भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 154

तमजित्वा न कौन्तेयो निवर्तेत कथंचन ॥ ६ ॥
‘यदि कोई वीर अर्जुनको युद्धके लिये ललकारकर दूसरे स्थानमें खींच ले जाय तो वह कुन्तीकुमार उसे परास्त किये बिना किसी प्रकार नहीं लौट सकता ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे शून्ये धर्मराजमहं नृप ।
ग्रहीष्यामि चमूं भित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ॥ ७ ॥
‘नरेश्वर! इस सूने अवसरमें मैं धृष्टद्युम्नके देखते-देखते पाण्डव-सेनाको विदीर्ण करके धर्मराज युधिष्ठिरको अवश्य पकड़ लूँगा ॥ ७ ॥
अर्जुनेन विहीनस्तु यदि नोत्सृजते रणम् ।
मामुपायान्तमालोक्य गृहीतं विद्धि पाण्डवम् ॥ ८ ॥
‘अर्जुनसे अलग रहनेपर यदि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर मुझे निकट आते देख युद्धस्थलका परित्याग नहीं कर देंगे तो तुम निश्चय समझो, वे मेरी पकड़में आ जायँगे ॥ ८ ॥
एवं तेऽहं महाराज धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
समानेष्यामि सगशं वशमद्य न संशयः ॥ ९ ॥
यदि तिष्ठति संग्रामे मुहूर्तमपि पाण्डवः ।
अथापयाति संग्रामाद् विजयात् तद् विशिष्यते ॥ १० ॥
‘महाराज! यदि अर्जुनके बिना दो घड़ी भी युद्धभूमिमें खड़े रहे तो मैं तुम्हारे लिये धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको आज उनके गणोंसहित अवश्य पकड़ लाऊँगा; इसमें संदेह नहीं है और यदि वे संग्रामसे भाग जाते हैं तो यह हमारी विजयसे भी बढ़कर है’ ॥ ९-१० ॥

संजय उवाच

द्रोणस्य तद् वचः श्रुत्वा त्रिगर्ताधिपतिस्तदा ।
भ्रातृभिः सहितो राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ ११ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! द्रोणाचार्यका यह वचन सुनकर उस समय भाइयोंसहित त्रिगर्तराज सुशर्माने इस प्रकार कहा— ॥ ११ ॥
वयं विनिकृता राजन् सदा गाण्डीवधन्वना ।
अनागःस्वपि चागस्तत् कृतमस्मासु तेन वै ॥ १२ ॥
‘महाराज! गाण्डीवधारी अर्जुनने हमेशा हमलोगोंका अपमान किया है। यद्यपि हम सदा निरपराध रहे हैं तो भी उनके द्वारा सर्वदा हमारे प्रति अपराध किया गया है ॥ १२ ॥
ते वयं स्मरमाणास्तान् विनिकारान् पृथग्विधान् ।
क्रोधाग्निना दह्यमाना न शेमहि सदा निशि ॥ १३ ॥
‘हम पृथक्-पृथक् किये गये उन अपराधोंको याद करके क्रोधाग्निसे दग्ध होते रहते हैं तथा रातमें हमें कभी नींद नहीं आती है ॥ १३ ॥

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