महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो ज्वलनमानर्च्य हुत्वा सर्वे पृथक् पृथक् ।
जगृहुः कुशचीराणि चित्राणि कवचानि च ॥ २२ ॥
उन सबने पृथक्-पृथक् अग्निदेवकी पूजा करके हवन किया तथा कुशके चीर और विचित्र कवच धारण कर लिये ॥ २२ ॥
ते च बद्धतनुत्राणा घृताक्ताः कुशचीरिणः ।
मौर्वीमेखलिनो वीराः सहस्रशतदक्षिणाः ॥ २३ ॥
कवच बाँधकर कुश-चीर धारण कर लेनेके पश्चात् उन्होंने अपने अंगोंमें घी लगाया और 'मौर्वी' नामक तृणविशेषकी बनी हुई मेखला धारण की। वे सभी वीर पहले यज्ञ करके लाखों स्वर्ण-मुद्राएँ दक्षिणामें बाँट चुके थे ॥ २३ ॥
यज्वानः पुत्रिणो लोक्याः कृतकृत्यास्तनुत्यजः ।
योक्ष्यमाणास्तदाऽऽत्मानं यशसा विजयेन च ॥ २४ ॥
उन सबने पूर्वकालमें यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, वे सभी पुत्रवान् तथा पुण्यलोकोंमें जानेके अधिकारी थे, उन्होंने अपने कर्तव्यको पूरा कर लिया था। वे हर्षपूर्वक युद्धमें अपने शरीरका त्याग करनेको उद्यत थे और अपने-आपको यश एवं विजयसे संयुक्त करने जा रहे थे ॥ २४ ॥
ब्रह्मचर्यश्रुतिमुखैः क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः ।
प्राप्याँल्लोकान् सुयुद्धेन क्षिप्रमेव यियासवः ॥ २५ ॥
ब्रह्मचर्यपालन, वेदोंके स्वाध्याय तथा पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंके अनुष्ठान आदि साधनोंसे जिन पुण्यलोकोंकी प्राप्ति होती है, उन सबमें वे उत्तम युद्धके द्वारा ही शीघ्र पहुँचनेकी इच्छा रखते थे ॥ २५ ॥
ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा च निष्कान् दत्त्वा पृथक् पृथक् ।
गाश्च वासांसि च पुनः समाभाष्य परस्परम् ॥ २६ ॥
(द्विजमुख्यैः समुदितैः कृतस्वस्त्ययनाशिषः ।
मुदिताश्च प्रहृष्टाश्च जलं संस्पृश्य निर्मलम् ॥)
प्रज्वाल्य कृष्णवर्त्मानमुपागम्य रणव्रतम् ।
तस्मिन्नग्नौ तदा चक्रुः प्रतिज्ञां दृढनिश्चयाः ॥ २७ ॥
ब्राह्मणोंको भोजन आदिसे तृप्त करके उन्हें अलग-अलग स्वर्णमुद्राओं, गौओं तथा वस्त्रोंकी दक्षिणा देकर परस्पर बातचीत करके उन्होंने वहाँ एकत्र हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराया, आशीर्वाद प्राप्त किया और हर्षोल्लासपूर्वक निर्मल जलका स्पर्श करके अग्निको प्रज्वलित किया। फिर समीप आकर युद्धका व्रत ले अग्निके सामने ही दृढ़ निश्चयपूर्वक प्रतिज्ञा की ॥
शृण्वतां सर्वभूतानामुच्चैर्वाचो बभाषिरे ।
सर्वे धनंजयवधे प्रतिज्ञां चापि चक्रिरे ॥ २८ ॥