महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अतः छिपकर वालीका वध करनेके कारण जैसे श्रीरामचन्द्रजीको अपयश मिला, उसी प्रकार झूठ बोलकर द्रोणाचार्यको मरवा देनेके कारण चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें आपकी अकीर्ति चिरस्थायिनी हो जायगी ॥ ३५ १/२ ॥
सर्वधर्मोपपन्नोऽयं स मे शिष्यश्च पाण्डवः ॥ ३६ ॥
नायं वदति मिथ्येति प्रत्ययं कृतवांस्त्वयि ।
आचार्यने यह समझकर आपपर विश्वास किया था कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर सब धर्मोंके ज्ञाता और मेरे शिष्य हैं। ये कभी झूठ नहीं बोलते हैं ॥ ३६ १/२ ॥
स सत्यकञ्चुकं नाम प्रविष्टेन ततोऽनृतम् ॥ ३७ ॥
आचार्य उक्तो भवता हतः कुञ्जर इत्युत ।
परंतु आपने सत्यका चोला पहनकर आचार्यसे झूठे ही कह दिया कि 'अश्वत्थामा मारा गया।' उसी नामका हाथी मारा गया था, इसलिये आपने उसकी आड़ लेकर झूठ कहा ॥ ३७ १/२ ॥
ततः शस्त्रं समुत्सृज्य निर्ममो गतचेतनः ॥ ३८ ॥
आसीत् सुविह्वलो राजन् यथा दृष्टस्त्वया विभुः ।
फिर वे हथियार डालकर अपने प्राणोंकी ममतासे रहित हो अचेत हो गये। राजन्! उस समय शक्तिशाली होनेपर भी वे कितने व्याकुल हो गये थे, यह आपने प्रत्यक्ष देखा था ॥ ३८ १/२ ॥
स तु शोकसमाविष्टो विमुखः पुत्रवत्सलः ॥ ३९ ॥
शाश्वतं धर्ममुत्सृज्य गुरुः शस्त्रेण घातितः ।
पुत्रवत्सल गुरुदेव बेटेके शोकमें मग्न होकर युद्धसे विमुख हो गये थे। उस अवस्थामें आपने सनातनधर्मकी अवहेलना करके उन्हें शस्त्रसे मरवा डाला ॥ ३९ १/२ ॥
न्यस्तशस्त्रमधर्मेण घातयित्वा गुरुं भवान् ॥ ४० ॥
रक्षत्विदानीं सामात्यो यदि शक्तोऽसि पार्षतम् ।
ग्रस्तमाचार्यपुत्रेण क्रुद्धेन हतबन्धुना ॥ ४१ ॥
जिसके पिता मारे गये हैं, वह आचार्यपुत्र अश्वत्थामा आज कुपित होकर धृष्टद्युम्नको कालका ग्रास बनाना चाहता है। अस्त्र त्यागकर निहत्थे हुए गुरुदेवको अधर्मपूर्वक मरवाकर अब आप मन्त्रियों-सहित उसके सामने जाइये और यदि शक्ति हो तो धृष्टद्युम्नकी रक्षा कीजिये ॥ ४१-४१ ॥
सर्वे वयं परित्रातुं न शक्ष्यामोऽद्य पार्षतम् ।
सौहार्दं सर्वभूतेषु यः करोत्यतिमानुषः ।
सोऽद्य केशग्रहं श्रुत्वा पितुर्धक्ष्यति नो रणे ॥ ४२ ॥
आज हम सब लोग मिलकर भी धृष्टद्युम्नको नहीं बचा सकेंगे। जो अश्वत्थामा अतिमानव (अलौकिक पुरुष) है और समस्त प्राणियोंके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, वही आज अपने पिताके केश पकड़े जानेकी बात सुनकर समरांगणमें हम सब लोगोंको जलाकर भस्म कर देगा ।। ४२ ।।
विक्रोशमाने हि मयि भृशमाचार्यगृद्धिनि । अपाकीर्य स्वयं धर्मं शिष्येण निहतो गुरुः ।। ४३ ।। मैं आचार्यके प्राणोंकी रक्षा चाहता हुआ बारंबार पुकारता ही रह गया, परंतु स्वयं शिष्य होकर भी धृष्टद्युम्नने धर्मको लात मारकर अपने गुरुकी हत्या कर डाली ।। ४३ ।।
यदा गतं वयो भूयः शिष्टमल्पतरं च नः । तस्येदानीं विकारोऽयमधर्मोऽयं कृतो महान् ।। ४४ ।। अब हमलोगोंकी आयुका अधिकांश भाग बीत चुका है और बहुत थोड़ा ही शेष रह गया है। इसीसे इस समय हमारा मस्तिष्क खराब हो गया और हमलोगोंने यह महान् पाप कर डाला है ।। ४४ ।।
पितेव नित्यं सौहार्दात् पितेव हि च धर्मतः । सोऽल्पकालस्य राज्यस्य कारणाद् घातितो गुरुः ।। ४५ ।। जो सदा पिताकी भाँति हमलोगोंपर स्नेह रखते और हमारा हित चाहते थे, धर्मदृष्टिसे भी जो हमारे पिताके ही तुल्य थे, उन्हीं गुरुदेवको हमने इस क्षणभंगुर राज्यके लिये मरवा दिया ।। ४५ ।।
धृतराष्ट्रेण भीष्माय द्रोणाय च विशाम्पते । विसृष्टा पृथिवी सर्वा सह पुत्रैश्च तत्परैः ।। ४६ ।। प्रजानाथ! धृतराष्ट्रने भीष्म और द्रोणको उनकी सेवामें रहनेवाले अपने पुत्रोंके साथ ही इस सारी पृथिवीका राज्य सौंप दिया था ।। ४६ ।।
सम्प्राप्य तादृशीं वृत्तिं सत्कृतः सततं परैः । अवृणीत सदा पुत्रान् मामेवाभ्यधिकं गुरुः ।। ४७ ।। हमारे शत्रु सदा आचार्यका सत्कार किया करते थे। उनके द्वारा वैसी उत्तम जीविका-वृत्ति पाकर भी आचार्य सदा मुझे ही अपने पुत्रसे बढ़कर मानते रहे हैं ।। ४७ ।।
अवेक्षमाणस्त्वां मां च न्यस्तास्त्रश्चाहवे हतः । न त्वेनं युध्यमानं वै हन्यादपि शतक्रतुः ।। ४८ ।। उन्होंने आपको और मुझको देखकर युद्धमें हथियार डाल दिया और मारे गये। यदि वे युद्ध करते होते तो साक्षात् इन्द्र भी उन्हें मार नहीं सकते थे ।। ४८ ।।
तस्याचार्यस्य वृद्धस्य द्रोहो नित्योपकारिणः । कृत्वे ह्यनार्यैरस्माभी राज्यार्थे लुब्धबुद्धिभिः ।। ४९ ।।
हमारी बुद्धि लोभसे ग्रस्त है, हम नीचोंने राज्यके लिये सदा उपकार करनेवाले बूढ़े आचार्यके साथ द्रोह किया है ।।
अहो बत महत् पापं कृतं कर्म सुदारुणम् ।
यद् राज्यसुखलोभेन द्रोणोऽयं साधु घातितः ॥ ५० ॥
ओह! हमने यह अत्यन्त भयंकर महान् पापकर्म कर डाला है, जो कि राज्य-सुखके लोभमें पड़कर इन आचार्य द्रोणकी पूर्णतः हत्या करा दी ॥ ५० ॥
पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄन् दाराञ्जीवितं चैव वासविः ।
त्यजेत् सर्वं मम प्रेम्णा जानात्येवं हि मे गुरुः ॥ ५१ ॥
मेरे गुरुदेव ऐसा समझते थे कि अर्जुन मेरे प्रेमवश आवश्यकता हो तो अपने पिता, पुत्र, भाई, स्त्री तथा प्राण—सबका त्याग कर सकता है ॥ ५१ ॥
