भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1488

अतः छिपकर वालीका वध करनेके कारण जैसे श्रीरामचन्द्रजीको अपयश मिला, उसी प्रकार झूठ बोलकर द्रोणाचार्यको मरवा देनेके कारण चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें आपकी अकीर्ति चिरस्थायिनी हो जायगी ॥ ३५ १/२ ॥
सर्वधर्मोपपन्नोऽयं स मे शिष्यश्च पाण्डवः ॥ ३६ ॥
नायं वदति मिथ्येति प्रत्ययं कृतवांस्त्वयि ।
आचार्यने यह समझकर आपपर विश्वास किया था कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर सब धर्मोंके ज्ञाता और मेरे शिष्य हैं। ये कभी झूठ नहीं बोलते हैं ॥ ३६ १/२ ॥
स सत्यकञ्चुकं नाम प्रविष्टेन ततोऽनृतम् ॥ ३७ ॥
आचार्य उक्तो भवता हतः कुञ्जर इत्युत ।
परंतु आपने सत्यका चोला पहनकर आचार्यसे झूठे ही कह दिया कि 'अश्वत्थामा मारा गया।' उसी नामका हाथी मारा गया था, इसलिये आपने उसकी आड़ लेकर झूठ कहा ॥ ३७ १/२ ॥
ततः शस्त्रं समुत्सृज्य निर्ममो गतचेतनः ॥ ३८ ॥
आसीत् सुविह्वलो राजन् यथा दृष्टस्त्वया विभुः ।
फिर वे हथियार डालकर अपने प्राणोंकी ममतासे रहित हो अचेत हो गये। राजन्! उस समय शक्तिशाली होनेपर भी वे कितने व्याकुल हो गये थे, यह आपने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ३८ १/२ ॥
स तु शोकसमाविष्टो विमुखः पुत्रवत्सलः ॥ ३९ ॥
शाश्वतं धर्ममुत्सृज्य गुरुः शस्त्रेण घातितः ।
पुत्रवत्सल गुरुदेव बेटेके शोकमें मग्न होकर युद्धसे विमुख हो गये थे। उस अवस्थामें आपने सनातनधर्मकी अवहेलना करके उन्हें शस्त्रसे मरवा डाला ॥ ३९ १/२ ॥
न्यस्तशस्त्रमधर्मेण घातयित्वा गुरुं भवान् ॥ ४० ॥
रक्षत्विदानीं सामात्यो यदि शक्तोऽसि पार्षतम् ।
ग्रस्तमाचार्यपुत्रेण क्रुद्धेन हतबन्धुना ॥ ४१ ॥
जिसके पिता मारे गये हैं, वह आचार्यपुत्र अश्वत्थामा आज कुपित होकर धृष्टद्युम्नको कालका ग्रास बनाना चाहता है। अस्त्र त्यागकर निहत्थे हुए गुरुदेवको अधर्मपूर्वक मरवाकर अब आप मन्त्रियों-सहित उसके सामने जाइये और यदि शक्ति हो तो धृष्टद्युम्नकी रक्षा कीजिये ॥ ४१-४१ ॥
सर्वे वयं परित्रातुं न शक्ष्यामोऽद्य पार्षतम् ।
सौहार्दं सर्वभूतेषु यः करोत्यतिमानुषः ।
सोऽद्य केशग्रहं श्रुत्वा पितुर्धक्ष्यति नो रणे ॥ ४२ ॥