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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

स नो दिष्ट्यास्त्रसम्पन्नश्चक्षुर्विषयमागतः । कर्तारः स्म वयं कर्म यच्चिकीर्षाम हृद्गतम् ॥ १४ ॥ 'अब हमारे सौभाग्यसे अर्जुन स्वयं ही अस्त्र-शस्त्र धारण करके आँखोंके सामने आ गये हैं। इस दशामें हम मन-ही-मन जो कुछ करना चाहते थे, वह प्रतिशोधात्मक कार्य अवश्य करेंगे ॥ १४ ॥

भवतश्च प्रियं यत् स्यादास्माकं च यशस्करम् । वयमेनं हनिष्यामो निकृष्यायोधनाद् बहिः ॥ १५ ॥ 'उससे आपका तो प्रिय होगा ही, हमलोगोंके सुयशकी भी वृद्धि होगी। हम इन्हें युद्धस्थलसे बाहर खींच ले जायँगे और मार डालेंगे ॥ १५ ॥

अद्यास्त्वनर्जुना भूमिरत्रिगार्था वा पुनः । सत्यं ते प्रतिजानीमो नैतन्मिथ्या भविष्यति ॥ १६ ॥ 'आज हम आपके सामने यह सत्य प्रतिज्ञापूर्वक कहते हैं कि यह भूमि या तो अर्जुनसे सूनी हो जायगी या त्रिगर्तोंमेंसे कोई इस भूतलपर नहीं रह जायगा। मेरा यह कथन कभी मिथ्या नहीं होगा' ॥ १६ ॥

एवं सत्यरथश्चोक्त्वा सत्यवर्मा च भारत । सत्यव्रतश्च सत्येषुः सत्यकर्मा तथैव च ॥ १७ ॥ सहिता भ्रातरः पञ्च रथानामयुतेन च । न्यवर्तन्त महाराज कृत्वा शपथमाहवे ॥ १८ ॥ भरतनन्दन! सुशर्माके ऐसा कहनेपर सत्यरथ, सत्यवर्मा, सत्यव्रत, सत्येषु तथा सत्यकर्मा नामवाले उसके पाँच भाइयोंने भी इसी प्रतिज्ञाको दोहराया। उनके साथ दस हजार रथियोंकी सेना भी थी। महाराज! ये लोग युद्धके लिये शपथ खाकर लौटे थे ॥ १७-१८ ॥

मालवास्तुण्डिकेराश्च रथानामयुतैस्त्रिभिः । सुशर्मा च नरव्याघ्रस्त्रिगर्तः प्रस्थलाधिपः ॥ १९ ॥ मावेल्लकैर्ललित्थैश्च सहितो मद्रकैरपि । रथानामयुतेनैव सोऽगमद् भ्रातृभिः सह ॥ २० ॥ महाराज! ऐसी प्रतिज्ञा करके प्रस्थलाधिपति पुरुषसिंह त्रिगर्तराज सुशर्मा तीस हजार रथियोंसहित मालव, तुण्डिकेर, मावेल्लक, ललित्थ, मद्रकगण तथा दस हजार रथियोंसे युक्त अपने भाइयोंके साथ युद्धके लिये (शपथ ग्रहण करनेको) गया ॥ १९-२० ॥

नानाजनपदेभ्यश्च रथानामयुतं पुनः । समुत्थितं विशिष्टानां शपथार्थमुपागमत् ॥ २१ ॥ विभिन्न देशोंसे आये हुए दस हजार श्रेष्ठ महारथी भी वहाँ शपथ लेनेके लिये उठकर गये ॥ २१ ॥

ततो ज्वलनमानर्च्य हुत्वा सर्वे पृथक् पृथक् ।
जगृहुः कुशचीराणि चित्राणि कवचानि च ॥ २२ ॥
उन सबने पृथक्-पृथक् अग्निदेवकी पूजा करके हवन किया तथा कुशके चीर और विचित्र कवच धारण कर लिये ॥ २२ ॥

ते च बद्धतनुत्राणा घृताक्ताः कुशचीरिणः ।
मौर्वीमेखलिनो वीराः सहस्रशतदक्षिणाः ॥ २३ ॥
कवच बाँधकर कुश-चीर धारण कर लेनेके पश्चात् उन्होंने अपने अंगोंमें घी लगाया और 'मौर्वी' नामक तृणविशेषकी बनी हुई मेखला धारण की। वे सभी वीर पहले यज्ञ करके लाखों स्वर्ण-मुद्राएँ दक्षिणामें बाँट चुके थे ॥ २३ ॥

यज्वानः पुत्रिणो लोक्याः कृतकृत्यास्तनुत्यजः ।
योक्ष्यमाणास्तदाऽऽत्मानं यशसा विजयेन च ॥ २४ ॥
उन सबने पूर्वकालमें यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, वे सभी पुत्रवान् तथा पुण्यलोकोंमें जानेके अधिकारी थे, उन्होंने अपने कर्तव्यको पूरा कर लिया था। वे हर्षपूर्वक युद्धमें अपने शरीरका त्याग करनेको उद्यत थे और अपने-आपको यश एवं विजयसे संयुक्त करने जा रहे थे ॥ २४ ॥

ब्रह्मचर्यश्रुतिमुखैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ।
प्राप्याँल्लोकान् सुयुद्धेन क्षिप्रमेव यियासवः ॥ २५ ॥
ब्रह्मचर्यपालन, वेदोंके स्वाध्याय तथा पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंके अनुष्ठान आदि साधनोंसे जिन पुण्यलोकोंकी प्राप्ति होती है, उन सबमें वे उत्तम युद्धके द्वारा ही शीघ्र पहुँचनेकी इच्छा रखते थे ॥ २५ ॥

ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा च निष्कान् दत्त्वा पृथक् पृथक् ।
गाश्च वासांसि च पुनः समाभाष्य परस्परम् ॥ २६ ॥
(द्विजमुख्यैः समुदितैः कृतस्वस्त्ययनाशिषः ।
मुदिताश्च प्रहृष्टाश्च जलं संस्पृश्य निर्मलम् ॥)
प्रज्वाल्य कृष्णवर्त्मानमुपागम्य रणव्रतम् ।
तस्मिन्नग्नौ तदा चक्रुः प्रतिज्ञां दृढनिश्चयाः ॥ २७ ॥
ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करके उन्हें अलग-अलग स्वर्णमुद्राओं, गौओं तथा वस्त्रोंकी दक्षिणा देकर परस्पर बातचीत करके उन्होंने वहाँ एकत्र हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराया, आशीर्वाद प्राप्त किया और हर्षोल्लासपूर्वक निर्मल जलका स्पर्श करके अग्निको प्रज्वलित किया। फिर समीप आकर युद्धका व्रत ले अग्निके सामने ही दृढ़ निश्चयपूर्वक प्रतिज्ञा की ॥

शृण्वतां सर्वभूतानामुच्चैर्वाचो बभाषिरे ।
सर्वे धनंजयवधे प्रतिज्ञां चापि चक्रिरे ॥ २८ ॥

उन सभीने समस्त प्राणियोंके सुनते हुए अर्जुनका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की और उच्चस्वरसे यह बात कही— ॥ २८ ॥