स मया राज्यकामेन हन्यमानो ह्युपेक्षितः ।
तस्मादर्वाक्शिरा राजन् प्राप्तोऽस्मि नरकं प्रभो ॥ ५२ ॥
किंतु मैंने राज्यके लोभमें पड़कर उनके मारे जानेकी उपेक्षा कर दी। राजन्! प्रभो! इस पापके कारण अब मैं नीचे सिर करके नरकमें डाला जाऊँगा ॥ ५२ ॥
ब्राह्मणं वृद्धमाचार्यं न्यस्तशस्त्रं महामुनिम् ।
घातयित्वाद्य राज्यार्थे मृतं श्रेयो न जीवितम् ॥ ५३ ॥
एक तो वे ब्राह्मण, दूसरे वृद्ध और तीसरे अपने आचार्य थे। इसके सिवा उन्होंने हथियार नीचे डाल दिया था और महान् मुनिवृत्तिका आश्रय लेकर बैठे हुए थे। इस अवस्थामें राज्यके लिये उनकी हत्या कराकर मैं जीनेकी अपेक्षा मर जाना ही अच्छा समझता हूँ ॥ ५३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि अर्जुनवाक्ये
षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक एक सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५४ श्लोक हैं।)
१९७-
सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
भीमसेनके वीरोचित उद्गार और धृष्टद्युम्नके द्वारा अपने कृत्यका समर्थन
संजय उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा नोचुस्तत्र महारथाः । अप्रियं वा प्रियं वापि महाराज धनंजयम् ॥ १ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! अर्जुनकी यह बात सुनकर वहाँ बैठे हुए सब महारथी मौन रह गये। उनसे प्रिय या अप्रिय कुछ नहीं बोले ॥ १ ॥
ततः क्रुद्धो महाबाहुर्भीमसेनोऽभ्यभाषत । कुत्सयन्निव कौन्तेयमर्जुनं भरतर्षभ ॥ २ ॥ भरतश्रेष्ठ! तब महाबाहु भीमसेनको क्रोध चढ़ आया। उन्होंने कुन्तीकुमार अर्जुनको फटकारते हुए-से कहा ॥ २ ॥
मुनिर्यथारण्यगतो भाषसे धर्मसंहितम् । न्यस्तदण्डो यथा पार्थ ब्राह्मणः संशितव्रतः ॥ ३ ॥ 'पार्थ! वनवासी मुनि अथवा किसी भी प्राणीको दण्ड न देते हुए कठोर व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण जिस प्रकार धर्मका उपदेश करता है, उसी प्रकार तुम भी धर्मसम्मत बातें कह रहे हो ॥ ३ ॥
क्षतत्राता क्षताज्जीवन् क्षन्ता स्त्रीष्वपि साधुषु । क्षत्रियः क्षितिमाप्नोति क्षिप्रं धर्मं यशः श्रियः ॥ ४ ॥ 'परंतु जो क्षति (संकट)-से अपना तथा दूसरोंका त्राण करता है, युद्धमें शत्रुओंको क्षति पहुँचाना ही जिसकी जीविका है तथा जो स्त्रियों और साधु पुरुषोंपर क्षमाभाव रखता है, वही क्षत्रिय है और उसे ही शीघ्र इस पृथ्वीके राज्य, धर्म, यश और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥
स भवान् क्षत्रियगुणैर्युक्तः सर्वैः कुलोद्वहः । अविपश्चिद् यथा वाचं व्याहरन् नाद्य शोभसे ॥ ५ ॥ 'तुम समस्त क्षत्रियोचित गुणोंसे सम्पन्न और इस कुलका भार वहन करनेमें समर्थ होते हुए भी आज मूर्खके समान बातें कर रहे हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देता ॥ ५ ॥
पराक्रमस्ते कौन्तेय शक्रस्येव शचीपतेः । न चाति वर्तसे धर्मं वेलामिव महोदधिः ॥ ६ ॥
‘कुन्तीनन्दन! तुम्हारा पराक्रम शचीपति इन्द्रके समान है। महासागर जैसे अपनी तट-भूमिका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार तुम भी कभी धर्म-मर्यादाका उल्लंघन नहीं करते हो ॥ ६ ॥
न पूजयेत् त्वां को न्वद्य यत् त्रयोदशवार्षिकम् ।
अमर्षं पृष्ठतः कृत्वा धर्ममेवाभिकाङ्क्षसे ॥ ७ ॥
‘आज तेरह वर्षोंसे संचित किये हुए अमर्षको पीछे करके जो तुम धर्मकी ही अभिलाषा रखते हो, इसके लिये कौन तुम्हारी पूजा नहीं करेगा? ॥ ७ ॥
दिष्ट्या तात मनस्तेऽद्य स्वधर्ममनुवर्तते ।
आनृशंस्ये च ते दिष्ट्या बुद्धिः सततमच्युत ॥ ८ ॥
‘तात! सौभाग्यकी बात है कि इस समय भी तुम्हारा मन अपने धर्मका ही अनुसरण करता है। धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले मेरे भाई! तुम्हारी बुद्धि क्रूरताकी ओर न जाकर जो सदा दयाभावमें ही रम रही है, यह भी कम सौभाग्यकी बात नहीं है ॥ ८ ॥
यत् तु धर्मप्रवृत्तस्य हृतं राज्यमधर्मतः ।
द्रौपदी च परामृष्टा सभामानीय शत्रुभिः ॥ ९ ॥
वनं प्रब्राजिताश्चास्म वल्कलाजिनवाससः ।
अनर्हमाणास्तं भावं त्रयोदश समाः परैः ॥ १० ॥
‘परंतु धर्ममें तत्पर रहनेपर भी जो शत्रुओंने अधर्मसे हमारा राज्य छीन लिया, द्रौपदीको सभामें लाकर अपमानित किया तथा हमें वल्कल और मृगचर्म पहनाकर तेरह वर्षोंके लिये जो वनमें निर्वासित कर दिया, हम वैसे बर्तावके योग्य कदापि नहीं थे ॥ ९-१० ॥
एतान्यमर्षस्थानानि मर्षितानि मयानघ ।
क्षत्रधर्मप्रसक्तेन सर्वमेतदनुष्ठितम् ॥ ११ ॥
‘अनघ! ये सारे अन्याय अमर्षके स्थान थे—असह्य थे, परंतु मैंने सब चुपचाप सह लिये। क्षत्रिय-धर्ममें आसक्त होनेके कारण ही यह सब कुछ सहन किया गया है ॥ ११ ॥
तमधर्ममपाकृष्टं स्मृत्वाद्य सहितस्त्वया ।
सानुबन्धान् हनिष्यामि क्षुद्रान् राज्यहरानहम् ॥ १२ ॥
‘परंतु अब उनके उन नीचतापूर्ण पापकर्मोंको याद करके मैं तुम्हारे साथ रहकर अपने राज्यका अपहरण करनेवाले इन नीच शत्रुओंको उनके सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा ॥ १२ ॥
त्वया हि कथितं पूर्वं युद्धायाभ्यागता वयम् ।
घटामहे यथाशक्ति त्वं तु नोऽद्य जुगुप्ससे ॥ १३ ॥
