महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीमकर्णकृपद्रोणद्रौणिपार्षतसात्यकैः ।
बभासे स रणोद्देशः कालसूर्य इवोदितः ॥ १५ ॥
भीम, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोण, अश्वत्थामा, धृष्टद्युम्न तथा सात्यकि आदि वीरोंसे वह रणक्षेत्र ऐसी शोभा पा रहा था, मानो वहाँ प्रलयकालके सूर्यका उदय हुआ हो ॥ १५ ॥
तदाऽऽसीत् तुमुलं युद्धं निघ्नतामितरेतरम् ।
महाबलानां बलिभिर्दानवानां यथा सुरैः ॥ १६ ॥
उस समय एक-दूसरेपर प्रहार करनेवाले उन महाबली वीरोंमें वैसा ही भयंकर युद्ध हो रहा था, जैसे पूर्वकालमें बलवान् देवताओंके साथ महाबली दानवोंका संग्राम हुआ था ॥ १६ ॥
ततो युधिष्ठिरानीकमुद्धृतार्णवनिःस्वनम् ।
त्वदीयवधीत् सैन्यं सम्प्रद्रुतमहारथम् ॥ १७ ॥
तदनन्तर उत्ताल तरंगोंसे युक्त महासागरकी भाँति गर्जना करती हुई युधिष्ठिरकी सेना आपकी सेनाका संहार करने लगी। इससे कौरव-सेनाके बड़े-बड़े रथी भाग खड़े हुए ॥ १७ ॥
तत् प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा शत्रुभिर्भृशमर्दितम् ।
अलं द्रुतेन वः शूरा इति द्रोणोऽभ्यभाषत ॥ १८ ॥
शत्रुओंके द्वारा अच्छी तरह रौंदी गयी आपकी सेनाको भागती देख द्रोणाचार्यने कहा—‘शूरवीरो! तुम भागो मत, इससे कोई लाभ न होगा' ॥ १८ ॥
(भारद्वाजममर्षश्च विक्रमश्च समाविशत् ।
समुद्धृत्य निष्ङ्गाच्च धनुर्ज्यामवमृज्य च ॥
महाशरधनुष्पाणिर्यन्तारमिदमब्रवीत् ।
उस समय द्रोणाचार्यमें अमर्ष और पराक्रम दोनोंका समावेश हुआ। उन्होंने धनुषकी प्रत्यंचाको पोंछकर तूणीरसे बाण निकाला और उस महान् बाण एवं धनुषको हाथमें लेकर सारथिसे इस प्रकार कहा।
द्रोण उवाच
सारथे याहि यत्रैव पाण्डरेण विराजता ।।
ध्रियमाणेण छत्रेण राजा तिष्ठति धर्मराट् ।
**द्रोणाचार्य बोले—**सारथे! वहीं चलो, जहाँ सुन्दर श्वेत छत्र धारण किये धर्मराज राजा युधिष्ठिर खड़े हैं।
तदेतद् दीर्यते सैन्यं धार्तराष्ट्रमनेकधा ।।
एतत् संस्तम्भयिष्यामि प्रतिवार्य युधिष्ठिरम् ।