महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1489, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंआज हम सब लोग मिलकर भी धृष्टद्युम्नको नहीं बचा सकेंगे। जो अश्वत्थामा अतिमानव (अलौकिक पुरुष) है और समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, वही आज अपने पिताके केश पकड़े जानेकी बात सुनकर समरांगणमें हम सब लोगोंको जलाकर भस्म कर देगा ।। ४२ ।।
विक्रोशमाने हि मयि भृशमाचार्यगृद्धिनि । अपाकीर्य स्वयं धर्मं शिष्येण निहतो गुरुः ।। ४३ ।। मैं आचार्यके प्राणोंकी रक्षा चाहता हुआ बारंबार पुकारता ही रह गया, परंतु स्वयं शिष्य होकर भी धृष्टद्युम्नने धर्मको लात मारकर अपने गुरुकी हत्या कर डाली ।। ४३ ।।
यदा गतं वयो भूयः शिष्टमल्पतरं च नः । तस्येदानीं विकारोऽयमधर्मोऽयं कृतो महान् ।। ४४ ।। अब हमलोगोंकी आयुका अधिकांश भाग बीत चुका है और बहुत थोड़ा ही शेष रह गया है। इसीसे इस समय हमारा मस्तिष्क खराब हो गया और हमलोगोंने यह महान् पाप कर डाला है ।। ४४ ।।
पितेव नित्यं सौहार्दात् पितेव हि च धर्मतः । सोऽल्पकालस्य राज्यस्य कारणाद् घातितो गुरुः ।। ४५ ।। जो सदा पिताकी भाँति हमलोगोंपर स्नेह रखते और हमारा हित चाहते थे, धर्मदृष्टिसे भी जो हमारे पिताके ही तुल्य थे, उन्हीं गुरुदेवको हमने इस क्षणभंगुर राज्यके लिये मरवा दिया ।। ४५ ।।
धृतराष्ट्रेण भीष्माय द्रोणाय च विशाम्पते । विसृष्टा पृथिवी सर्वा सह पुत्रैश्च तत्परैः ।। ४६ ।। प्रजानाथ! धृतराष्ट्रने भीष्म और द्रोणको उनकी सेवामें रहनेवाले अपने पुत्रोंके साथ ही इस सारी पृथिवीका राज्य सौंप दिया था ।। ४६ ।।
सम्प्राप्य तादृशीं वृत्तिं सत्कृतः सततं परैः । अवृणीत सदा पुत्रान् मामेवाभ्यधिकं गुरुः ।। ४७ ।। हमारे शत्रु सदा आचार्यका सत्कार किया करते थे। उनके द्वारा वैसी उत्तम जीविका-वृत्ति पाकर भी आचार्य सदा मुझे ही अपने पुत्रसे बढ़कर मानते रहे हैं ।। ४७ ।।
अवेक्षमाणस्त्वां मां च न्यस्तास्त्रश्चाहवे हतः । न त्वेनं युध्यमानं वै हन्यादपि शतक्रतुः ।। ४८ ।। उन्होंने आपको और मुझको देखकर युद्धमें हथियार डाल दिया और मारे गये। यदि वे युद्ध करते होते तो साक्षात् इन्द्र भी उन्हें मार नहीं सकते थे ।। ४८ ।।
तस्याचार्यस्य वृद्धस्य द्रोहो नित्योपकारिणः । कृत्वे ह्यनार्यैरस्माभी राज्यार्थे लुब्धबुद्धिभिः ।। ४९ ।।