‘तुमने ही पहले युद्धके लिये कहा था और उसीके अनुसार हम यहाँ आकर यथाशक्ति उसके लिये प्रयत्न कर रहे हैं, परंतु आज तुम्हीं हमारी निन्दा करते हो! ॥ १३ ॥
स्वधर्मं नेच्छसे ज्ञातुं मिथ्यावचनमेव ते । भयार्दितानामस्माकं वाचा मर्माणि कृन्तसि ॥ १४ ॥ ‘तुम अपने क्षत्रिय-धर्मको नहीं जानना चाहते। तुम्हारी ये सारी बातें मिथ्या ही हैं। एक तो हम स्वयं ही भयसे पीड़ित हो रहे हैं, ऊपरसे तुम भी अपने वाग्बाणोंद्वारा हमारे मर्मस्थानोंको छेदे डालते हो ॥ १४ ॥
वपन् व्रणे क्षारमिव क्षतानां शत्रुकर्शन । विदीर्यते मे हृदयं त्वया वाक्शल्यपीडितम् ॥ १५ ॥ ‘शत्रुसूदन! जैसे कोई घायल मनुष्योंके घावपर नमक बिखेर दे (और वे वेदनासे छटपटाने लगें), उसी प्रकार तुम अपने वाग्बाणोंसे पीड़ित करके मेरे हृदयको विदीर्ण किये डालते हो ॥ १५ ॥
अधर्ममेनं विपुलं धार्मिकः सन् न बुध्यसे । यत् त्वामात्मानमस्मांश्च प्रशस्यान् न प्रशंससि ॥ १६ ॥ ‘यद्यपि तुम और हम प्रशंसाके पात्र हैं, तो भी तुम जो अपनी और हमारी प्रशंसा नहीं करते हो, यह बहुत बड़ा अधर्म है और तुम धार्मिक होते हुए इस अधर्मको नहीं समझ रहे हो ॥ १६ ॥
वासुदेवे स्थिते चापि द्रोणपुत्रं प्रशंससि । यः कलां षोडशीं पूर्णां धनंजय न तेऽर्हति ॥ १७ ॥ ‘धनंजय! भगवान् श्रीकृष्णके रहते हुए भी तुम द्रोणपुत्रकी प्रशंसा करते हो, जो तुम्हारी पूरी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है ॥ १७ ॥
स्वयमेवात्मनो दोषान् ब्रुवाणः किन्न लज्जसे । दारयेयं महीं क्रोधाद् विकिरेयं च पर्वतान् ॥ १८ ॥ आविध्येतां गदां गुर्वीं भीमां काञ्चनमालिनीम् । गिरिप्रकाशान् क्षितिजान् भञ्जेयमनिलो यथा ॥ १९ ॥ ‘स्वयं ही अपने दोषोंका वर्णन करते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती है? आज मैं अपनी इस सुवर्णभूषित भयंकर एवं भारी गदाको क्रोधपूर्वक घुमाकर इस पृथ्वीको विदीर्ण कर सकता हूँ, पर्वतोंको चूर-चूर करके बिखेर सकता हूँ तथा प्रचण्ड आँधीकी तरह पर्वतपर प्रकाशित होनेवाले ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको भी तोड़ और उखाड़ सकता हूँ ॥ १८-१९ ॥
द्रावयेयं शरैश्चापि सेन्द्रान् देवान् समागतान् । सराक्षसगणान् पार्थ सासुरोरगमानवान् ॥ २० ॥ ‘पार्थ! असुर, नाग, मानव तथा राक्षसगणोंसहित सम्पूर्ण देवता और इन्द्र भी आ जायँ तो मैं उन्हें बाणोंद्वारा मारकर भगा सकता हूँ ॥ २० ॥
स त्वमेवंविधं जानन् भ्रातरं मां नरर्षभ ।
द्रोणपुत्राद् भयं कर्तुं नार्हस्यमितविक्रम ॥ २१ ॥
'अमित पराक्रमी नरश्रेष्ठ अर्जुन! मुझ अपने भ्राताको ऐसा जानकर तुम्हें द्रोणपुत्रसे भय नहीं करना चाहिये ॥ २१ ॥
अथवा तिष्ठ बीभत्सो सह सर्वैः सहोदरैः ।
अहमेनं गदापाणिर्जेष्याम्येको महाहवे ॥ २२ ॥
'अथवा अर्जुन! तुम अपने समस्त भाइयोंके साथ यहीं खड़े रहो। मैं हाथमें गदा लेकर इस महासमरमें अकेला ही अश्वत्थामाको परास्त करूँगा' ॥ २२ ॥
ततः पाञ्चालराजस्य पुत्रः पार्थमथाब्रवीत् ।
संक्रुद्धमिव नर्दन्तं हिरण्यकशिपुर्हरिम् ॥ २३ ॥
तदनन्तर जैसे पूर्वकालमें अत्यन्त क्रुद्ध होकर दहाड़ते हुए नृसिंहावतारधारी भगवान् विष्णुसे दैत्यराज हिरण्यकशिपुने बातें की थी, उसी प्रकार वहाँ अर्जुनसे पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने इस प्रकार कहा ॥ २३ ॥
धृष्टद्युम्न उवाच
बीभत्सो विप्रकर्माणि विदितानि मनीषिणाम् ।
याजनाध्यापने दानं तथा यज्ञप्रतिग्रहौ ॥ २४ ॥
षष्ठमध्ययनं नाम तेषां कस्मिन् प्रतिष्ठितः ।
हतो द्रोणो मया ह्येवं किं मां पार्थ विगर्हसे ॥ २५ ॥
अपक्रान्तः स्वधर्माच्च क्षात्रधर्मं व्यपाश्रितः ।
अमानुषेण हन्त्यस्मानस्त्रेण क्षुद्रकर्मकृत् ॥ २६ ॥
धृष्टद्युम्न बोला—'अर्जुन! यज्ञ करना और कराना, वेदोंको पढ़ना और पढ़ाना तथा दान देना और प्रतिग्रह स्वीकार करना—ये छः कर्म ही ब्राह्मणोंके लिये मनीषी पुरुषोंमें प्रसिद्ध हैं। इनमेंसे किस कर्ममें द्रोणाचार्य प्रतिष्ठित थे। अपने धर्मसे भ्रष्ट होकर उन्होंने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय ले रखा था। पार्थ! ऐसी अवस्थामें यदि मैंने द्रोणाचार्यका वध किया तो तुम इसके लिये मेरी निन्दा क्यों करते हो। वह नीच कर्म करनेवाला ब्राह्मण दिव्यास्त्रोंद्वारा हमलोगोंका संहार करता था ॥ २४–२६ ॥
तथा मायां प्रयुञ्जानमसह्यं ब्राह्मणब्रुवम् ।
माययैव विहन्याद् यो न युक्तं पार्थ तत्र किम् ॥ २७ ॥
कुन्तीनन्दन! जो ब्राह्मण कहलाकर भी दूसरोंके लिये मायाका प्रयोग करता हो और असह्य हो उठा हो, उसे यदि कोई मायासे ही मार डाले तो इसमें अनुचित क्या है? ॥ २७ ॥
तस्मिंस्तथा मया शस्ते यदि द्रौणायनी रुषा ।
कुरुते भैरवं नादं तत्र किं मम हीयते ॥ २८ ॥
