भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

आह्वयन्तोऽर्जुनं वीराः पितृजुष्टां दिशं प्रति ।। ३७ ।।
राजन्! ऐसा कहकर वे वीर संशप्तकगण उस समय अर्जुनको ललकारते हुए युद्धस्थलमें दक्षिण दिशाकी ओर जाकर खड़े हो गये ।। ३७ ।।
आहूतस्तैर्नरव्याघ्रैः पार्थः परपुरंजयः ।
धर्मराजमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत् ।। ३८ ।।
उन पुरुषसिंह संशप्तकोंद्वारा ललकारे जानेपर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले कुन्तीकुमार अर्जुन तुरंत ही धर्मराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले— ।। ३८ ।।
आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् ।
संशप्तकाश्च मां राजन्नाह्वयन्ति महामृधे ।। ३९ ।।
राजन्! मेरा यह निश्चित व्रत है कि यदि कोई मुझे युद्धके लिये बुलाये तो मैं पीछे नहीं हटूंगा। ये संशप्तक मुझे महायुद्धमें बुला रहे हैं ।। ३९ ।।
एष च भ्रातृभिः सार्धं सुशर्माऽऽह्वयते रणे ।
वधाय सगणस्यास्य मामनुज्ञातुमर्हसि ।। ४० ।।
‘यह सुशर्मा अपने भाइयोंके साथ आकर मुझे युद्धके लिये ललकार रहा है, अतः गणोंसहित इस सुशर्माका वध करनेके लिये मुझे आज्ञा देनेकी कृपा करें ।। ४० ।।
नैतच्छक्नोमि संसोढुमाह्वानं पुरुषर्षभ ।
सत्यं ते प्रतिजानामि हतान् विद्धि परान् युधि ।। ४१ ।।
‘पुरुषप्रवर! मैं शत्रुओंकी यह ललकार नहीं सह सकता। आपसे सच्ची प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि इन शत्रुओंको युद्धमें मारा गया ही समझिये' ।। ४१ ।।

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं ते तत्त्वतस्तात यद् द्रोणस्य चिकीर्षितम् ।
यथा तदनृतं तस्य भवेत् तत् त्वं समाचर ।। ४२ ।।
युधिष्ठिर बोले—तात! द्रोणाचार्य क्या करना चाहते हैं, यह तो तुमने अच्छी तरह सुन ही लिया होगा। उनका वह संकल्प जैसे भी झूठा हो जाय, वही तुम करो ।। ४२ ।।
द्रोणो हि बलवाञ्छूरः कृतास्त्रश्च जितश्रमः ।
प्रतिज्ञातं च तेनैतद् ग्रहणं मे महारथ ।। ४३ ।।
महारथी वीर! आचार्य द्रोण बलवान्, शौर्यसम्पन्न और अस्त्रविद्यामें निपुण हैं, उन्होंने परिश्रमको जीत लिया है तथा वे मुझे पकड़कर दुर्योधनके पास ले जानेकी प्रतिज्ञा कर चुके हैं ।। ४३ ।।

अर्जुन उवाच

अयं वै सत्यजिद् राजन्नद्य त्वां रक्षिता युधि ।
ध्रियमाणे च पाञ्चाल्ये नाचार्यः काममाप्स्यति ।। ४४ ।।