ये वै लोकाश्चाव्रतिनां ये चैव ब्रह्मघातिनाम् । मद्यपस्य च ये लोका गुरुदाररतस्य च ॥ २९ ॥ ब्रह्मस्वहारिणश्चैव राजपिण्डापहारिणः । शरणागतं च त्यजतो याचमानं तथा घ्नतः ॥ ३० ॥ अगारदाहिनां चैव ये च गां निघ्नतामपि । अपकारिणां च ये लोका ये च ब्रह्मद्विषामपि ॥ ३१ ॥ स्वभार्यामृतुकालेषु मोहाद् वै नाभिगच्छताम् । श्राद्धमैथुनिकानां च ये चाप्यात्मापहारिणाम् ॥ ३२ ॥ न्यासापहारिणां ये च श्रुतं नाशयतां च ये । क्लीबेन युध्यमानानां ये च नीचानुसारिणाम् ॥ ३३ ॥ नास्तिकानां च ये लोका येऽग्निमातृपितृत्यजाम् । (सस्यमाक्रमतां ये च प्रत्यादित्यं प्रमेहताम् ।) तानाप्नुयामहे लोकान् ये च पापकृतामपि ॥ ३४ ॥ यद्यहत्वा वयं युद्धे निवर्तेम धनंजयम् । तेन चाभ्यर्दितास्त्रासाद् भवेम हि पराङ्मुखाः ॥ ३५ ॥

'यदि हमलोग अर्जुनको युद्धमें मारे बिना लौट आवें अथवा उनके बाणोंसे पीड़ित हो भयके कारण युद्धसे पराङ्मुख हो जायँ तो हमें वे ही पापमय लोक प्राप्त हों, जो व्रतका पालन न करनेवाले, ब्रह्महत्यारे, मद्य पीनेवाले, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले, राजाकी दी हुई जीविकाको छीन लेनेवाले, शरणागतको त्याग देनेवाले, याचकको मारनेवाले, घरमें आग लगानेवाले, गोवध करनेवाले, दूसरोंकी बुराईमें लगे रहनेवाले, ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले, ऋतुकालमें भी मोहवश अपनी पत्नीके साथ समागम न करनेवाले, श्राद्धके दिन मैथुन करनेवाले, अपनी जाति छिपानेवाले, धरोहरको हड़प लेनेवाले, अपनी प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, नपुंसकके साथ युद्ध करनेवाले, नीच पुरुषोंका संग करनेवाले, ईश्वर और परलोकपर विश्वास न करनेवाले, अग्नि, माता और पिताकी सेवाका परित्याग करनेवाले, खेतीको पैरोंसे कुचलकर नष्ट कर देनेवाले, सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्रत्याग करनेवाले तथा पापपरायण पुरुषोंको प्राप्त होते हैं' ॥ २९—३५ ॥

यदि त्वसुकरं लोके कर्म कुर्याम संयुगे । इष्टाँल्लोकान् प्राप्नुयामो वयमद्य न संशयः ॥ ३६ ॥

'यदि आज हम युद्धमें अर्जुनको मारकर लोकमें असम्भव माने जानेवाले कर्मको भी कर लेंगे तो मनोवांछित पुण्यलोकोंको प्राप्त करेंगे, इसमें संशय नहीं है' ॥ ३६ ॥

एवमुक्त्वा तदा राजंस्तेऽभ्यवर्तन्त संयुगे ।

आह्वयन्तोऽर्जुनं वीराः पितृजुष्टां दिशं प्रति ।। ३७ ।।
राजन्! ऐसा कहकर वे वीर संशप्तकगण उस समय अर्जुनको ललकारते हुए युद्धस्थलमें दक्षिण दिशाकी ओर जाकर खड़े हो गये ।। ३७ ।।
आहूतस्तैर्नरव्याघ्रैः पार्थः परपुरंजयः ।
धर्मराजमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ।। ३८ ।।
उन पुरुषसिंह संशप्तकोंद्वारा ललकारे जानेपर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले कुन्तीकुमार अर्जुन तुरंत ही धर्मराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ।। ३८ ।।
आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् ।
संशप्तकाश्च मां राजन्नाह्वयन्ति महामृधे ।। ३९ ।।
राजन्! मेरा यह निश्चित व्रत है कि यदि कोई मुझे युद्धके लिये बुलाये तो मैं पीछे नहीं हटूंगा। ये संशप्तक मुझे महायुद्धमें बुला रहे हैं ।। ३९ ।।
एष च भ्रातृभिः सार्धं सुशर्माऽऽह्वयते रणे ।
वधाय सगणस्यास्य मामनुज्ञातुमर्हसि ।। ४० ।।
‘यह सुशर्मा अपने भाइयोंके साथ आकर मुझे युद्धके लिये ललकार रहा है, अतः गणोंसहित इस सुशर्माका वध करनेके लिये मुझे आज्ञा देनेकी कृपा करें ।। ४० ।।
नैतच्छक्नोमि संसोढुमाह्वानं पुरुषर्षभ ।
सत्यं ते प्रतिजानामि हतान् विद्धि परान् युधि ।। ४१ ।।
‘पुरुषप्रवर! मैं शत्रुओंकी यह ललकार नहीं सह सकता। आपसे सच्ची प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि इन शत्रुओंको युद्धमें मारा गया ही समझिये' ।। ४१ ।।

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं ते तत्त्वतस्तात यद् द्रोणस्य चिकीर्षितम् ।
यथा तदनृतं तस्य भवेत् तत् त्वं समाचर ।। ४२ ।।
युधिष्ठिर बोले—तात! द्रोणाचार्य क्या करना चाहते हैं, यह तो तुमने अच्छी तरह सुन ही लिया होगा। उनका वह संकल्प जैसे भी झूठा हो जाय, वही तुम करो ।। ४२ ।।
द्रोणो हि बलवाञ्छूरः कृतास्त्रश्च जितश्रमः ।
प्रतिज्ञातं च तेनैतद् ग्रहणं मे महारथ ।। ४३ ।।
महारथी वीर! आचार्य द्रोण बलवान्, शौर्यसम्पन्न और अस्त्रविद्यामें निपुण हैं, उन्होंने परिश्रमको जीत लिया है तथा वे मुझे पकड़कर दुर्योधनके पास ले जानेकी प्रतिज्ञा कर चुके हैं ।। ४३ ।।

अर्जुन उवाच

अयं वै सत्यजिद् राजन्नद्य त्वां रक्षिता युधि ।
ध्रियमाणे च पाञ्चाल्ये नाचार्यः काममाप्स्यति ।। ४४ ।।

अर्जुन बोले—राजन्! ये पांचालराजकुमार सत्यजित् आज युद्धस्थलमें आपकी रक्षा करेंगे। इनके जीते-जी आचार्य अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकेंगे ॥ ४४ ॥
हते तु पुरुषव्याघ्रे रणे सत्यजिति प्रभो ।
सर्वैरपि समेतैर्वा न स्थातव्यं कथंचन ॥ ४५ ॥
प्रभो! यदि पुरुषसिंह सत्यजित् रणभूमिमें वीरगतिको प्राप्त हो जायँ तो आप सब लोगोंके साथ होनेपर भी किसी तरह युद्धभूमिमें न ठहरियेगा ॥ ४५ ॥