मेरे द्वारा द्रोणाचार्यके इस अवस्थामें मारे जानेपर यदि द्रोणपुत्र क्रोधपूर्वक भयानक गर्जना करता हो तो उसमें मेरी क्या हानि है? ।। २८ ।। न चाद्भुतमिदं मन्ये यद् द्रौणिर्युद्धसंज्ञया । घातयिष्यति कौरव्यान् परित्रातुमशक्नुवन् ।। २९ ।। मैं इसे कोई अद्भुत बात नहीं मान रहा हूँ; अश्वत्थामा इस युद्धके द्वारा कौरवोंको मरवा डालेगा; क्योंकि वह स्वयं उनकी रक्षा करनेमें असमर्थ है ।। २९ ।। यच्च मां धार्मिको भूत्वा ब्रवीषि गुरुघातिनम् । तदर्थमहमुत्पन्नः पाञ्चाल्यस्य सुतोऽनलात् ।। ३० ।। इसके सिवा तुम धार्मिक होकर जो मुझे गुरुकी हत्या करनेवाला बता रहे हो, वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि मैं इसीलिये अग्निकुण्डसे पांचालराजका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ था ।। ३० ।। यस्य कार्यमकार्यं वा युध्यतः स्यात् समं रणे । तं कथं ब्राह्मणं ब्रूयाः क्षत्रियं वा धनंजय ।। ३१ ।। धनंजय! रणभूमिमें युद्ध करते समय जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों समान हों, उसे तुम ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय कैसे कह सकते हो? ।। ३१ ।। यो ह्यनस्त्रविदो हन्याद् ब्रह्मास्त्रैः क्रोधमूर्च्छितः । सर्वोपायैर्न स कथं वध्यः पुरुषसत्तम ।। ३२ ।। पुरुषप्रवर! जो क्रोधसे व्याकुल होकर ब्रह्मास्त्र न जाननेवालोंको भी ब्रह्मास्त्रसे ही मार डाले, उसका सभी उपायोंसे वध करना कैसे उचित नहीं है? ।। ३२ ।। विधर्मिणं धर्मविद्भिः प्रोक्तं तेषां विषोपमम् । जानन् धर्मार्थतत्त्वज्ञ किं मामर्जुन गर्हसे ।। ३३ ।। धर्म और अर्थका तत्त्व जाननेवाले अर्जुन! जो अपना धर्म छोड़कर परधर्म ग्रहण कर लेता है, उस विधर्मीको धर्मज्ञ पुरुषोंने धर्मात्माओंके लिये विषके तुल्य बताया है। यह सब जानते हुए भी तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो? ।। ३३ ।। नृशंसः स मयाऽऽक्रम्य रथ एव निपातितः । तन्मामनिन्द्यं बीभत्सो किमर्थं नाभिनन्दसे ।। ३४ ।। बीभत्सो! द्रोणाचार्य क्रूर एवं नृशंस थे, इसलिये मैंने रथपर ही आक्रमण करके उनको मार गिराया। अतः मैं निन्दाका पात्र नहीं हूँ। फिर तुम किसलिये मेरा अभिनन्दन नहीं करते हो? ।। ३४ ।। कालानलसमं पार्थ ज्वलनार्कविषोपमम् । भीमं द्रोणशिरश्छिन्नं न प्रशंससि मे कथम् ।। ३५ ।। पार्थ! द्रोणका मस्तक प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त भयंकर तथा लौकिक अग्नि, सूर्य एवं विषके तुल्य संताप देनेवाला था, अतः मैंने उसका छेदन किया है। इसके
लिये तुम मेरी प्रशंसा क्यों नहीं करते? ॥ ३५ ॥ योऽसौ ममैव नान्यस्य बान्धवान् युधि जघ्निवान् । छित्त्वापि तस्य मूर्धानं नैवास्मि विगतज्वरः ॥ ३६ ॥ जिसने युद्धके मैदानमें दूसरे किसीके नहीं, मेरे ही बन्धु-बान्धवोंका वध किया था, उसका मस्तक काट लेनेपर भी मेरा क्रोध और संताप शान्त नहीं हुआ ॥ ३६ ॥ तच्च मे कृन्तते मर्म यन्न तस्य शिरो मया । निषादविषये क्षिप्तं जयद्रथशिरो यथा ॥ ३७ ॥ जैसे तुमने जयद्रथके मस्तकको दूर फेंका था, उसी प्रकार मैंने द्रोणाचार्यके मस्तकको जो निषादोंके स्थानमें नहीं फेंक दिया, वह भूल मेरे मर्मस्थानोंका छेदन कर रही है ॥ अथावधश्च शत्रूणामधर्मः श्रूयतेऽर्जुन । क्षत्रियस्य हि धर्मोऽयं हन्याद्धन्येत वा पुनः ॥ ३८ ॥ अर्जुन! सुननेमें आया है कि शत्रुओंका वध न करना भी अधर्म ही है। क्षत्रियके लिये तो यह धर्म ही है कि वह युद्धमें शत्रुको मार डाले या फिर स्वयं उसके हाथसे मारा जाय ॥ ३८ ॥ स शत्रुर्निहतः संख्ये मया धर्मेण पाण्डव । यथा त्वया हतः शूरो भगदत्तः पितुः सखा ॥ ३९ ॥ पाण्डुनन्दन! द्रोणाचार्य मेरे शत्रु थे, अतः मैंने युद्धमें धर्मके अनुसार ही उनका वध किया है। ठीक उसी तरह, जैसे तुमने अपने पिताके प्रिय मित्र शूरवीर भगदत्तका वध किया था ॥ ३९ ॥ पितामहं रणे हत्वा मन्यसे धर्ममात्मनः । मया शत्रौ हते कस्मात् पापे धर्मं न मन्यसे ॥ ४० ॥ तुम युद्धमें पितामहको मारकर भी अपने लिये तो धर्म ही मानते हो, किंतु मेरे द्वारा एक पापी शत्रुके मारे जानेपर भी इस कार्यको धर्म नहीं समझते; इसका क्या कारण है? ॥ सम्बन्धावनतं पार्थ न मां त्वं वक्तुमर्हसि । स्वगात्रकृतसोपानं निष्षण्णमिव दन्तिनम् ॥ ४१ ॥ पार्थ! जैसे हाथी सम्बन्ध स्थापित कर लेनेपर लोगोंको अपने ऊपर चढ़ानेके लिये अपने ही शरीरकी सीढ़ी बनाकर बैठ जाता है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे साथ सम्बन्ध होनेके कारण नतमस्तक होता हूँ; अतः तुम्हें मेरे प्रति ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिये ॥ ४१ ॥ क्षमामि ते सर्वमेव वाग्व्यतिक्रममर्जुन । द्रौपद्या द्रौपदेयानां कृते नान्येन हेतुना ॥ ४२ ॥ अर्जुन! मैं अपनी बहिन द्रौपदी और उसके पुत्रोंके नाते ही तुम्हारी इन सारी उलटी या कड़वी बातोंको सहे लेता हूँ, दूसरे किसी कारणसे नहीं ॥ ४२ ॥
कुलक्रमागतं वैरं ममाचार्येण विश्रुतम् । तथा जानात्ययं लोको न यूयं पाण्डुनन्दनाः ॥ ४३ ॥ द्रोणाचार्यके साथ मेरा वंशपरम्परागत वैर चला आ रहा है, जो बहुत प्रसिद्ध है। उसे यह सारा संसार जानता है; क्या तुम पाण्डवोंको इसका पता नहीं है? ॥ ४३ ॥ नानृती पाण्डवो ज्येष्ठो नाहं वाधार्मिकोऽर्जुन । शिष्यद्रोही हतः पापो युध्यस्व विजयस्तव ॥ ४४ ॥ अर्जुन! तुम्हारे बड़े भाई पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर असत्यवादी नहीं हैं और न मैं ही अधर्मी हूँ। द्रोणाचार्य पापी और शिष्यद्रोही थे, इसलिये मारे गये। अब तुम युद्ध करो; विजय तुम्हारे हाथमें है ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृष्टद्युम्नवाक्ये सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृष्टद्युम्नवाक्यविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९७ ॥
