महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनकुलं पञ्चभिर्विद्ध्वा सहदेवं च सप्तभिः ॥ २७ ॥ युधिष्ठिरं द्वादशभिर्द्रौपदेयांस्त्रिभिस्त्रिभिः । सात्यकिं पञ्चभिर्विद्ध्वा मत्स्यं च दशभिः शरैः ॥ २८ ॥ उन्होंने शिखण्डीको बारह, उत्तमौजाको बीस, नकुलको पाँच और सहदेवको सात बाणोंसे घायल करके युधिष्ठिरको बारह, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको तीन-तीन, सात्यकिको पाँच और विराटको दस बाणोंसे बींध डाला ॥ २७-२८ ॥
व्यक्षोभयद् रणे योधान् यथा मुख्यमभिद्रवन् । अभ्यवर्तत सम्प्रेप्सुः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ २९ ॥ राजन्! उन्होंने रणक्षेत्रमें मुख्य-मुख्य योद्धाओंपर धावा करके उन सबको क्षोभमें डाल दिया और कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको पकड़नेके लिये उनपर वेगसे आक्रमण किया ॥ २९ ॥
युगन्धरस्ततो राजन् भारद्वाजं महारथम् । वारयामास संक्रुद्धं वातोद्धतमिवार्णवम् ॥ ३० ॥ राजन्! उस समय वायुके थपेड़ोंसे विक्षुब्ध हुए महासागरके समान क्रोधमें भरे हुए महारथी द्रोणाचार्यको राजा युगन्धरने रोक दिया ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरं स विद्ध्वा तु शरैः संनतपर्वभिः । युगन्धरं तु भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ ३१ ॥ तब झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको घायल करके द्रोणाचार्यने एक भल्ल नामक बाणद्वारा मारकर युगन्धरको रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ३१ ॥
ततो विराटद्रुपदौ केकयाः सात्यकिः शिबिः । व्याघ्रदत्तश्च पाञ्चाल्यः सिंहसेनश्च वीर्यवान् ॥ ३२ ॥ एते चान्ये च बहवः परीप्सन्तो युधिष्ठिरम् । आवव्रुस्तस्य पन्थानं किरन्तः सायकान् बहून् ॥ ३३ ॥ यह देख विराट, द्रुपद, केकय, सात्यकि, शिबि, पांचालदेशीय व्याघ्रदत्त तथा पराक्रमी सिंहसेन—ये तथा और भी बहुत-से नरेश राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करनेके लिये बहुत-से सायकोंकी वर्षा करते हुए द्रोणाचार्यकी राह रोककर खड़े हो गये ॥ ३२-३३ ॥
व्याघ्रदत्तस्तु पाञ्चाल्यो द्रोणं विव्याध मार्गणैः । पञ्चाशता शितै राजंस्तत उच्चुक्रुशुर्जनाः ॥ ३४ ॥ राजन्! पांचालदेशीय व्याघ्रदत्तने पचास तीखे बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। तब सब लोग जोर-जोरसे हर्षनाद करने लगे ॥ ३४ ॥
त्वरितं सिंहसेनस्तु द्रोणं विद्ध्वा महारथम् । प्राहसत् सहसा हृष्टस्त्रासयन् वै महारथान् ॥ ३५ ॥ हर्षमें भरे हुए सिंहसेनने तुरंत ही महारथी द्रोणाचार्यको घायल करके अन्य महारथियोंके मनमें त्रास उत्पन्न करते हुए सहसा जोरसे अट्टहास किया ॥ ३५ ॥