महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1486, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुहुर्मुहुरुदीर्यन्ते कम्पयन्त्यपि मामकान् ।
कौरव-सेनारूपी समुद्रमें यह कोलाहल अत्यन्त तीव्र वेगसे होने लगा है और बारंबार
बढ़ता जा रहा है, जो मेरे सैनिकोंको कम्पित किये देता है ।। २१ १/२ ।।
य एष तुमुलः शब्दः श्रूयते लोमहर्षणः ।। २२ ।।
सेन्द्रानप्येष लोकांस्त्रीन् ग्रसेदिति मतिर्मम ।
यह जो महाभयंकर रोमांचकारी शब्द सुनायी देता है, यह इन्द्रसहित तीनों लोकोंको
ग्रस लेगा, ऐसा मुझे जान पड़ता है ।। २२ १/२ ।।
मन्ये वज्रधरस्यैष निनादो भैरवस्वनः ।। २३ ।।
द्रोणे हते कौरवार्थं व्यक्तमभ्येति वासवः ।
मैं समझता हूँ, यह भयंकर शब्द वज्रधारी इन्द्रकी गर्जना है। द्रोणाचार्यके मारे जानेपर
कौरवोंकी सहायताके लिये साक्षात् इन्द्र आ रहे हैं, यह स्पष्ट जान पड़ता है ।।
प्रहृष्टरोमकूपाश्च संविग्ना रथपुङ्गवाः ।। २४ ।।
धनंजय गुरुं श्रुत्वा तत्र नादं सुभीषणम् ।
धनंजय! यह अत्यन्त भीषण और भारी सिंहनाद सुनकर हमारे श्रेष्ठ रथी भी उद्विग्न हो
उठे हैं और इनके रोंगटे खड़े हो गये हैं ।। २४ १/२ ।।
क एष कौरवान् दीर्नानवस्थाप्य महारथः ।। २५ ।।
निवर्तयति युद्धार्थं मृधे देवेश्वरो यथा ।
देवराज इन्द्रके समान यह कौन महारथी भागे हुए कौरवोंको खड़ा करके उन्हें पुनः
युद्धके लिये रणभूमिमें लौटा रहा है? ।। २५ १/२ ।।
अर्जुन उवाच
उद्यम्यात्मानमुग्राय कर्मणे वीर्यमास्थिताः ।। २६ ।।
धमन्ति कौरवाः शङ्खान् यस्य वीर्यं समाश्रिताः ।
यत्र ते संशयो राजन् न्यस्तशस्त्रे गुरौ हते ।। २७ ।।
धार्तराष्ट्रानवस्थाप्य क एष नदतीति हि ।
ह्रीमन्तं तं महाबाहुं मत्तद्विरदगामिनम् ।। २८ ।।
(इन्द्रविष्णुसमं वीर्ये कोपेऽन्तकमिव स्थितम् ।
बृहस्पतिसमं बुद्ध्या नीतिमन्तं महारथम् ।।)
आख्यास्याम्युग्रकर्माणं कुरूणामभयंकरम् ।
अर्जुनने कहा—राजन्! जिसके विषयमें आपको यह संदेह होता है कि शस्त्रोंका
परित्याग कर देनेवाले गुरुदेव द्रोणाचार्यके मारे जानेपर यह कौन वीर कौरव-सैनिकोंको
दृढ़तापूर्वक स्थापित करके सिंहनाद कर रहा है तथा जिसके बल और पराक्रमका आश्रय
लेकर पराक्रमी कौरव अपनेको भयंकर कर्म करनेके लिये उद्यत करके शंखध्वनि कर रहे