भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

उवाह भगवान् वायुः शुष्कपर्णचयानिव ॥ २३ ॥
तदनन्तर भगवान् वायुदेवने घोड़े, हाथी, रथ और आयुधोंसहित संशप्तकसमूहोंको वहाँसे सूखे पत्तोंके ढेरकी भाँति उड़ाना आरम्भ किया ॥ २३ ॥

उह्यमानास्तु ते राजन् बह्वशोभन्त वायुना ।
प्रडीनाः पक्षिणः काले वृक्षेभ्य इव मारिष ॥ २४ ॥
माननीय महाराज! वायुके द्वारा उड़ाये जाते हुए वे सैनिक समय-समयपर वृक्षोंसे उड़नेवाले पक्षियोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २४ ॥
तांस्तथा व्याकुलीकृत्य त्वरमाणो धनंजयः ।
जघान निशितैर्बाणैः सहस्राणि शतानि च ॥ २५ ॥
उन सबको व्याकुल करके अर्जुन अपने पैने बाणोंसे शीघ्रतापूर्वक उनके सौ-सौ और हजार-हजार योद्धाओंका एक साथ संहार करने लगे ॥ २५ ॥
शिरांसि भल्लैरहरद् बाहूनपि च सायुधान् ।
हस्तिहस्तोपमांश्चोरून् शरैरुर्व्यामपातयत् ॥ २६ ॥
उन्होंने भल्लोंद्वारा उनके सिर उड़ा दिये, आयुधोंसहित भुजाएँ काट डालीं और हाथीकी सूँड़के समान मोटी जाँघोंको भी बाणोंद्वारा पृथ्वीपर काट गिराया ॥ २६ ॥
पृष्ठच्छिन्नान् विचरणान् बाहुपार्श्वेक्षणाकुलान् ।
नानाङ्गावयवैर्हीनांश्चकारारीन् धनंजयः ॥ २७ ॥