महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें(संशप्तकवधपर्व)
सप्तदशोऽध्यायः
सुशर्मा आदि संशप्तकवीरोंकी प्रतिज्ञा तथा अर्जुनका युद्धके लिये उनके निकट जाना
संजय उवाच
ते सेने शिबिरं गत्वा न्यविशेतां विशाम्पते ।
यथाभागं यथान्यायं यथागुल्मं च सर्वशः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! वे दोनों सेनाएँ अपने शिविरमें जाकर ठहर गयीं। जो सैनिक जिस विभाग और जिस सैन्यदलमें नियुक्त थे, उसीमें यथायोग्य स्थानपर जाकर सब ओर ठहर गये ॥ १ ॥
कृत्वावहारं सैन्यानां द्रोणः परमदुर्मनाः ।
दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य सव्रीडमिदमब्रवीत् ॥ २ ॥
सेनाओंको युद्धसे लौटाकर द्रोणाचार्य मन-ही-मन अत्यन्त दुःखी हो दुर्योधनकी ओर देखते हुए लज्जित होकर बोले— ॥ २ ॥
उक्तमेतन्मया पूर्वं न तिष्ठति धनंजये ।
शक्यो ग्रहीतुं संग्रामे देवैरपि युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
'राजन्! मैंने पहले ही कह दिया था कि अर्जुनके रहते हुए सम्पूर्ण देवता भी युद्धमें युधिष्ठिरको पकड़ नहीं सकते हैं ॥ ३ ॥
इति तद् वः प्रयततां कृतं पार्थेन संयुगे ।
मा विशङ्कीर्वचो मह्यमजेयौ कृष्णपाण्डवौ ॥ ४ ॥
'तुम सब लोगोंके प्रयत्न करनेपर भी उस युद्धस्थलमें अर्जुनने मेरे पूर्वोक्त कथनको सत्य कर दिखाया है। तुम मेरी बातपर संदेह न करना। वास्तवमें श्रीकृष्ण और अर्जुन मेरे लिये अजेय हैं ॥ ४ ॥
अपनीते तु योगेन केनचिच्छ्वेतवाहने ।
तत एष्यति मे राजन् वशमेष युधिष्ठिरः ॥ ५ ॥
'राजन्! यदि किसी उपायसे श्वेतवाहन अर्जुन दूर हटा दिये जायँ तो ये राजा युधिष्ठिर मेरे वशमें आ जायँगे ॥ ५ ॥
कश्चिदाहूय तं संख्ये देशमन्यं प्रकर्षतु ।