भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

तब लाल घोड़ोंवाले द्रोणाचार्यने कुपित हो चार दाँतोंवाले गजराजके समान पाण्डव-सेनामें घुसकर युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ १९ ॥ तमाविध्यच्छितैर्बाणैः कङ्कपत्रैर्युधिष्ठिरः । तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा तं द्रुतं समुपाद्रवत् ॥ २० ॥ युधिष्ठिरने गीधकी पाँखोंसे युक्त पैने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको बींध डाला। तब द्रोणाचार्यने उनका धनुष काटकर बड़े वेगसे उनपर आक्रमण किया ॥ २० ॥ चक्ररक्षः कुमारस्तु पञ्चालानां यशस्करः । दधार द्रोणमायान्तं वेलेव सरितां पतिम् ॥ २१ ॥ उस समय पांचालोंके यशको बढ़ानेवाले कुमारने, जो युधिष्ठिरके रथ-चक्रकी रक्षा कर रहे थे, आते हुए द्रोणाचार्यको उसी प्रकार रोक दिया, जैसे तटभूमि समुद्रको रोकती है ॥ २१ ॥ द्रोणं निवारितं दृष्ट्वा कुमारेण द्विजर्षभम् । सिंहनादरवो ह्यासीत् साधु साध्विति भाषितम् ॥ २२ ॥ कुमारके द्वारा द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यको रोका गया देख पाण्डव-सेनामें जोर-जोरसे सिंहनाद होने लगा और सब लोग कहने लगे 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' ॥ २२ ॥ कुमारस्तु ततो द्रोणं सायकेन महाहवे । विव्याधोरसि संक्रुद्धः सिंहवच्च नदन् मुहुः ॥ २३ ॥ कुमारने उस महायुद्धमें कुपित हो बारंबार सिंहनाद करते हुए एक बाणद्वारा द्रोणाचार्यकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ २३ ॥ संवार्य च रणे द्रोणं कुमारस्तु महाबलः । शरैरनेकसाहस्रैः कृतहस्तो जितश्रमः ॥ २४ ॥ इतना ही नहीं, उस महाबली कुमारने कई हजार बाणोंद्वारा रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यको रोक दिया; क्योंकि उनके हाथ अस्त्र-संचालनकी कलामें दक्ष थे और उन्होंने परिश्रमको जीत लिया था ॥ २४ ॥ तं शूरमार्यव्रतिनं मन्त्रास्त्रेषु कृतश्रमम् । चक्ररक्षं परामृद्नात् कुमारं द्विजपुङ्गवः ॥ २५ ॥ परंतु द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यने शूर, आर्यव्रती एवं मन्त्रास्त्रविद्यामें परिश्रम किये हुए चक्र-रक्षक कुमारको परास्त कर दिया ॥ २५ ॥ स मध्यं प्राप्य सैन्यानां सर्वाः प्रविचरन् दिशः । तव सैन्यस्य गोप्ताऽऽसीद् भारद्वाजो द्विजर्षभः ॥ २६ ॥ राजन्! भरद्वाजनन्दन विप्रवर द्रोणाचार्य आपकी सेनाके संरक्षक थे। वे पाण्डव-सेनाके बीचमें घुसकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरने लगे ॥ २६ ॥ शिखण्डिनं द्वादशभिर्विंशत्या चोत्तमौजसम् ।