महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1484, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिवर्तितेषु सैन्येषु द्रोणपुत्रेण संयुगे । भृशं शोकाभितप्तेन पितुर्वधममृष्यता ॥ ७ ॥ कुरूनापततो दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नस्य रक्षणे । को मन्त्रः पाण्डवेष्वासीत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ८ ॥ **धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! अपने पिताके वधको सहन न कर सकनेवाला अत्यन्त शोकसंतप्त द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके साथ जब सारी सेनाएँ युद्धस्थलमें लौट आयीं, तब कौरवोंको आते देख पाण्डवदलमें धृष्टद्युम्नकी रक्षाके लिये क्या विचार हुआ, वह मुझे बताओ ॥
संजय उवाच
प्रागेव विद्रुतान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् युधिष्ठिरः । पुनश्च तुमुलं शब्दं श्रुत्वार्जुनमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! राजा युधिष्ठिरने पहले तो आपके सैनिकोंको भागते देखा था। फिर उन्होंने वह भयंकर शब्द सुनकर अर्जुनसे कहा ॥ ९ ॥
युधिष्ठिर उवाच
आचार्ये निहते द्रोणे धृष्टद्युम्नेन संयुगे । निहते वज्रहस्तेन यथा वृत्रे महासुरे ॥ १० ॥ नाशंसन्तो जयं युद्धे दीनात्मानो धनंजय । आत्मत्राणे मतिं कृत्वा प्राद्रवन् कुरवो रणात् ॥ ११ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**धनंजय! पूर्वकालमें जैसे वज्रधारी इन्द्रने महान् असुर वृत्रासुरको मार डाला था, उसी प्रकार युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नद्वारा आचार्य द्रोणके मारे जानेपर युद्धमें अपनी विजयसे निराश हो दीनचित्त कौरव आत्मरक्षाका विचार करके रणभूमिसे भागे जा रहे थे ॥
केचिद् भ्रान्तै रथैस्तूर्णं निहतैः पार्ष्णियन्तृभिः । विपताकध्वजच्छत्रैः पार्थिवाः शीर्णकूबरैः ॥ १२ ॥ भग्ननीडैराकुलाश्वैः प्ररुग्णाश्च विशेषतः । भग्नाक्षयुगचक्रैश्च व्याकृष्यन्त समन्ततः ॥ १३ ॥ जिनके पार्श्वक्षक और सारथि मारे गये थे, ध्वजा, पताका और छत्र नष्ट हो गये थे, कूबर टूटकर बिखर गये थे, बैठनेके स्थान चौपट हो चुके थे तथा धुरे, जूए और पहिये भी टूट-फूट गये थे, वैसे रथ भी व्याकुल घोड़ोंसे आकृष्ट हो वहाँ चक्कर लगा रहे थे और उनके द्वारा कुछ विशेष घायल हुए नरेश चारों ओर खिंचे चले जा रहे थे ॥ १२-१३ ॥
भीताः पादैर्हयान् केचित् त्वरयन्तः स्वयं रथान् । रथान् विशीर्णानुत्सृज्य पद्भिः केचिच्च विद्रुताः ॥ १४ ॥