महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1479, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'इस संसारमें मुझसे या अर्जुनसे बढ़कर दूसरा कोई अस्त्रवेत्ता कहीं नहीं है। आज मैं शत्रुके सेनामें घुसकर प्रकाशमान अंशुधारियोंके बीच अंशुमाली सूर्यके समान तपता हुआ देवनिर्मित अस्त्रोंका प्रयोग करूँगा ।। भृशमिष्वसनादद्य मत्प्रयुक्ता महाहवे । दर्शयन्तः शरा वीर्यं प्रमथिष्यन्ति पाण्डवान् ॥ २६ ॥ 'आज महासमरमें धनुषसे मेरे द्वारा छोड़े हुए बाण मेरा महान् पराक्रम दिखाते हुए पाण्डवयोद्धाओंको मथ डालेंगे ।। २६ ।। अद्य सर्वा दिशो राजन् धाराभिरिव संकुलाः । आवृताः पत्रिभिस्तीक्ष्णैर्द्रष्टारो मामकैरिह ॥ २७ ॥ 'राजन्! जैसे बरसती हुई जलधाराओंसे सम्पूर्ण दिशाएँ ढक जाती हैं, उसी प्रकार आज सब लोग मेरे तीखे बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित हुई देखेंगे ।। विकिरन् शरजालानि सर्वतो भैरवस्वनान् । शत्रून् निपातयिष्यामि महावात इव द्रुमान् ॥ २८ ॥ 'जैसे आँधी वृक्षोंको गिरा देती है, उसी प्रकार मैं सब ओर बाणसमूहोंकी वर्षा करके भयंकर गर्जना करनेवाले शत्रुओंको मार गिराऊँगा ।। २८ ।। न हि जानाति बीभत्सुस्तदस्त्रं न जनार्दनः । न भीमसेनो न यमौ न च राजा युधिष्ठिरः ॥ २९ ॥ न पार्षतो दुरात्मासौ न शिखण्डी न सात्यकिः । यदिदं मयि कौरव्य सकल्पं संनिवर्तनम् ॥ ३० ॥ 'आज मैं जिस अस्त्रका प्रयोग करूँगा, उसे न अर्जुन जानते हैं न श्रीकृष्ण, भीमसेन, नकुल-सहदेव और राजा युधिष्ठिरको भी उसका पता नहीं है। वह दुरात्मा धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और सात्यकि भी उसके ज्ञानसे शून्य हैं। कुरुनन्दन! वह तो प्रयोग और उपसंहारसहित केवल मेरे ही पास है ।। २९-३० ।। नारायणाय मे पित्रा प्रणम्य विधिपूर्वकम् । उपहारः पुरा दत्तो ब्रह्मरूप उपस्थितः ॥ ३१ ॥ तं स्वयं प्रतिगृह्याथ भगवान् स वरं ददौ । वव्रे पिता मे परममस्त्रं नारायणं ततः ॥ ३२ ॥ 'पूर्वकालकी बात है, मेरे पिताने भगवान् नारायणको प्रणाम करके उन्हें विधिपूर्वक वेदस्वरूप उपहार समर्पित किया (वैदिक मन्त्रोंद्वारा उनकी स्तुति की)। भगवान्ने स्वयं उपस्थित होकर वह उपहार ग्रहण किया और पिताको वर दिया। मेरे पिताने वरके रूपमें उनसे सर्वोत्तम नारायणास्त्रकी याचना की ।। ३१-३२ ।। अथैनमब्रवीद् राजन् भगवान् देवसत्तमः । भविता त्वत्समो नान्यः कश्चिद् युधि नरः क्वचित् ॥ ३३ ॥