१९८-
अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकि और धृष्टद्युम्नका परस्पर क्रोधपूर्वक वाग्बाणोंसे लड़ना तथा भीमसेन, सहदेव और श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिरके प्रयत्नसे उनका निवारण
धृतराष्ट्र उवाच
साङ्गा वेदा यथान्यायं येनाधीता महात्मना ।
यस्मिन् साक्षाद् धनुर्वेदो ह्रीनिषेवे प्रतिष्ठितः ॥ १ ॥
यस्य प्रसादात् कुर्वन्ति कर्माणि पुरुषर्षभाः ।
अमानुषाणि संग्रामे देवैरसुकराणि च ॥ २ ॥
तस्मिन्नाक्रुश्यति द्रोणे समक्षं पापकर्मणा ।
नीचात्मना नृशंसेन क्षुद्रेण गुरुघातिना ॥ ३ ॥
नामर्षं तत्र कुर्वन्ति धिक् क्षात्रं धिगमर्षिताम् ।
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! जिन महात्माने विधिपूर्वक अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया था, जिन लज्जाशील सत्पुरुषमें साक्षात् धनुर्वेद प्रतिष्ठित था, जिनके कृपाप्रसादसे कितने ही पुरुषरत्न योद्धा संग्रामभूमिमें ऐसे-ऐसे अलौकिक पराक्रम कर दिखाते थे, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर थे; उन्हीं द्रोणाचार्यकी वह पापी, नीच, नृशंस, क्षुद्र और गुरुघाती धृष्टद्युम्न सबके सामने निन्दा कर रहा था और लोग क्रोध नहीं प्रकट करते थे। धिक्कार है ऐसे क्षत्रियोंको! और धिक्कार है उनके अमर्षशील स्वभावको!! ।। १—३ ½ ।।
पार्थाः सर्वे च राजानः पृथिव्यां ये धनुर्धराः ॥ ४ ॥
श्रुत्वा किमाहुः पाञ्चाल्यं तन्ममाचक्ष्व संजय ।
संजय! भूमण्डलके जो-जो धनुर्धर नरेश वहाँ उपस्थित थे, उन सबने तथा कुन्तीके पुत्रोंने धृष्टद्युम्नकी बात सुनकर उससे क्या कहा? यह मुझे बताओ ॥ ४ ½ ॥
संजय उवाच
श्रुत्वा द्रुपदपुत्रस्य ता वाचः क्रूरकर्मणः ॥ ५ ॥
तूष्णीं बभूवू राजानः सर्व एव विशाम्पते ।
अर्जुनस्तु कटाक्षेण जिह्मं विप्रेक्ष्य पार्षतम् ॥ ६ ॥
सबाष्पमतिनिःश्वस्य धिग् धिगित्येव चाब्रवीत् ।
**संजयने कहा—**प्रजानाथ! क्रूरकर्मा द्रुपदपुत्रकी वे बातें सुनकर वहाँ बैठे हुए सभी नरेश मौन रह गये। केवल अर्जुन टेढ़ी नजरोंसे उसकी ओर देखकर आँसू बहाते हुए दीर्घ
निःश्वास ले इतना ही बोले कि—'धिक्कार है! धिक्कार है!!' ।। ५-६½ ।।
युधिष्ठिरश्च भीमश्च यमौ कृष्णस्तथापरे ।। ७ ।।
आसन् सुव्रीडिता राजन् सात्यकिस्त्वब्रवीदिदम् ।
राजन्! उस समय युधिष्ठिर, भीमसेन, नकुल, सहदेव, भगवान् श्रीकृष्ण तथा अन्य लोग भी अत्यन्त लज्जित हो चुप ही बैठे रहे, परंतु सात्यकि इस प्रकार बोल उठे— ।। ७½ ।।
नेहास्ति पुरुषः कश्चिद् य इमं पापपूरुषम् ।। ८ ।।
भाषमाणमकल्याणं शीघ्रं हन्यान्नराधमम् ।
'क्या यहाँ कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो इस प्रकार अभद्रतापूर्ण वचन बोलनेवाले इस पापी नराधमको शीघ्र ही मार डाले ।। ८½ ।।
एते त्वां पाण्डवाः सर्वे कुत्सयन्ति विकुत्सया ।। ९ ।।
कर्मणा तेन पापेन श्वपाकं ब्राह्मणा इव ।
'धृष्टद्युम्न! जैसे ब्राह्मण चाण्डालकी निन्दा करते हैं, उसी प्रकार ये समस्त पाण्डव उस पाप कर्मके कारण अत्यन्त घृणा प्रकट करते हुए तेरी निन्दा कर रहे हैं ।। ९½ ।।
एतत् कृत्वा महत् पापं निन्दितः सर्वसाधुभिः ।। १० ।।
न लज्जसे कथं वक्तुं समितिं प्राप्य शोभनाम् ।
कथं च शतधा जिह्वा न ते मूर्धा च दीर्यते ।। ११ ।।
गुरुमाक्रोशतः क्षुद्र न चाधर्मेण पात्यसे ।
'यह महान् पाप करके तू समस्त श्रेष्ठ पुरुषोंकी दृष्टिमें निन्दाका पात्र बन गया है। साधु पुरुषोंकी इस सुन्दर सभामें पहुँचकर ऐसी बातें करते हुए तुझे लज्जा कैसे नहीं आती? तेरी जीभके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते और तेरा मस्तक क्यों नहीं फट जाता? ओ नीच! गुरुकी निन्दा करते हुए तेरा इस पापसे पतन क्यों नहीं हो जाता? ।। १०-११½ ।।
वाच्यस्त्वमसि पार्थैश्च सर्वैश्चान्धकवृष्णिभिः ।। १२ ।।
यत् कर्म कलुषं कृत्वा श्लाघसे जनसंसदि ।
'तू पापकर्म करके जनसमाजमें जो इस तरह अपनी बड़ाई कर रहा है, इसके कारण तू कुन्तीके सभी पुत्रों तथा अन्धक और वृष्णिवंशके यादवोंद्वारा निन्दाके योग्य हो गया है ।। १२½ ।।
अकार्यं तादृशं कृत्वा पुनरेव गुरुं क्षिपन् ।। १३ ।।
वध्यस्त्वं न त्वयार्थोऽस्ति मुहूर्तंमपि जीवता ।
'वैसा पापकर्म करके तू पुनः गुरुपर आक्षेप कर रहा है; अतः तू वध करनेके ही योग्य है। एक मुहूर्त भी तेरे जीवित रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है ।। १३½ ।।
कस्त्वेतद् व्यवसेदार्यस्त्वदन्यः पुरुषाधम ।। १४ ।।
निगृह्य केशेषु वधं गुरोर्धर्मात्मनः सतः ।
‘पुरुषाधम! तेरे सिवा दूसरा कौन श्रेष्ठ पुरुष धर्मात्मा सज्जन गुरुके केश पकड़कर उनके वधका विचार भी मनमें लायेगा ॥ १४ १/२ ॥
सप्तावरे तथा पूर्वे बान्धवास्ते निमज्जिताः ॥ १५ ॥
यशसा च परित्यक्तास्त्वां प्राप्य कुलपांसनम् ।
‘तुझ-जैसे कुलांगारको पाकर तेरे सात पीढ़ी पहलेके और सात पीढ़ी आगे होनेवाले बन्धु-बान्धव नरकमें डूब गये तथा सदाके लिये सुयशसे वंचित हो गये ॥ १५ १/२ ॥
उक्तवांश्चापि यत् पार्थे भीष्मं प्रति नरर्षभम् ॥ १६ ॥