संजय उवाच

अनुज्ञातस्ततो राज्ञा परिष्वक्तश्च फाल्गुनः ।
प्रेम्णा दृष्टश्च बहुधा ह्याशिषश्चास्य योजिताः ॥ ४६ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तब राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको जानेकी आज्ञा दे दी और उनको हृदयसे लगा लिया। प्रेमपूर्वक उन्हें बार-बार देखा और आशीर्वाद दिया ॥ ४६ ॥
विहायैनं ततः पार्थस्त्रिगर्तान् प्रत्ययाद् बली ।
क्षुधितः क्षुद्धिघातार्थं सिंहो मृगगणानिव ॥ ४७ ॥
तदनन्तर बलवान् कुन्तीकुमार अर्जुन राजा युधिष्ठिरको वहीं छोड़कर त्रिगर्तोंकी ओर बढ़े, मानो भूखा सिंह अपनी भूख मिटानेके लिये मृगोंके झुंडकी ओर जा रहा हो ॥ ४७ ॥
ततो दौर्योधनं सैन्यं मुदा परमया युतम् ।
ऋतेऽर्जुनं भृशं क्रुद्धं धर्मराजस्य निग्रहे ॥ ४८ ॥
तब दुर्योधनकी सेना बड़ी प्रसन्नताके साथ अर्जुनके बिना राजा युधिष्ठिरको कैद करनेके लिये अत्यन्त क्रोधपूर्वक प्रयत्न करने लगी ॥ ४८ ॥
ततोऽन्योन्येन ते सैन्ये समाजग्मतुरोजसा ।
गङ्गासरय्वौ वेगेन प्रावृषीवोल्बणोदके ॥ ४९ ॥
तत्पश्चात् दोनों सेनाएँ बड़े वेगसे परस्पर भिड़ गयीं, मानो वर्षा-ऋतुमें जलसे लबालब भरी हुई गंगा और सरयू वेगपूर्वक आपसमें मिल रही हों ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि धनंजययाने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें अर्जुनकी रणयात्राविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५० १/३ श्लोक हैं।)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टादशोऽध्यायः

संशप्तक-सेनाओंके साथ अर्जुनका युद्ध और सुधन्वाका वध

संजय उवाच

ततः संशप्तका राजन् समे देशे व्यवस्थिताः ।
व्यूह्यानीकं रथैरेव चन्द्राकारं मुदा युताः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर संशप्तक योद्धा रथोंद्वारा ही सेनाका चन्द्राकार व्यूह बनाकर समतल प्रदेशमें प्रसन्नतापूर्वक खड़े हो गये ॥ १ ॥

ते किरीटिनमायान्तं दृष्ट्वा हर्षेण मारिष ।
उदक्रोशन् नरव्याघ्राः शब्देन महता तदा ॥ २ ॥
आर्य! किरीटधारी अर्जुनको आते देख पुरुषसिंह संशप्तक हर्षपूर्वक बड़े जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥

स शब्दः प्रदिशः सर्वा दिशः खं च समावृणोत् ।
आवृत्तत्वाच्च लोकस्य नासीत् तत्र प्रतिस्वनः ॥ ३ ॥
उस सिंहनादने सम्पूर्ण दिशाओं, विदिशाओं तथा आकाशको व्याप्त कर लिया। इस प्रकार सम्पूर्ण लोक व्याप्त हो जानेसे वहाँ दूसरी कोई प्रतिध्वनि नहीं होती थी ॥

सोऽतीव सम्प्रहृष्टांस्तानुपलभ्य धनंजयः ।
किंचिदभ्युत्स्मयन् कृष्णमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥
अर्जुनने उन सबको अत्यन्त हर्षमें भरा हुआ देख किंचित् मुसकराते हुए भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥

पश्यैतान् देवकीमातर्मुर्मूर्षूनद्य संयुगे ।
भ्रातॄंस्त्रैगर्ताकानेवं रोदितव्ये प्रहर्षितान् ॥ ५ ॥
‘देवकीनन्दन! देखिये तो सही, ये त्रिगर्तदेशीय सुशर्मा आदि सब भाई मृत्युके निकट पहुँचे हुए हैं। आज युद्धस्थलमें जहाँ इन्हें रोना चाहिये, वहाँ ये हर्षसे उछल रहे हैं ॥ ५ ॥

अथवा हर्षकालोऽयं त्रैगर्तानामसंशयम् ।
कुनरैर्दुर्वापान् हि लोकान् प्राप्स्यन्त्यनुत्तमान् ॥ ६ ॥
‘अथवा इसमें संदेह नहीं कि यह इन त्रिगर्तोंके लिये हर्षका ही अवसर है; क्योंकि ये उन परम उत्तम लोकोंमें जायँगे, जो दुष्ट मनुष्योंके लिये दुर्लभ हैं’ ॥ ६ ॥

एवमुक्त्वा महाबाहुर्हृषीकेशं ततोऽर्जुनः ।
आससाद रणे व्यूढां त्रिगर्तानामनीकिनीम् ॥ ७ ॥

भगवान् हृषीकेशसे ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने युद्धमें त्रिगतोंकी व्यूहाकार खड़ी हुई सेनापर आक्रमण किया ।। ७ ।।
स देवदत्तमादाय शङ्खं हेमपरिष्कृतम् ।
दध्मौ वेगेन महता घोषेणापूरयन् दिशः ।। ८ ।।
उन्होंने सुवर्णजटित देवदत्त नामक शंख लेकर उसकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको परिपूर्ण करते हुए उसे बड़े वेगसे बजाया ।। ८ ।।
तेन शब्देन वित्रस्ता संशप्तकवरूथिनी ।
विचेष्टावस्थिता संख्ये ह्यश्मसारमयी यथा ।। ९ ।।
उस शंखनादसे भयभीत हो वह संशप्तक-सेना युद्धभूमिमें लोहेकी प्रतिमाके समान निश्चेष्ट खड़ी हो गयी ।। ९ ।।
(सा सेना भरतश्रेष्ठ निश्चेष्टा शुशुभे तदा ।
चित्र पटे यथा न्यस्ता कुशलैः शिल्पिभिनरैः ।।
भरतश्रेष्ठ! वह निश्चेष्ट हुई सेना ऐसी सुशोभित हुई, मानो कुशल कलाकारोंद्वारा चित्रपटमें अंकित की गयी हो।
स्वनेन तेन सैन्यानां दिवमावृण्वता तदा ।
सस्वना पृथिवी सर्वा तथैव च महोदधिः ।।
स्वनेन सर्वसैन्यानां कर्णांस्तु बधिरीकृताः ।)
सम्पूर्ण आकाशमें फैले हुए उस शंखनादने समूची पृथ्वी और महासागरको भी प्रतिध्वनित कर दिया। उस ध्वनिसे सम्पूर्ण सैनिकोंके कान बहरे हो गये।
वाहास्तेषां विवृत्ताक्षाः स्तब्धकर्णशिरोधराः ।
विष्टब्धचरणा मूत्रं रुधिरं च प्रसुस्रुवुः ।। १० ।।
उनके घोड़े आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे। उनके कान और गर्दन स्तब्ध हो गये, चारों पैर अकड़ गये और वे मूत्रके साथ-साथ रुधिरका भी त्याग करने लगे ।। १० ।।
उपलभ्य ततः संज्ञांमवस्थाप्य च वाहिनीम् ।
युगपत् पाण्डुपुत्राय चिक्षिपुः कङ्कपत्रिणः ।। ११ ।।
थोड़ी देरमें चेत होनेपर संशप्तकोंने अपनी सेनाको स्थिर किया और एक साथ ही पाण्डुपुत्र अर्जुनपर कंकपक्षीकी पाँखवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। ११ ।।
तान्यर्जुनः सहस्राणि दशपञ्चभिराशुगैः ।
अनागतान्येव शरैंश्चिच्छेदाशु पराक्रमी ।। १२ ।।
परंतु पराक्रमी अर्जुनने पंद्रह शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उनके सहस्रों बाणोंको अपने पास आनेसे पहले ही शीघ्रतापूर्वक काट डाला ।। १२ ।।
ततोऽर्जुनं शितैर्बाणैर्दशभिर्दशभिः पुनः ।
प्राविध्यन्त ततः पार्थस्तानविध्यत् त्रिभिस्त्रिभिः ।। १३ ।।

