भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

अर्जुन बोले—राजन्! ये पांचालराजकुमार सत्यजित् आज युद्धस्थलमें आपकी रक्षा करेंगे। इनके जीते-जी आचार्य अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकेंगे ॥ ४४ ॥
हते तु पुरुषव्याघ्रे रणे सत्यजिति प्रभो ।
सर्वैरपि समेतैर्वा न स्थातव्यं कथंचन ॥ ४५ ॥
प्रभो! यदि पुरुषसिंह सत्यजित् रणभूमिमें वीरगतिको प्राप्त हो जायँ तो आप सब लोगोंके साथ होनेपर भी किसी तरह युद्धभूमिमें न ठहरियेगा ॥ ४५ ॥

संजय उवाच

अनुज्ञातस्ततो राज्ञा परिष्वक्तश्च फाल्गुनः ।
प्रेम्णा दृष्टश्च बहुधा ह्याशिषश्चास्य योजिताः ॥ ४६ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तब राजा युधिष्ठिरने अर्जुनको जानेकी आज्ञा दे दी और उनको हृदयसे लगा लिया। प्रेमपूर्वक उन्हें बार-बार देखा और आशीर्वाद दिया ॥ ४६ ॥
विहायैनं ततः पार्थस्त्रिगर्तान् प्रत्ययाद् बली ।
क्षुधितः क्षुद्धिघातार्थं सिंहो मृगगणानिव ॥ ४७ ॥
तदनन्तर बलवान् कुन्तीकुमार अर्जुन राजा युधिष्ठिरको वहीं छोड़कर त्रिगर्तोंकी ओर बढ़े, मानो भूखा सिंह अपनी भूख मिटानेके लिये मृगोंके झुंडकी ओर जा रहा हो ॥ ४७ ॥
ततो दौर्योधनं सैन्यं मुदा परमया युतम् ।
ऋतेऽर्जुनं भृशं क्रुद्धं धर्मराजस्य निग्रहे ॥ ४८ ॥
तब दुर्योधनकी सेना बड़ी प्रसन्नताके साथ अर्जुनके बिना राजा युधिष्ठिरको कैद करनेके लिये अत्यन्त क्रोधपूर्वक प्रयत्न करने लगी ॥ ४८ ॥
ततोऽन्योन्येन ते सैन्ये समाजग्मतुरोजसा ।
गङ्गासरय्वौ वेगेन प्रावृषीवोल्बणोदके ॥ ४९ ॥
तत्पश्चात् दोनों सेनाएँ बड़े वेगसे परस्पर भिड़ गयीं, मानो वर्षा-ऋतुमें जलसे लबालब भरी हुई गंगा और सरयू वेगपूर्वक आपसमें मिल रही हों ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि धनंजययाने सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें अर्जुनकी रणयात्राविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५० १/३ श्लोक हैं।)