तथान्तो विहितस्तेन स्वयमेव महात्मना ।
तूने जो कुन्तीकुमार अर्जुनपर नरश्रेष्ठ भीष्मके वधका दोष लगाया है, वह भी व्यर्थ ही है; क्योंकि महात्मा भीष्मने स्वयं ही उसी प्रकार अपनी मृत्युका विधान किया था ॥ १६ १/२ ॥
तस्यापि तव सोदर्यो निहन्ता पापकृत्तमः ॥ १७ ॥
नान्यः पाञ्चाल्यपुत्रेभ्यो विद्यते भुवि पापकृत् ।
‘वास्तवमें भीष्मका वध करनेवाला भी तेरा महान् पापाचारी भाई ही है। इस पृथ्वीपर पांचालराजके पुत्रोंके सिवा दूसरा कोई ऐसा पाप करनेवाला नहीं है ॥ १७ १/२ ॥
स चापि सृष्टः पित्रा ते भीष्मस्यान्तकरः किल ॥ १८ ॥
शिखण्डी रक्षितस्तेन स च मृत्युर्महात्मनः ।
‘यह प्रसिद्ध है कि उसे भी तेरे पिताने भीष्मका अन्त करनेके लिये उत्पन्न किया था; उन्होंने महात्मा भीष्मकी मूर्तिमान् मृत्युके रूपमें ही शिखण्डीको सुरक्षित रखा था ॥ १८ १/२ ॥
पञ्चालाश्चलिता धर्मात् क्षुद्रा मित्रगुरुद्रुहः ॥ १९ ॥
त्वां प्राप्य सहसोदर्यं धिक्कृतं सर्वसाधुभिः ।
‘तू और तेरा भाई दोनों समस्त साधु पुरुषोंके धिक्कारके पात्र हैं। तुम दोनोंको पाकर सारे पांचाल धर्मभ्रष्ट, नीच, मित्रद्रोही तथा गुरुद्रोही बन गये हैं ॥
पुनश्चेदीदृशीं वाचं मत्समीपे वदिष्यसि ॥ २० ॥
शिरस्ते पोथयिष्यामि गदया वज्रकल्पया ।
‘यदि तू पुनः मेरे समीप ऐसी बात बोलेगा तो मैं अपनी इस वज्रतुल्य गदासे तेरा सिर कुचल दूँगा ॥
त्वां च ब्रह्महणं दृष्ट्वा जनः सूर्यमवेक्षते ॥ २१ ॥
ब्रह्महत्या हि ते पापं प्रायश्चित्तार्थमात्मनः ।
‘तुझे ब्रह्महत्याका पाप लगा है। तुझ ब्रह्महत्यारेको देखकर लोग अपने प्रायश्चित्तके लिये सूर्यदेवका दर्शन करते हैं।। २१ ½ ।। पाञ्चालक सुदुर्वृत्त ममैव गुरुमग्रतः ।। २२ ।। गुरोर्गुरुं च भूयोऽपि क्षिपन्नैव हि लज्जसे । ‘दुराचारी पांचाल! तू मेरे आगे मेरे ही गुरु तथा मेरे गुरुके भी गुरुपर बारंबार आक्षेप कर रहा है, तो भी तुझे लज्जा नहीं आती।। २२ ½ ।। तिष्ठ तिष्ठ सहस्वैकं गदापातमिमं मम ।। २३ ।। तव चापि सहिष्येऽहं गदापाताननेकशः । ‘खड़ा रह, खड़ा रह', मेरी गदाकी यह एक ही चोट सह ले, फिर मैं तेरी गदाकी भी अनेक चोटें सहन करूँगा’ ।। २३ ½ ।। सात्वतेनैवमाक्षिप्तः पार्षतः परुषाक्षरम् ।। २४ ।। संरब्धं सात्यकिं प्राह संक्रुद्धः प्रहसन्निव । सात्वतवंशी सात्यकिके इस प्रकार कठोर वचन कहकर आक्षेप करनेपर धृष्टद्युम्न अत्यन्त कुपित हो उठे। फिर वे भी क्रोधमें भरे हुए सात्यकिसे हँसते हुए-से बोले।।
धृष्टद्युम्न उवाच
श्रूयते श्रूयते चेति क्षम्यते चेति माधव ।। २५ ।। सदानार्योऽशुभः साधुं पुरुषं क्षेप्तुमिच्छति । धृष्टद्युम्नने कहा—माधव! मैं तेरी यह बात सुनता हूँ, सुनता हूँ और इसके लिये तुझे क्षमा भी करता हूँ। दुष्ट और अनार्य पुरुष सदा साधु जनोंपर ऐसे ही आक्षेप करनेकी इच्छा रखते हैं।। २५ ½ ।। क्षमा प्रशस्यते लोके न तु पापोऽर्हति क्षमाम् ।। २६ ।। क्षमावन्तं हि पापात्मा जितोऽयमिति मन्यते । यद्यपि लोकमें क्षमाभावकी प्रशंसा की जाती है, तथापि पापात्मा मनुष्य कभी क्षमाके योग्य नहीं है; क्योंकि क्षमा कर देनेपर वह पापात्मा क्षमाशील पुरुषको ऐसा समझ लेता है कि ‘यह मुझसे हार गया’ ।। २६ ½ ।। स त्वं क्षुद्रसमाचारो नीचात्मा पापनिश्चयः ।। २७ ।। आकेशाग्रान्नखाग्राच्च वक्तव्यो वक्तुमिच्छसि । तू स्वयं ही दुराचारी, नीच और पापपूर्ण विचार रखनेवाला है। नखसे शिखातक पापमें डूबा होनेके कारण निन्दाके योग्य है, तथापि दूसरोंकी निन्दा करना चाहता है ।। २७ ½ ।। यः स भूरिश्रवाश्छिन्नभुजः प्रायगतस्त्वया ।। २८ ।। वार्यमाणेण हि हतस्ततः पापतरं नु किम् ।
भूरिश्रवाकी बाँह काट डाली गयी थी। वे आमरण उपवासका नियम लेकर चुपचाप बैठे हुए थे। उस दशामें सबके मना करनेपर भी जो तूने उनका वध किया, इससे बढ़कर महान् पापकर्म और क्या हो सकता है? ।। २८१/२ ।।
गाहमानो मया द्रोणो दिव्यैनास्त्रेण संयुगे ।। २९ ।। विसृष्टशस्त्रो निहतः किं तत्र क्रूर दुष्कृतम् । ओ क्रूर! मैंने तो पहलेसे ही युद्धके मैदानमें दिव्यास्त्रद्वारा द्रोणाचार्यको मथ डाला था। फिर वे हथियार डालकर मारे गये, तो उसमें मैंने कौन-सा पाप कर डाला ।। २९१/२ ।।
अयुध्यमानं यस्त्वाजौ तथा प्रायगतं मुनिम् ।। ३० ।। छिन्नबाहुं परैर्हन्यात् सात्यके स कथं वदेत् । सात्यके! जो युद्धस्थलमें मुनिवृत्तिका आश्रय ले आमरण उपवासका निश्चय लेकर बैठ गया हो, जो अपने साथ युद्ध न कर रहा हो तथा जिसकी बाँह भी शत्रुओंन्द्वारा काट डाली गयी हो, ऐसे पुरुषको जो मार सकता है, वह दूसरेकी निन्दा कैसे कर सकता है? ।।
निहत्य त्वां पदा भूमौ स विकर्षति वीर्यवान् ।। ३१ ।। किं तदा न निहंस्येनं भूत्वा पुरुषसत्तमः । जिस समय पराक्रमी भूरिश्रवा तुझे लातसे मारकर धरतीपर घसीट रहे थे, तू बड़ा श्रेष्ठ पुरुष था, तो उसी समय उन्हें क्यों नहीं मार डाला? ।। ३११/२ ।।
त्वया पुनरनाय्येण पूर्वं पार्थेन निर्जितः ।। ३२ ।। यदा तदा हतः शूरः सौमदत्तिः प्रतापवान् । जब अर्जुनने पहले ही प्रतापी शूरवीर सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाको परास्त कर दिया, उस समय तूने उनका वध किया। तू कितना नीच है? ।। ३२१/२ ।।