तदनन्तर संशप्तकोंने दस-दस तीखे बाणोंसे पुनः अर्जुनको बींध डाला, यह देख उन कुन्तीकुमारने भी तीन-तीन बाणोंसे संशप्तकोंको घायल कर दिया ।। १३ ।। एकैकस्तु ततः पार्थ राजन् विव्याध पञ्चभिः । स च तान् प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमी ।। १४ ।। राजन्! फिर उनमेंसे एक-एक योद्धाने अर्जुनको पाँच-पाँच बाणोंसे बींध डाला और पराक्रमी अर्जुनने भी दो-दो बाणोंद्वारा उन सबको घायल करके तुरंत बदला चुकाया ।। १४ ।। भूय एव तु संक्रुद्धास्त्वर्जुनं सहकेशवम् । आपूरयन् शरैस्तीक्ष्णैस्तडागमिव वृष्टिभिः ।। १५ ।। तत्पश्चात् अत्यन्त कुपित हो संशप्तकोंने पुनः श्रीकृष्णसहित अर्जुनको पैने बाणोंद्वारा उसी प्रकार परिपूर्ण करना आरम्भ किया, जैसे मेघ वर्षाद्वारा सरोवरको पूर्ण करते हैं ।। १५ ।। ततः शरसहस्राणि प्रापतन्नर्जुनं प्रति । भ्रमराणामिव व्राताः फुल्लं द्रुमगणं वने ।। १६ ।। तत्पश्चात् अर्जुनपर एक ही साथ हजारों बाण गिरे, मानो वनमें फूले हुए वृक्षपर भौरोंके समूह आ गिरे हों ।। १६ ।। ततः सुबाहुस्त्रिंशद्भिरद्रिसारमयैः शरैः । अविध्यदिषुभिर्गाढं किरीटे सव्यसाचिनम् ।। १७ ।। तदनन्तर सुबाहुने लोहेके बने हुए तीस बाणोंद्वारा अर्जुनके किरीटमें गहरा आघात किया ।। १७ ।। तैः किरीटी किरीटस्थैर्हेमपुङ्खैरजिह्मगैः । शातकुम्भमयापीडो बभौ सूर्य इवोत्थितः ।। १८ ।। सोनेके पंखोंसे युक्त सीधे जानेवाले वे बाण उनके किरीटमें चारों ओरसे धँस गये। उन बाणोंद्वारा किरीटधारी अर्जुनकी वैसी ही शोभा हुई जैसे स्वर्णमय मुकुटसे मण्डित भगवान् सूर्य उदित एवं प्रकाशित हो रहे हों ।। १८ ।। हस्तावापं सुबाहोस्तु भल्लेन युधि पाण्डवः । चिच्छेद तं चैव पुनः शरवर्षैरवाकिरत् ।। १९ ।। तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने भल्लका प्रहार करके युद्धमें सुबाहुके दस्तानेको काट दिया और उसके ऊपर पुनः बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।। १९ ।। ततः सुशर्मा दशभिः सुरथस्तु किरीटिनम् । सुधर्मा सुधनुश्चैव सुबाहुश्च समार्पयत् ।। २० ।। यह देख सुशर्मा, सुरथ, सुधर्मा, सुधन्वा और सुबाहुने दस-दस बाणोंसे किरीटधारी अर्जुनको घायल कर दिया ।। २० ।।

तांस्तु सर्वान् पृथग्बाणैर्वानरप्रवरध्वजः । प्रत्यविध्यद् ध्वजांश्चैषां भल्लैश्चिच्छेद सायकान् ॥ २१ ॥ फिर कपिध्वज अर्जुनने भी पृथक्-पृथक् बाण मारकर उन सबको घायल कर दिया। भल्लोंद्वारा उनकी ध्वजाओं तथा सायकोंको भी काट गिराया ॥ २१ ॥

सुधन्वनो धनुश्छित्त्वा हयांश्चास्यावधीच्छरैः । अथास्य सशिरस्त्राणं शिरः कायादपातयत् ॥ २२ ॥ सुधन्वाका धनुष काटकर उसके घोड़ोंको भी बाणोंसे मार डाला। फिर शिरस्त्राणसहित उसके मस्तकको भी काटकर धड़से नीचे गिरा दिया ॥ २२ ॥

तस्मिन्निपतिते वीरे त्रस्तास्तस्य पदानुगाः । व्यद्रवन्त भयाद् भीता यत्र दौर्योधनं बलम् ॥ २३ ॥ वीरवर सुधन्वाके धराशायी हो जानेपर उसके अनुगामी सैनिक भयभीत हो गये, वे भयके मारे वहीं भाग गये, जहाँ दुर्योधनकी सेना थी ॥ २३ ॥

ततो जघान संक्रुद्धो वासविस्तां महाचमूम् । शरजालैरविच्छिन्नैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ॥ २४ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए इन्द्रकुमार अर्जुनने बाणसमूहोंकी अविच्छिन्न वर्षा करके उस विशाल वाहिनीका उसी प्रकार संहार आरम्भ किया, जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंद्वारा महान् अन्धकारका नाश करते हैं ॥ २४ ॥

ततो भग्ने बले तस्मिन् विप्रलीने समन्ततः । सव्यसाचिनि संक्रुद्धे त्रैगर्तन् भयमाविशत् ॥ २५ ॥

तदनन्तर जब संशप्तकोंकी सारी सेना भागकर चारों ओर छिप गयी और सव्यसाची अर्जुन अत्यन्त क्रोधमें भर गये, तब उन त्रिगर्तदेशीय योद्धाओंके मनमें भारी भय समा गया ॥ २५ ॥

ते वध्यमानाः पार्थेन शरैः संनतपर्वभिः ।
अमुह्यंस्तत्र तत्रैव त्रस्ता मृगगणा इव ॥ २६ ॥
अर्जुनके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंकी मार खाकर वे सभी सैनिक वहाँ भयभीत मृगोंकी भाँति मोहित हो गये ॥

