर्थ तथा कौरवोंको अभयदान देनेवाला है, उस
वीरका परिचय देता हूँ, सुनिये ॥ २६—२८१/२ ॥
यस्मिञ्जाते ददौ द्रोणो गवां दशशतं धनम् ॥ २९ ॥
ब्राह्मणेभ्यो महार्हेभ्यः सोऽश्वत्थामैष गर्जति ।
जिसके जन्म लेनेपर आचार्य द्रोणने परम सुयोग्य ब्राह्मणोंको एक सहस्र गौएँ दान की
थीं, वही अश्वत्थामा यह गर्जना कर रहा है ॥ २९१/२ ॥
जातमात्रेण वीरेण येनोच्चैःश्रवसा यथा ॥ ३० ॥
हेषता कम्पिता भूमिर्लोकाश्च सकलास्त्रयः ।
तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतं नाम तस्याकरोत् तदा ॥ ३१ ॥
अश्वत्थामेति सोऽद्यैष शूरो नदति पाण्डव ।
पाण्डुनन्दन! जिस वीरने जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा अश्वके समान हिनहिनाकर पृथ्वी
तथा तीनों लोकोंको कम्पित कर दिया था और उस शब्दको सुनकर किसी अदृश्य प्राणीने
उस समय उसका नाम 'अश्वत्थामा' रख दिया था, यह वही शूरवीर अश्वत्थामा सिंहनाद
कर रहा है ॥ ३०-३११/२ ॥
यो ह्यनाथ इवाक्रम्य पार्षतेन हतस्तथा ॥ ३२ ॥
कर्मणा सुनृशंसेन तस्य नाथो व्यवस्थितः ।
द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने जिनपर आक्रमण करके अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मके द्वारा जिन्हें
अनाथके समान मार डाला था, उन्हींका यह रक्षक या सहायक उठ खड़ा हुआ है ॥ ३२१/२
॥
गुरुं मे यत्र पाञ्चाल्यः केशपक्षे परामृशत् ॥ ३३ ॥
तन्न जातु क्षमेद् द्रौणिर्जानन् पौरुषमात्मनः ।
पांचालराजकुमारने जो मेरे गुरुदेवका केश पकड़कर खींचा था, उसे अपने पुरुषार्थको
जाननेवाला अश्वत्थामा कभी क्षमा नहीं कर सकता ॥ ३३१/२ ॥
उपतीर्णो गुरुर्मिथ्या भवता राज्यकारणात् ॥ ३४ ॥
धर्मज्ञेन सता नाम सोऽधर्मः सुमहान् कृतः ।
आपने धर्मज्ञ होते हुए भी राज्यके लोभसे झूठ बोलकर जो अपने गुरुको धोखा दिया,
वह महान् पाप किया है ॥ ३४१/२ ॥
चिरं स्थास्यति चाकीर्तिस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ३५ ॥
रामे वालिवधाद् यद्वदेवं द्रोणे निपातिते ।