भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1483, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1483

⬅ विषय-सूची (TOC)

षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः

कौरव-सेनाका सिंहनाद सुनकर युधिष्ठिरका अर्जुनसे कारण पूछना और अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाके क्रोध एवं गुरुहत्याके भीषण परिणामका वर्णन

संजय उवाच

प्रादुर्भूते ततस्तस्मिन्नस्त्रे नारायणे प्रभो।
प्रावात् सपृषतो वायुरनभ्रे स्तनयित्नुमान्॥ १॥
संजय कहते हैं—प्रभो! तदनन्तर उस नारायणास्त्रके प्रकट होनेपर जलकी बूँदोंके साथ प्रचण्ड वायु चलने लगी। बिना बादलोंके ही आकाशमें मेघोंकी गर्जना होने लगी॥ १॥

चचाल पृथिवी चापि चुक्षुभे च महोदधिः।
प्रतिस्रोतः प्रवृत्ताश्च गन्तुं तत्र समुद्रगाः॥ २॥
पृथ्वी काँप उठी, समुद्रमें ज्वार आ गया और समुद्रमें मिलनेवाली बड़ी-बड़ी नदियाँ अपने प्रवाहकी प्रतिकूल दिशामें बहने लगीं॥ २॥

शिखराणि व्यशीर्यन्त गिरीणां तत्र भारत।
अपसव्यं मृगाश्चैव पाण्डुसेनां प्रचक्रिरे॥ ३॥
भारत! पर्वतोंके शिखर टूट-टूटकर गिरने लगे। हरिणोंके झुंड पाण्डव-सेनाको अपने दायें करके चले गये॥ ३॥

तमसा चावकीर्यन्त सूर्यश्च कलुषोऽभवत्।
सम्पतन्ति च भूतानि क्रव्यादानि प्रहृष्टवत्॥ ४॥
सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया, सूर्य मलिन हो गये और मांसभोजी जीव-जन्तु प्रसन्न-से होकर दौड़ लगाने लगे॥ ४॥

देवदानवगन्धर्वास्त्रस्तास्त्वासन् विशाम्पते।
कथंकथाभवत् तीव्रा दृष्ट्वा तद् व्याकुलं महत्॥ ५॥
प्रजानाथ! वह महान् उत्पात देखकर देवता, दानव और गन्धर्व भी त्रस्त हो उठे तथा सब लोगोंमें यह तीव्र गतिसे चर्चा होने लगी कि 'अब क्या करना चाहिये'॥ ५॥

व्यथिताः सर्वराजानस्त्रस्ताश्चासन् विशाम्पते।
तद् दृष्ट्वा घोररूपं वै द्रौणेरस्त्रं भयावहम्॥ ६॥
महाराज! अश्वत्थामाके उस घोर एवं भयंकर अस्त्रको देखकर समस्त भूपाल व्यथित एवं भयभीत हो गये॥ ६॥

धृतराष्ट्र उवाच