भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

स नो दिष्ट्यास्त्रसम्पन्नश्चक्षुर्विषयमागतः । कर्तारः स्म वयं कर्म यच्चिकीर्षाम हृद्गतम् ॥ १४ ॥ 'अब हमारे सौभाग्यसे अर्जुन स्वयं ही अस्त्र-शस्त्र धारण करके आँखोंके सामने आ गये हैं। इस दशामें हम मन-ही-मन जो कुछ करना चाहते थे, वह प्रतिशोधात्मक कार्य अवश्य करेंगे ॥ १४ ॥

भवतश्च प्रियं यत् स्यादास्माकं च यशस्करम् । वयमेनं हनिष्यामो निकृष्यायोधनाद् बहिः ॥ १५ ॥ 'उससे आपका तो प्रिय होगा ही, हमलोगोंके सुयशकी भी वृद्धि होगी। हम इन्हें युद्धस्थलसे बाहर खींच ले जायँगे और मार डालेंगे ॥ १५ ॥

अद्यास्त्वनर्जुना भूमिरत्रिगार्था वा पुनः । सत्यं ते प्रतिजानीमो नैतन्मिथ्या भविष्यति ॥ १६ ॥ 'आज हम आपके सामने यह सत्य प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि यह भूमि या तो अर्जुनसे सूनी हो जायगी या त्रिगर्तोंमेंसे कोई इस भूतलपर नहीं रह जायगा। मेरा यह कथन कभी मिथ्या नहीं होगा' ॥ १६ ॥

एवं सत्यरथश्चोक्त्वा सत्यवर्मा च भारत । सत्यव्रतश्च सत्येषुः सत्यकर्मा तथैव च ॥ १७ ॥ सहिता भ्रातरः पञ्च रथानामयुतेन च । न्यवर्तन्त महाराज कृत्वा शपथमाहवे ॥ १८ ॥ भरतनन्दन! सुशर्माके ऐसा कहनेपर सत्यरथ, सत्यवर्मा, सत्यव्रत, सत्येषु तथा सत्यकर्मा नामवाले उसके पाँच भाइयोंने भी इसी प्रतिज्ञाको दोहराया। उनके साथ दस हजार रथियोंकी सेना भी थी। महाराज! ये लोग युद्धके लिये शपथ खाकर लौटे थे ॥ १७-१८ ॥

मालवास्तुण्डिकेराश्च रथानामयुतैस्त्रिभिः । सुशर्मा च नरव्याघ्रस्त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः ॥ १९ ॥ मावेल्लकैर्ललित्थैश्च सहितो मद्रकैरपि । रथानामयुतेनैव सोऽगमद् भ्रातृभिः सह ॥ २० ॥ महाराज! ऐसी प्रतिज्ञा करके प्रस्थलाधिपति पुरुषसिंह त्रिगर्तराज सुशर्मा तीस हजार रथियोंसहित मालव, तुण्डिकेर, मावेल्लक, ललित्थ, मद्रकगण तथा दस हजार रथियोंसे युक्त अपने भाइयोंके साथ युद्धके लिये (शपथ ग्रहण करनेको) गया ॥ १९-२० ॥

नानाजनपदेभ्यश्च रथानामयुतं पुनः । समुत्थितं विशिष्टानां शपथार्थमुपागमत् ॥ २१ ॥ विभिन्न देशोंसे आये हुए दस हजार श्रेष्ठ महारथी भी वहाँ शपथ लेनेके लिये उठकर गये ॥ २१ ॥