यत्र यत्र तु पाण्डूनां द्रोणो द्रावयते चमूम् ।। ३३ ।। किरन् शरसहस्राणि तत्र तत्र प्रयाक्यहम् । द्रोणाचार्य जहाँ-जहाँ पाण्डव-सेनाको खदेड़ते थे, वहीं-वहीं मैं जा पहुँचता और सहस्रों बाणोंकी वर्षा करके उनके छक्के छुड़ा देता था ।। ३३१/२ ।।
स त्वमेवंविधं कृत्वा कर्म चाण्डालवत् स्वयम् ।। ३४ ।। वक्तुमर्हसि वक्तव्यः कस्मात् त्वं परुषाण्यथ । जब तू स्वयं ही चाण्डालके समान ऐसा पाप-कर्म करके निन्दाका पात्र बन गया है, तब दूसरेको कटु वचन सुनानेका कैसे अधिकारी हो सकता है? ।। ३४१/२ ।।
कर्ता त्वं कर्मणो ह्यस्य नाहं वृष्णिकुलाधम ।। ३५ ।। पापानां च त्वमावासः कर्मणां मा पुनर्वद । वृष्णिकुलकलंक! तू ही ऐसे-ऐसे पाप करनेवाला और पाप-कर्मोंका भण्डार है, मैं नहीं। अतः फिर ऐसी बातें मुँहसे न निकालना ।। ३५१/२ ।।
जोषमास्स्व न मां भूयो वक्तुमर्हस्यतः परम् ।। ३६ ।। अधरोत्तरमेतद्धि यन्मां त्वं वक्तुमर्हसि । चुपचाप बैठा रह; अब फिर ऐसी बातें तुझे नहीं कहनी चाहिये। तू मुझसे जो कुछ कहना चाहता है, वह तेरी बड़ी भारी नीचता है ।। ३६१/२ ।।
अथ वक्ष्यसि मां मौर्ख्याद् भूयः परुषमीदृशम् ।। ३७ ।। गमयिष्यामि बाणैस्त्वां युधि वैवस्वतक्षयम् । यदि मूर्खतावश तू पुनः मुझसे ऐसी कठोर बातें कहेगा, तो युद्धमें बाणोंद्वारा मैं अभी तुझे यमलोक भेज दूँगा ।।
न चैवं मूर्ख धर्मेण केवलेनैव शक्यते ।। ३८ ।। तेषामपि ह्यधर्मेण चेष्टितं शृणु यादृशम् । ओ मूर्ख! केवल धर्मसे ही युद्ध नहीं जीता जा सकता। उन कौरवोंकी भी जो अधर्मपूर्ण चेष्टाएँ हुई हैं, उन्हें सुन ले ।। ३८१/२ ।।
वञ्चितः पाण्डवः पूर्वमधर्मेण युधिष्ठिरः ।। ३९ ।। द्रौपदी च परिक्लिष्टा तथाधर्मेण सात्यके । सात्यके! सबसे पहले पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको अधर्मपूर्वक छला गया। फिर अधर्मसे ही द्रौपदीको अपमानित किया गया ।। ३९१/२ ।।
प्रव्राजिता वनं सर्वे पाण्डवाः सह कृष्णया ।। ४० ।। सर्वस्वमपकृष्टं च तथाधर्मेण बालिश । ओ मूर्ख! समस्त पाण्डवोंको जो द्रौपदीके साथ वनमें भेज दिया गया और उनका सर्वस्व छीन लिया गया, वह भी अधर्मका ही कार्य था ।। ४०१/२ ।।
अधर्मेणापकृष्टश्च मद्राजः परैारितः ।। ४१ ।। अधर्मेण तथा बालः सौभद्रो विनिपातितः । शत्रुओंने अधर्मसे ही छलकर मद्राज शल्यको अपने पक्षमें खींच लिया और सुभद्राके बालक पुत्र अभिमन्युको भी अधर्मसे ही मार डाला था ।। ४११/२ ।।
इतोऽप्यधर्मेण हतो भीष्मः परपुरंजयः ।। ४२ ।। भूरिश्रवा ह्यधर्मेण त्वया धर्मविदा हतः । इस पक्षसे भी अधर्मके द्वारा ही शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्म मारे गये हैं और तू बड़ा धर्मज्ञ बनता है पर तूने भी अधर्मसे ही भूरिश्रवाका वध किया है ।।
एवं परैराचरितं पाण्डवेयैश्च संयुगे ।। ४३ ।। रक्षमाणैर्जयं वीरैर्धर्मज्ञैरपि सात्वत ।
सात्वत! इस प्रकार धर्मके जाननेवाले वीर पाण्डवों तथा शत्रुओंने भी युद्धके मैदानमें अपनी विजयको सुरक्षित रखनेके लिये समय-समयपर अधर्मपूर्ण बर्ताव किया है ॥ ४३ १/२ ॥
दुर्ज्ञेयः स परो धर्मस्तथाधर्मश्च दुर्विदः ॥ ४४ ॥
युध्यस्व कौरवैः सार्धं मा गा पितृनिवेशनम् ।
उत्तम धर्मका स्वरूप जानना अत्यन्त कठिन है। अधर्म क्या है? इसे समझना भी सरल नहीं है। अब तू कौरवोंके साथ पूर्ववत् युद्ध कर। मुझसे विवाद करके पितृलोकमें जानेकी तैयारी न कर ॥ ४४ १/२ ॥
संजय उवाच
एवमादीनि वाक्यानि क्रूराणि परुषाणि च ॥ ४५ ॥
श्रावितः सात्यकिः श्रीमानाकम्पित इवाभवत् ।
तच्छ्रुत्वा क्रोधताम्राक्षः सात्यकिस्त्वाददे गदाम् ॥ ४६ ॥
विनिःश्वस्य यथा सर्पः प्रणिधाय रथे धनुः ।
ततोऽभिपत्य पाञ्चाल्यं संरम्भेणेदमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
न त्वां वक्ष्यामि परुषं हनिष्ये त्वां वधक्षमम् ।
संजय कहते हैं—राजन्! इस प्रकार कितने ही क्रूर एवं कठोर वचन धृष्टद्युम्नने श्रीमान् सात्यकिको सुनाये। उन्हें सुनकर वे क्रोधसे काँपने लगे। उनकी आँखें लाल हो गयीं तथा उन्होंने सर्पके समान लंबी साँस खींचकर धनुषको तो रथपर रख दिया और हाथमें गदा उठा ली। फिर वे धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर बड़े रोषके साथ इस प्रकार बोले—'अब मैं तुझसे कठोर वचन नहीं कहूँगा। तू वधके ही योग्य है, अतः तुझे मार ही डालूँगा ॥ ४५—४७ १/२ ॥
तमापतन्तं सहसा महाबलममर्षणम् ॥ ४८ ॥
पाञ्चाल्यायाभिसंक्रुद्धमन्तकायान्तकोपमम् ।
चोदितो वासुदेवेन भीमसेनो महाबलः ॥ ४९ ॥
अवप्लुत्य रथात् तूर्णं बाहुभ्यां समवारयत् ।
महाबली, अमर्षशील एवं अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए यमराज-तुल्य सात्यकि जब सहसा कालस्वरूप धृष्टद्युम्नकी ओर बढ़े, तब भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे महाबली भीमसेनने तुरंत ही रथसे कूदकर उन्हें दोनों हाथोंसे रोक लिया ॥ ४८-४९ १/२ ॥
द्रवमाणं तथा क्रुद्धं सात्यकिं पाण्डवो बली ॥ ५० ॥
प्रस्पन्दमानमादाय जगाम बलिनं बलात् ।
क्रोधपूर्वक आगे बढ़ते और झपटते हुए बलवान् सात्यकिको महाबली पाण्डुपुत्र भीमने थामकर साथ-साथ चलना आरम्भ किया ॥ ५० १/२ ॥