ततस्त्रिगर्तराट् क्रुद्धस्तानुवाच महारथान् ।
अलं द्रुतेन वः शूरा न भयं कर्तुमर्हथ ॥ २७ ॥
तब क्रोधमें भरे हुए त्रिगर्तराजने अपने उन महारथियोंसे कहा—'शूरवीरो! भागनेसे कोई लाभ नहीं है। तुम भय न करो ॥ २७ ॥

शप्त्वाथ शपथान् घोरान् सर्वसैन्यस्य पश्यतः ।
गत्वा दौर्योधनं सैन्यं किं वै वक्ष्यथ मुख्यशः ॥ २८ ॥
'सारी सेनाके सामने भयंकर शपथ खाकर अब यदि दुर्योधनकी सेनामें जाओगे तो तुम सभी श्रेष्ठ महारथी क्या जवाब दोगे? ॥ २८ ॥

नावहास्याः कथं लोके
कर्मणानेन संयुगे ।
भवेम सहिताः सर्वे
निवर्तध्वं यथाबलम् ॥ २९ ॥
'हमें युद्धमें ऐसा कर्म करके किसी प्रकार संसारमें उपहासका पात्र नहीं बनना चाहिये। अतः तुम सब लोग लौट आओ। हमें यथाशक्ति एक साथ संगठित होकर युद्धभूमिमें डटे रहना चाहिये' ॥ २९ ॥

एवमुक्तास्तु ते राजन्नुदक्रोशन् मुहुर्मुहुः ।
शङ्खांश्च दध्मिरे वीरा हर्षयन्तः परस्परम् ॥ ३० ॥
राजन्! त्रिगर्तराजके ऐसा कहनेपर वे सभी वीर बारंबार गर्जना करने और एक-दूसरेमें हर्ष एवं उत्साह भरते हुए शंख बजाने लगे ॥ ३० ॥

ततस्ते संन्यवर्तन्त संशप्तकगणाः पुनः ।
नारायणाश्च गोपाला मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥ ३१ ॥
तब वे समस्त संशप्तकगण और नारायणी सेनाके ग्वाले मृत्युको ही युद्धसे निवृत्तिका अवसर मानकर पुनः लौट आये ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि सुधन्ववधे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें सुधन्वाका वधविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं।)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनविंशोऽध्यायः

संशप्तकगणोंके साथ अर्जुनका घोर युद्ध

संजय उवाच

दृष्ट्वा तु संनिवृत्तांस्तान् संशप्तकगणान् पुनः ।
वासुदेवं महात्मानमर्जुनः समभाषत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! उन संशप्तकगणोंको पुनः लौटा हुआ देख अर्जुनने महात्मा श्रीकृष्णसे कहा— ॥ १ ॥

चोदयाश्वान् हृषीकेश संशप्तकगणान् प्रति ।
नैते हास्यन्ति संग्रामं जीवन्त इति मे मतिः ॥ २ ॥
‘हृषीकेश! घोड़ोंको इन संशप्तकगणोंकी ओर ही बढ़ाइये। मुझे ऐसा जान पड़ता है, ये जीते-जी रणभूमिका परित्याग नहीं करेंगे ॥ २ ॥

पश्य मेऽस्त्रबलं घोरं बाह्वोरिष्वसनस्य च ।
अद्यैतान् पातयिष्यामि क्रुद्धो रुद्रः पशूनिव ॥ ३ ॥
‘आज आप मेरे अस्त्र, भुजाओं और धनुषका बल देखिये। क्रोधमें भरे हुए रुद्रदेव जैसे पशुओं (जगत्के जीवों) का संहार करते हैं, उसी प्रकार मैं भी इन्हें मार गिराऊँगा' ॥

ततः कृष्णः स्मितं कृत्वा प्रतिनन्द्य शिवेन तम् ।
प्रावेशयत दुर्धर्षो यत्र यत्रैच्छदर्जुनः ॥ ४ ॥
तब श्रीकृष्णने मुसकराकर अर्जुनकी मंगलकामना करते हुए उनका अभिनन्दन किया और दुर्धर्ष वीर अर्जुनने जहाँ-जहाँ जानेकी इच्छा की, वहीं-वहीं उस रथको पहुँचाया ॥

स रथो भ्राजतेऽत्यर्थमुह्यमानो रणे तदा ।
उह्यमानमिवाकाशे विमानं पाण्डुरैर्हयैः ॥ ५ ॥
रणभूमिमें श्वेत घोड़ोंद्वारा खींचा जाता हुआ वह रथ उस समय आकाशमें उड़नेवाले विमानके समान अत्यन्त शोभा पा रहा था ॥ ५ ॥

मण्डलानि ततश्चक्रे गतप्रत्यागतानि च ।
यथा शक्ररथो राजन् युद्धे देवासुरे पुरा ॥ ६ ॥
राजन्! पूर्वकालमें देवताओं और असुरोंके संग्राममें इन्द्रका रथ जिस प्रकार चलता था, उसी प्रकार अर्जुनका रथ भी कभी आगे बढ़कर और कभी पीछे हटकर मण्डलाकार गतिसे घूमने लगा ॥ ६ ॥

अथ नारायणाः क्रुद्धा विविधायुधपाणयः ।
छादयन्तः शरव्रातैः परिवव्रुर्धनंजयम् ॥ ७ ॥

तब क्रोधमें भरे हुए नारायणीसेनाके गोपोंने हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर अर्जुनको अपने बाण-समूहोंसे आच्छादित करते हुए उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ।। अदृश्यं च मुहूर्तेन चक्रुस्ते भरतर्षभ ।
कृष्णेन सहितं युद्धे कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ।। ८ ।।
भरतश्रेष्ठ! उन्होंने दो ही घड़ीमें श्रीकृष्णसहित कुन्तीकुमार अर्जुनको युद्धमें अदृश्य कर दिया ।। ८ ।।
क्रुद्धस्तु फाल्गुनः संख्ये द्विगुणीकृतविक्रमः ।
गाण्डीवं धनुरामृज्य तूर्णं जग्राह संयुगे ।। ९ ।।
तब अर्जुनने कुपित होकर युद्धमें अपना द्विगुण पराक्रम प्रकट करते हुए गाण्डीव धनुषको सब ओरसे पोंछकर उसे तुरंत हाथमें लिया ।। ९ ।।
बद्ध्वा च भ्रुकुटिं वक्रे क्रोधस्य प्रतिलक्षणम् ।
देवदत्तं महाशङ्खं पूरयामास पाण्डवः ।। १० ।।
फिर पाण्डुकुमारने भौंहें टेढ़ी करके क्रोधको सूचित करनेवाले अपने महान् शंख देवदत्तको बजाया ।।
अथास्त्रमरिसंघघ्नं त्वाष्ट्रमभ्यस्यदर्जुनः ।
ततो रूपसहस्राणि प्रादुरासन् पृथक् पृथक् ।। ११ ।।
तदनन्तर अर्जुनने शत्रुसमूहोंका नाश करनेवाले त्वाष्ट्र नामक अस्त्रका प्रयोग किया। फिर तो उस अस्त्रसे सहस्रों रूप पृथक्-पृथक् प्रकट होने लगे ।। ११ ।।
आत्मनः प्रतिरूपैस्तैर्नानारूपैर्विमोहिताः ।
अन्योन्येनार्जुनं मत्वा स्वमात्मानं च जघ्निरे ।। १२ ।।
अपने ही समान आकृतिवाले उन नाना रूपोंसे मोहित हो वे एक-दूसरेको अर्जुन मानकर अपने तथा अपने ही सैनिकोंपर प्रहार करने लगे ।। १२ ।।
अयमर्जुनोऽयं गोविन्द इमौ पाण्डवयादवौ ।
इति ब्रुवाणाः सम्मूढा जघ्नुरन्योन्यमाहवे ।। १३ ।।
ये अर्जुन हैं, ये श्रीकृष्ण हैं, ये दोनों अर्जुन और श्रीकृष्ण हैं—इस प्रकार बोलते हुए वे मोहाच्छन्न हो युद्धमें एक-दूसरेपर आघात करने लगे ।। १३ ।।
मोहिताः परमास्त्रेण क्षयं जग्मुः परस्परम् ।
अशोभन्त रणे योधाः पुष्पिता इव किंशुकाः ।। १४ ।।
उस दिव्यास्त्रसे मोहित हो वे परस्परके आघातसे क्षीण होने लगे। उस रणक्षेत्रमें समस्त योद्धा फूले हुए पलाश वृक्षके समान शोभा पा रहे थे ।। १४ ।।
ततः शरसहस्राणि तैर्विमुक्तानि भस्मसात् ।
कृत्वा तदस्त्रं तान् वीराननयद् यमसादनम् ।। १५ ।।

