भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 157

उन सभीने समस्त प्राणियोंके सुनते हुए अर्जुनका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की और उच्चस्वरसे यह बात कही— ॥ २८ ॥

ये वै लोकाश्चाव्रतिनां ये चैव ब्रह्मघातिनाम् । मद्यपस्य च ये लोका गुरुदाररतस्य च ॥ २९ ॥ ब्रह्मस्वहारिणश्चैव राजपिण्डापहारिणः । शरणागतं च त्यजतो याचमानं तथा घ्नतः ॥ ३० ॥ अगारदाहिनां चैव ये च गां निघ्नतामपि । अपकारिणां च ये लोका ये च ब्रह्मद्विषामपि ॥ ३१ ॥ स्वभार्यामृतुकालेषु मोहाद् वै नाभिगच्छताम् । श्राद्धमैथुनिकानां च ये चाप्यात्मापहारिणाम् ॥ ३२ ॥ न्यासापहारिणां ये च श्रुतं नाशयतां च ये । क्लीबेन युध्यमानानां ये च नीचानुसारिणाम् ॥ ३३ ॥ नास्तिकानां च ये लोका येऽग्निमातृपितृत्यजाम् । (सस्यमाक्रमतां ये च प्रत्यादित्यं प्रमेहताम् ।) तानाप्नुयामहे लोकान् ये च पापकृतामपि ॥ ३४ ॥ यद्यहत्वा वयं युद्धे निवर्तेम धनंजयम् । तेन चाभ्यर्दितास्त्रासाद् भवेम हि पराङ्मुखाः ॥ ३५ ॥

'यदि हमलोग अर्जुनको युद्धमें मारे बिना लौट आवें अथवा उनके बाणोंसे पीड़ित हो भयके कारण युद्धसे पराङ्मुख हो जायँ तो हमें वे ही पापमय लोक प्राप्त हों, जो व्रतका पालन न करनेवाले, ब्रह्महत्यारे, मद्य पीनेवाले, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले, राजाकी दी हुई जीविकाको छीन लेनेवाले, शरणागतको त्याग देनेवाले, याचकको मारनेवाले, घरमें आग लगानेवाले, गोवध करनेवाले, दूसरोंकी बुराईमें लगे रहनेवाले, ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले, ऋतुकालमें भी मोहवश अपनी पत्नीके साथ समागम न करनेवाले, श्राद्धके दिन मैथुन करनेवाले, अपनी जाति छिपानेवाले, धरोहरको हड़प लेनेवाले, अपनी प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, नपुंसकके साथ युद्ध करनेवाले, नीच पुरुषोंका संग करनेवाले, ईश्वर और परलोकपर विश्वास न करनेवाले, अग्नि, माता और पिताकी सेवाका परित्याग करनेवाले, खेतीको पैरोंसे कुचलकर नष्ट कर देनेवाले, सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्रत्याग करनेवाले तथा पापपरायण पुरुषोंको प्राप्त होते हैं' ॥ २९—३५ ॥

यदि त्वसुकरं लोके कर्म कुर्याम संयुगे । इष्टाँल्लोकान् प्राप्नुयामो वयमद्य न संशयः ॥ ३६ ॥

'यदि आज हम युद्धमें अर्जुनको मारकर लोकमें असम्भव माने जानेवाले कर्मको भी कर लेंगे तो मनोवांछित पुण्यलोकोंको प्राप्त करेंगे, इसमें संशय नहीं है' ॥ ३६ ॥

एवमुक्त्वा तदा राजंस्तेऽभ्यवर्तन्त संयुगे ।