स्थित्वा विष्टभ्य चरणौ भीमेन शिनिपुङ्गवः ॥ ५१ ॥ निगृहीतः पदे षष्ठे बलेन बलिनां वरः । फिर भीमने खड़े होकर अपने दोनों पैर जमा दिये और बलवानोंमें श्रेष्ठ शिनिप्रवर सात्यकिको छठे कदमपर बलपूर्वक काबूमें कर लिया ॥ ५१ १/२ ॥
अवरुह्य रथात् तूर्णं ध्रियमाणं बलीयसा ॥ ५२ ॥ उवाच श्लक्ष्णया वाचा सहदेवो विशाम्पते । प्रजानाथ! इतनेहीमें सहदेव भी तुरंत ही रथसे उतर पड़े और महाबली भीमसेनके द्वारा पकड़े गये सात्यकिसे मधुर वाणीमें इस प्रकार बोले— ॥ ५२ १/२ ॥
अस्माकं पुरुषव्याघ्र मित्रमन्यन्न विद्यते ॥ ५३ ॥ परमन्धकवृष्णिभ्यः पञ्चालेभ्यश्च मारिष । तथैवान्धकवृष्णीनां तथैव च विशेषतः ॥ ५४ ॥ कृष्णस्य च तथास्मत्तो मित्रमन्यन्न विद्यते । ‘माननीय पुरुषसिंह! अन्धक और वृष्णिवंशके यादवों तथा पांचालोंसे बढ़कर दूसरा कोई हमलोगोंका मित्र नहीं है। इसी प्रकार अन्धक और वृष्णिवंशके लोगोंका तथा विशेषतः श्रीकृष्णका हमलोगोंसे बढ़कर दूसरा कोई मित्र नहीं है ॥ ५३-५४ १/२ ॥
पञ्चालानां च वार्ष्णेय समुद्रान्तां विचिन्वताम् ॥ ५५ ॥ नान्यदस्ति परं मित्रं यथा पाण्डववृष्णयः । ‘वार्ष्णेय! पांचाल लोग भी यदि समुद्रतककी सारी पृथ्वी खोज डालें, तो भी उन्हें दूसरा कोई वैसा मित्र नहीं मिलेगा, जैसे उनके लिये पाण्डव और वृष्णिवंशके लोग हैं ॥ ५५ १/२ ॥
स भवानीदृशं मित्रं मन्यते च यथा भवान् ॥ ५६ ॥ भवन्तश्च यथास्माकं भवतां च तथा वयम् । ‘आप भी हमारे ऐसे ही मित्र हैं, जैसा कि आप स्वयं भी मानते हैं। आपलोग जैसे हमारे मित्र हैं, वैसे ही हम भी आपके हैं ॥ ५६ १/२ ॥
स एवं सर्वधर्मज्ञ मित्रधर्ममनुस्मरन् ॥ ५७ ॥ नियच्छ मन्युं पाञ्चाल्यात् प्रशाम्य शिनिपुङ्गव । पार्षतस्य क्षम त्वं वै क्षमतां पार्षतश्च ते ॥ ५८ ॥ वयं क्षमयितारश्च किमन्यत्र शमाद् भवेत् । ‘सब धर्मोंके ज्ञाता शिनिप्रवर! इस प्रकार मित्रधर्मका विचार करके आप धृष्टद्युम्नकी ओरसे अपने क्रोधको रोकें और शान्त हो जायँ, आप धृष्टद्युम्नके और धृष्टद्युम्न आपके अपराधको क्षमा कर लें। हमलोग केवल क्षमा-प्रार्थना करनेवाले हैं; शान्तिसे बढ़कर श्रेष्ठ वस्तु और क्या हो सकती है?’ ॥ ५७-५८ १/२ ॥
प्रशाम्यमाने शैनेये सहदेवेन मारिष ॥ ५९ ॥
पाञ्चालराजस्य सुतः प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
माननीय नरेश! जब सहदेव सात्यकिको इस प्रकार शान्त कर रहे थे, उस समय पांचालराजके पुत्रने हँसकर इस प्रकार कहा— ॥ ५९ १/२ ॥
मुञ्च मुञ्च शिनेः पौत्रं भीम युद्धमदान्वितम् ॥ ६० ॥
आसादयतु मामेष धराधरमिवानिलः ।
यावदस्य शितैर्बाणैः संरम्भं विनयाम्यहम् ॥ ६१ ॥
युद्धश्रद्धां च कौन्तेय जीवितं चास्य संयुगे ।
‘भीमसेन! शिनिके इस पौत्रको अपने युद्ध-कौशलपर बड़ा घमंड है। तुम इसे छोड़ दो, छोड़ दो। जैसे हवा पर्वतसे आकर टकराती है, उसी प्रकार यह मुझसे आकर भिड़े तो सही। कुन्तीनन्दन! मैं अभी तीखे बाणोंसे इसका क्रोध उतार देता हूँ। साथ ही इसका युद्धका हौसला और जीवन भी समाप्त किये देता हूँ ॥ ६०-६१ १/२ ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुं कार्यं यदिदमुद्यतम् ॥ ६२ ॥
सुमहत् पाण्डुपुत्राणामायान्त्येते हि कौरवाः ।
‘परंतु मैं इस समय क्या कर सकता हूँ। पाण्डवोंका यह दूसरा ही महान् कार्य उपस्थित हो गया। ये कौरव बढ़े चले आ रहे हैं ॥ ६२ १/२ ॥
अथवा फाल्गुनः सर्वान् वारयिष्यति संयुगे ॥ ६३ ॥
अहमप्यस्य मूर्धानं पातयिष्यामि सायकैः ।
मन्यते छिन्नबाहुं मां भूरिश्रवसमाहवे ॥ ६४ ॥
उत्सृजैनमहं चैनमेष वा मां हनिष्यति ।
‘अथवा केवल अर्जुन युद्धके मैदानमें इन समस्त कौरवोंको रोकेंगे, तबतक मैं भी अपने बाणोंद्वारा इस सात्यकिका मस्तक काट गिराऊँगा। यह मुझे भी रणभूमिमें कटी हुई बाँहवाला भूरिश्रवा समझता है। तुम छोड़ दो इसे। या तो मैं इसे मार डालूँगा या यह मुझे’ ॥
शृण्वन् पाञ्चालवाक्यानि सात्यकिः सर्पवच्छ्वसन् ॥ ६५ ॥
भीमबाह्वन्तरे सक्तो विस्फुरत्यनिशं बली ।
भीमसेनकी भुजाओंमें फँसे हुए बलवान् सात्यकि धृष्टद्युम्नकी बातें सुनकर फुफकारते हुए सर्पके समान लंबी साँस खींचते हुए निरन्तर छूटनेकी चेष्टा कर रहे थे ॥ ६५ १/२ ॥
तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ बाहुशालिनौ ॥ ६६ ॥
त्वरया वासुदेवश्च धर्मराजश्च मारिष ।
यत्नेन महता वीरौ वारयामासतुस्ततः ॥ ६७ ॥
अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले वे दोनों वीर दो साँड़ोंके समान गरज रहे थे। माननीय नरेश! उस समय भगवान् श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरने शीघ्रतापूर्वक महान् प्रयत्न करके उन दोनों वीरोंको रोका ॥ ६६-६७ ॥
निवार्य परमेष्वासौ कोपसंरक्तलोचनौ । युयुत्सुनपरान् संख्ये प्रतीयुः क्षत्रियर्षभाः ॥ ६८ ॥ क्रोधसे लाल आँखें किये उन दोनों महान् धनुर्धरोंको रोककर वे क्षत्रियशिरोमणि वीर समरभूमिमें युद्धकी इच्छासे आते हुए शत्रुओंका सामना करनेके लिये चल दिये ॥ ६८ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि धृष्टद्युम्नसात्यकि- क्रोधेऽष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें धृष्टद्युम्न और सात्यकिका क्रोधविषयक एक सौ अठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९८ ॥