तत्पश्चात् उस दिव्यास्त्रने संशप्तकोंके छोड़े हुए सहस्रों बाणोंको भस्म करके बहुसंख्यक वीरोंको यमलोक पहुँचा दिया॥ १५॥
अथ प्रहस्य बीभत्सुर्ललित्थान् मालवानपि ।
मावेल्लकांस्त्रिगर्तांश्च यौधेयांश्चार्दयच्छरैः ॥ १६ ॥
इसके बाद अर्जुनने हँसकर ललित्थ, मालव, मावेल्लक, त्रिगर्त तथा यौधेय सैनिकोंको बाणोंद्वारा गहरी पीड़ा पहुँचायी॥ १६॥
ते हन्यमाना वीरेण क्षत्रियाः कालचोदिताः ।
व्यसृजञ्छरजालानि पार्थे नानाविधानि च ॥ १७ ॥
वीर अर्जुनके द्वारा मारे जाते हुए क्षत्रियगण कालसे प्रेरित हो अर्जुनके ऊपर नाना प्रकारके बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे॥ १७॥
न ध्वजो नार्जुनस्तत्र न रथो न च केशवः ।
प्रत्यदृश्यत घोरेण शरवर्षेण संवृतः ॥ १८ ॥
उस भयंकर बाण-वर्षासे ढक जानेके कारण वहाँ न ध्वज दिखायी देता था, न रथ; न अर्जुन दृष्टिगोचर हो रहे थे, न भगवान् श्रीकृष्ण॥ १८॥
ततस्ते लब्धलक्षत्वादन्योन्यमभिचुक्रुशुः ।
हतौ कृष्णाविति प्रीत्या वासांस्यादुधुवुस्तदा ॥ १९ ॥
उस समय 'हमने अपने लक्ष्यको मार लिया' ऐसा समझकर वे एक-दूसरेकी ओर देखते हुए चोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन मारे गये—ऐसा सोचकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने कपड़े हिलाने लगे॥ १९॥
भेरीमृदङ्गशङ्खांश्च दध्मुर्वीराः सहस्रशः ।
सिंहनादरवांश्चोग्रांश्चक्रिरे तत्र मारिष ॥ २० ॥
आर्य! वे सहस्रों वीर वहाँ भेरी, मृदंग और शंख बजाने तथा भयानक सिंहनाद करने लगे॥ २०॥
ततः प्रसिष्विदे कृष्णः खिन्नश्चार्जुनमब्रवीत् ।
क्वासि पार्थ न पश्ये त्वां कच्चिज्जीवसि शत्रुहन् ॥ २१ ॥
उस समय श्रीकृष्ण पसीने-पसीने हो गये और खिन्न होकर अर्जुनसे बोले—'पार्थ! कहाँ हो। मैं तुम्हें देख नहीं पाता हूँ। शत्रुओंका नाश करनेवाले वीर! क्या तुम जीवित हो?'॥ २१॥
तस्य तद् भाषितं श्रुत्वा त्वरमाणो धनंजयः ।
वायव्यास्त्रेण तैरस्तां शरवृष्टिमपाहरत् ॥ २२ ॥
श्रीकृष्णका वह वचन सुनकर अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ वायव्यास्त्रका प्रयोग करके शत्रुओंद्वारा की हुई उस बाण-वर्षाको नष्ट कर दिया॥ २२॥
ततः संशप्तकव्रातान् साश्वद्विपरथायुधान् ।

उवाह भगवान् वायुः शुष्कपर्णचयानिव ॥ २३ ॥
तदनन्तर भगवान् वायुदेवने घोड़े, हाथी, रथ और आयुधोंसहित संशप्तकसमूहोंको वहाँसे सूखे पत्तोंके ढेरकी भाँति उड़ाना आरम्भ किया ॥ २३ ॥

उह्यमानास्तु ते राजन् बह्वशोभन्त वायुना ।
प्रडीनाः पक्षिणः काले वृक्षेभ्य इव मारिष ॥ २४ ॥
माननीय महाराज! वायुके द्वारा उड़ाये जाते हुए वे सैनिक समय-समयपर वृक्षोंसे उड़नेवाले पक्षियोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २४ ॥
तांस्तथा व्याकुलीकृत्य त्वरमाणो धनंजयः ।
जघान निशितैर्बाणैः सहस्राणि शतानि च ॥ २५ ॥
उन सबको व्याकुल करके अर्जुन अपने पैने बाणोंसे शीघ्रतापूर्वक उनके सौ-सौ और हजार-हजार योद्धाओंका एक साथ संहार करने लगे ॥ २५ ॥
शिरांसि भल्लैरहरद् बाहूनपि च सायुधान् ।
हस्तिहस्तोपमांश्चोरून् शरैरुर्व्यामपातयत् ॥ २६ ॥
उन्होंने भल्लोंद्वारा उनके सिर उड़ा दिये, आयुधोंसहित भुजाएँ काट डालीं और हाथीकी सूँड़के समान मोटी जाँघोंको भी बाणोंद्वारा पृथ्वीपर काट गिराया ॥ २६ ॥
पृष्ठच्छिन्नान् विचरणान् बाहुपार्श्वेक्षणाकुलान् ।
नानाङ्गावयवैर्हीनांश्चकारारीन् धनंजयः ॥ २७ ॥

