भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

यह धृतराष्ट्रकी सेना तितर-बितर हो अनेक भागोंमें बँटी जा रही हैं। मैं युधिष्ठिरको रोककर इस सेनाको स्थिर करूँगा (भागनेसे रोकूँगा)। न हि मामभिवर्षन्ति संयुगे तात पाण्डवाः ।। मात्स्याः पाञ्चालराजानः सर्वे च सहसोमकाः । तात! ये पाण्डव, मत्स्य, पांचाल और समस्त सोमक वीर मुझपर बाण-वर्षा नहीं कर सकते। अर्जुनो मत्प्रसादाद्धि महास्त्राणि समाप्तवान् ।। न मामुत्सहते तात न भीमो न च सात्यकिः । अर्जुनने भी मेरी ही कृपासे बड़े-बड़े अस्त्रोंको प्राप्त किया है। तात! वे भीमसेन और सात्यकि भी मुझसे लड़नेका साहस नहीं कर सकते। मत्प्रसादाद्धि बीभत्सुः परमेष्वासतां गतः ।। ममैवास्त्रं विजानाति धृष्टद्युम्नोऽपि पार्षतः । अर्जुन मेरे ही प्रसादसे महान् धनुर्धर हो गये हैं। धृष्टद्युम्न भी मेरे ही दिये हुए अस्त्रोंका ज्ञान रखता है। नायं संरक्षितुं कालः प्राणांस्तात जयैषिणा ।। याहि स्वर्गं पुरस्कृत्य यशसे च जयाय च । तात सारथे! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले वीरके लिये यह प्राणोंकी रक्षा करनेका अवसर नहीं है। तुम स्वर्गप्राप्तिका उद्देश्य लेकर यश और विजयके लिये आगे बढ़ो।

संजय उवाच

एवं संचोदितो यन्ता द्रोणमभ्यवहत् ततः ।। तदाश्वहृदयेनाश्वानभिमन्त्र्याशु हर्षयन् । रथेन सवरूथेन भास्वरेण विराजता ।। **संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार प्रेरित होकर सारथि अश्वहृदय नामक मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके घोड़ोंका हर्ष बढ़ाता हुआ आवरणयुक्त प्रकाशमान एवं तेजस्वी रथके द्वारा शीघ्रतापूर्वक द्रोणाचार्यको आगे ले चला। तं करूषाश्च मत्स्याश्च चेदयश्च ससात्वताः । पाण्डवाश्च सपञ्चालाः सहिताः पर्यवारयन् ।।) उस समय करूष, मत्स्य, चेदि, सात्वत, पाण्डव तथा पांचाल वीरोंने एक साथ आकर द्रोणाचार्यको रोका। ततः शोणहयः क्रुद्धश्चतुर्दन्त इव द्विपः । प्रविश्य पाण्डवानीकं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ।। १९ ।।