धनञ्जयने शत्रुओंको शरीरके अनेक अंगोंसे विहीन कर दिया। किन्हींकी पीठ काट ली तो किन्हींके पैर उड़ा दिये। कितने ही सैनिक बाहु, पसली और नेत्रोंसे वंचित होकर व्याकुल हो रहे थे ॥ २७ ॥ गन्धर्वनगराकारान् विधिवत्कल्पितान् रथान् । शरैर्विशकलीकुर्वंश्चक्रे व्यश्वरथद्विपान् ॥ २८ ॥ उन्होंने गन्धर्वनगरोंके समान प्रतीत होनेवाले और विधिवत् सजे हुए रथोंके अपने बाणोंद्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिये और शत्रुओंको हाथी, घोड़े एवं रथोंसे वंचित कर दिये ॥ २८ ॥ मुण्डतालवनानीव तत्र तत्र चकाशिरे । छिन्ना रथध्वजव्राताः केचित्तत्र क्वचित् क्वचित् ॥ २९ ॥ वहाँ कहीं-कहीं रथवर्ती ध्वजोंके समूह ऊपरसे कट जानेके कारण मुण्डित तालवनोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २९ ॥ सोत्तरायुधिनो नागाः सपताकाङ्कुशध्वजाः । पेतुः शक्राशनिहता द्रुमवन्त इवाचलाः ॥ ३० ॥ पताका, अंकुश और ध्वजोंसे विभूषित गजराज वहाँ इन्द्रके वज्रसे मारे हुए वृक्षयुक्त पर्वतोंके समान ऊपर चढ़े हुए योद्धाओंसहित धराशायी हो गये ॥ ३० ॥ चामरापीडकवचाः सस्त्रान्त्रनयनास्तथा । सारोहास्तुरगाः पेतुः पार्थबाणहताः क्षितौ ॥ ३१ ॥ चामर, माला और कवचोंसे युक्त बहुत-से घोड़े अर्जुनके बाणोंसे मारे जाकर सवारोंसहित धरतीपर पड़े थे। उनकी आँतें और आँखें बाहर निकल आयी थीं ॥ ३१ ॥ विप्रविद्धासिनखराश्छिन्नवर्मर्ष्टिशक्तयः । पत्त्यश्छिन्नवर्माणः कृपणाः शेरते हताः ॥ ३२ ॥ पैदल सैनिकोंके खड्ग एवं नखर कटकर गिरे हुए थे। कवच, ऋष्टि और शक्तियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। कवच कट जानेसे अत्यन्त दीन हो वे मरकर पृथ्वीपर पड़े थे ॥ ३२ ॥ तैर्हतैर्हन्यमानैश्च पतद्भिः पतितैरपि । भ्रमद्भिर्निघ्नद्भिश्च क्रूरमायोधनं बभौ ॥ ३३ ॥ कितने ही वीर मारे गये थे और कितने ही मारे जा रहे थे। कुछ गिर गये थे और कुछ गिर रहे थे। कितने ही चक्कर काटते और आघात करते थे। इन सबके द्वारा वह युद्धस्थल अत्यन्त क्रूरतापूर्ण जान पड़ता था ॥ ३३ ॥ रजश्च सुमहज्जातं शान्तं रुधिरवृष्टिभिः । मही चाप्यभवद् दुर्गा कबन्धशतसंकुला ॥ ३४ ॥

रक्तकी वर्षासे वहाँकी उड़ती हुई भारी धूलराशि शान्त हो गयी और सैकड़ों कबन्धों (बिना सिरकी लाशों)-से आच्छादित होनेके कारण उस भूमिपर चलना कठिन हो गया ॥ ३४ ॥
तद् बभौ रौद्रबीभत्सं बीभत्सोर्यानमाहवे ।
आक्रीडमिव रुद्रस्य घ्नतः कालात्यये पशून् ॥ ३५ ॥
रणक्षेत्रमें अर्जुनका वह भयंकर एवं बीभत्स रथ प्रलयकालमें पशुओं (जगत्‌के जीवों) का संहार करनेवाले रुद्रदेवके क्रीड़ास्थल-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ३५ ॥
ते वध्यमानाः पार्थेन व्याकुलाश्च रथद्विपाः ।
तमेवाभिमुखाः क्षीणाः शक्रस्यातिथितां गताः ॥ ३६ ॥
अर्जुनके द्वारा मारे जाते हुए रथ और हाथी व्याकुल होकर उन्हींकी ओर मुँह करके प्राणत्याग करनेके कारण इन्द्रलोकके अतिथि हो गये ॥ ३६ ॥
सा भूमिर्भरतश्रेष्ठ निहतैस्तैर्महारथैः ।
आस्तीर्णा सम्बभौ सर्वा प्रेतीभूतैः समन्ततः ॥ ३७ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ मारे गये महारथियोंसे आच्छादित हुई वह सारी भूमि सब ओरसे प्रेतोंद्वारा घिरी हुई-सी जान पड़ती थी ॥ ३७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चैव प्रमत्ते सव्यसाचिनि ।
व्यूढानीकस्ततो द्रोणो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ३८ ॥
जब इधर सव्यसाची अर्जुन उस युद्धमें भली प्रकार लगे हुए थे, उसी समय अपनी सेनाका व्यूह बनाकर द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ ३८ ॥
तं प्रत्यगृह्णंस्त्वरिता व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
युधिष्ठिरं परीप्सन्तस्तदासीत् तुमुलं महत् ॥ ३९ ॥
व्यूह-रचनापूर्वक प्रहार करनेमें कुशल योद्धाओंने युधिष्ठिरको पकड़नेकी इच्छासे तुरंत ही उनपर चढ़ाई कर दी, वह युद्ध बड़ा भयानक हुआ ॥ ३९ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि अर्जुनसंशप्तकयुद्धे
एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें अर्जुन-संशप्तक-युद्धविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

विंशोऽध्यायः

द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार

संजय उवाच

परिणाम्य निशां तां तु भारद्वाजो महारथः ।
उक्त्वा सुबहु राजेन्द्र वचनं वै सुयोधनम् ॥ १ ॥
विधाय योगं पार्थेन संशप्तकगणैः सह ।
निष्क्रान्ते च तदा पार्थे संशप्तकवधं प्रति ॥ २ ॥
व्यूढानीकस्ततो द्रोणः पाण्डवानां महाचमूं ।
अभ्ययाद् भरतश्रेष्ठ धर्मराजजिघृक्षया ॥ ३ ॥

**संजय कहते हैं—**राजेन्द्र! महारथी द्रोणाचार्यने वह रात बिताकर दुर्योधनसे बहुत कुछ बातें कहीं और संशप्तकोंके साथ अर्जुनके युद्धका योग लगा दिया। भरतश्रेष्ठ! फिर संशप्तकोंका वध करनेके लिये अर्जुन जब दूर निकल गये, तब सेनाकी व्यूहरचना करके धर्मराज युधिष्ठिरको पकड़नेके लिये द्रोणाचार्यने पाण्डवोंकी विशाल सेनापर आक्रमण किया ॥ १–३ ॥

व्यूढं दृष्ट्वा सुपर्णं तु भारद्वाजकृतं तदा ।
व्यूहेन मण्डलार्धेन प्रत्यव्यूहद् युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥

द्रोणाचार्यके बनाये हुए गरुड़व्यूहको देखकर युधिष्ठिरने अपनी सेनाका मण्डलार्धव्‍यूह बनाया ॥ ४ ॥

मुखं त्वासीत् सुपर्णस्य भारद्वाजो महारथः ।
शिरो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः सानुगैर्वृतः ।
चक्षुषी कृतवर्माऽऽसीद् गौतमश्चास्यतां वरः ॥ ५ ॥

गरुड़व्यूहमें गरुड़के मुँहके स्थानपर महारथी द्रोणाचार्य खड़े थे। शिरोभागमें भाइयों तथा अनुगामी सैनिकोंसहित राजा दुर्योधन उपस्थित हुआ। बाण चलानेवालोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्य और कृतवर्मा उस व्यूहकी आँखके स्थानमें स्थित हुए ॥ ५ ॥

भूतशर्मा क्षेमशर्मा करकाशश्च वीर्यवान् ।
कलिङ्गाः सिंहलाः प्राच्याः शूराभीरा दशेरकाः ॥ ६ ॥
शका यवनकाम्बोजास्तथा हंसपथाश्च ये ।
ग्रीवायां शूरसेनाश्च दरदा मद्रकेकयाः ॥ ७ ॥

गजाश्वरथपत्त्योघास्तस्थुः परमंदंशिताः । भूतशर्मा, क्षेमशर्मा, पराक्रमी करकाश, कलिंग, सिंहल, पूर्वदिशाके सैनिक, शूर आभीरगण, दाशेरकगण, शक, यवन, काम्बोज, शूरसेन, दरद, मद्र, केकय तथा हंसपथ नामवाले देशोंके निवासी शूरवीर एवं हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल सैनिकोंके समूह उत्तम कवच धारण करके उस गरुड़के ग्रीवाभागमें खड़े थे ॥

भूरिश्रवास्तथा शल्यः सोमदत्तश्च बाह्लिकः ॥ ८ ॥ अक्षौहिण्या वृता वीरा दक्षिणं पार्श्वमास्थिताः । भूरिश्रवा, शल्य, सोमदत्त तथा बाह्लिक—ये वीरगण अक्षौहिणी सेनाके साथ व्यूहके दाहिने पार्श्वमें स्थित थे ॥ ८ १/२ ॥

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजश्च सुदक्षिणः ॥ ९ ॥ वामं पार्श्वं समाश्रित्य द्रोणपुत्राग्रतः स्थिताः । अवन्तीके विन्द और अनुविन्द तथा काम्बोजराज सुदक्षिण—ये बायें पार्श्वका आश्रय लेकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके आगे खड़े हुए ॥ ९ १/२ ॥

पृष्ठे कलिङ्गाः साम्बष्ठा मागधाः पौण्ड्रमद्रकाः ॥ १० ॥ गान्धाराः शकुनाः प्राच्याः पर्वतीया वसातयः । पृष्ठभागमें कलिंग, अम्बष्ठ, मगध, पौण्ड्र, मद्रक, गन्धार, शकुन, पूर्वदेश, पर्वतीय प्रदेश और वसाति आदि देशोंके वीर थे ॥ १० १/२ ॥

पुच्छे वैकर्तनः कर्णः सपुत्रज्ञातिबान्धवः ॥ ११ ॥ महत्या सेनया तस्थौ नानाजनपदोत्थया । पुच्छभागमें अपने पुत्र, जाति-भाई तथा कुटुम्बके बन्धु-बान्धवोंसहित भिन्न-भिन्न देशोंकी विशाल सेना साथ लिये विकर्तनपुत्र कर्ण खड़ा था ॥ ११ १/२ ॥

जयद्रथो भीमरथः सम्पातिर्ऋषभो जयः ॥ १२ ॥ भूमिंजयो वृषक्राथो नैषधश्च महाबलः । वृता बलेन महता ब्रह्मलोकपुरस्कृताः ॥ १३ ॥ व्यूहस्योरसि ते राजन् स्थिता युद्धविशारदाः । राजन्! उस व्यूहके हृदयस्थानमें जयद्रथ, भीमरथ, सम्पाति, ऋषभ, जय, भूमिंजय, वृषक्राथ तथा महाबली निषधराज बहुत बड़ी सेनाके साथ खड़े थे। ये सब-के-सब ब्रह्मलोककी प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर लड़नेवाले तथा युद्धकी कलामें अत्यन्त निपुण थे ॥ १२-१३ १/२ ॥

द्रोणेन विहितो व्यूहः पदात्यश्वरथद्विपैः ॥ १४ ॥ वातोद्भूतार्णवाकारः प्रवृत्त इव लक्ष्यते ।

इस प्रकार पैदल, अश्वारोही, गजारोही तथा रथियोंद्वारा आचार्य द्रोणका बनाया हुआ वह व्यूह वायुके झकोरोंसे उछलते हुए समुद्रके समान दिखायी देता था ॥ १४ १/२ ॥

तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युयुत्सवः ॥ १५ ॥
सविद्युत्स्तनिता मेघाः सर्वदिग्भ्य इवोष्णगे ।
उसके पक्ष और प्रपक्ष भागोंसे युद्धकी इच्छा रखनेवाले योद्धा उसी प्रकार निकलने लगे, जैसे वर्षाकालमें विद्युत्से प्रकाशित गर्जते हुए मेघ सम्पूर्ण दिशाओंसे प्रकट होने लगते हैं ॥ १५ १/२ ॥

तस्य प्राग्ज्योतिषो मध्ये विधिवत् कल्पितं गजम् ॥ १६ ॥
आस्थितः शुशुभे राजन्नंशुमानुदये यथा ।
राजन्! उस व्यूहके मध्यभागमें विधिपूर्वक सजाये हुए हाथीपर आरूढ़ हो प्राग्ज्योतिषपुरके राजा भगदत्त उदयाचलपर प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १६ १/२ ॥

माल्यदामवता राजन् श्वेतच्छत्रेण धार्यता ॥ १७ ॥
कृत्तिकायोगयुक्तेन पौर्णमास्यामिवेन्दुना ।
राजन्! सेवकोंने राजा भगदत्तके ऊपर मुक्तामालाओंसे अलंकृत श्वेत छत्र लगा रखा था। उनका वह छत्र कृत्तिका नक्षत्रके योगसे युक्त पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति शोभा दे रहा था ॥ १७ १/२ ॥

नीलाञ्जनचयप्रख्यो मदान्धो द्विरदो बभौ ॥ १८ ॥
अतिवृष्टो महामेघैर्यथा स्यात् पर्वतो महान् ।
राजाका काली कज्जलराशिके समान मदान्ध गजराज अपने मस्तककी मदवर्षाके कारण महान् मेघोंकी अतिवृष्टिसे आर्द्र हुए विशाल पर्वतके समान शोभा पा रहा था ॥ १८ १/२ ॥

नानानृपतिभिर्वीरैर्विविधायुधभूषणैः ॥ १९ ॥
समन्वितः पर्वतीयैः शक्रो देवगणैरिव ।
जैसे इन्द्र देवगणोंसे घिरकर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार भाँति-भाँतिके आयुधों और आभूषणोंसे विभूषित, वीर एवं बहुसंख्यक पर्वतीय नृपतियोंसे घिरे हुए भगदत्तकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १९ १/२ ॥

ततो युधिष्ठिरः प्रेक्ष्य व्यूहं तमतिमानुषम् ॥ २० ॥
अजय्यमरिभिः संख्ये पार्षतं वाक्यमब्रवीत् ।
ब्राह्मणस्य वशं नाहमियामद्य यथा प्रभो ।
पारावतसवर्णाश्व तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ २१ ॥