महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उवाह भगवान् वायुः शुष्कपर्णचयानिव ॥ २३ ॥
तदनन्तर भगवान् वायुदेवने घोड़े, हाथी, रथ और आयुधोंसहित संशप्तकसमूहोंको वहाँसे सूखे पत्तोंके ढेरकी भाँति उड़ाना आरम्भ किया ॥ २३ ॥
उह्यमानास्तु ते राजन् बह्वशोभन्त वायुना ।
प्रडीनाः पक्षिणः काले वृक्षेभ्य इव मारिष ॥ २४ ॥
माननीय महाराज! वायुके द्वारा उड़ाये जाते हुए वे सैनिक समय-समयपर वृक्षोंसे उड़नेवाले पक्षियोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २४ ॥
तांस्तथा व्याकुलीकृत्य त्वरमाणो धनंजयः ।
जघान निशितैर्बाणैः सहस्राणि शतानि च ॥ २५ ॥
उन सबको व्याकुल करके अर्जुन अपने पैने बाणोंसे शीघ्रतापूर्वक उनके सौ-सौ और हजार-हजार योद्धाओंका एक साथ संहार करने लगे ॥ २५ ॥
शिरांसि भल्लैरहरद् बाहूनपि च सायुधान् ।
हस्तिहस्तोपमांश्चोरून् शरैरुर्व्यामपातयत् ॥ २६ ॥
उन्होंने भल्लोंद्वारा उनके सिर उड़ा दिये, आयुधोंसहित भुजाएँ काट डालीं और हाथीकी सूँड़के समान मोटी जाँघोंको भी बाणोंद्वारा पृथ्वीपर काट गिराया ॥ २६ ॥
पृष्ठच्छिन्नान् विचरणान् बाहुपार्श्वेक्षणाकुलान् ।
नानाङ्गावयवैर्हीनांश्चकारारीन् धनंजयः ॥ २७ ॥
धनञ्जयने शत्रुओंको शरीरके अनेक अंगोंसे विहीन कर दिया। किन्हींकी पीठ काट ली तो किन्हींके पैर उड़ा दिये। कितने ही सैनिक बाहु, पसली और नेत्रोंसे वंचित होकर व्याकुल हो रहे थे ॥ २७ ॥ गन्धर्वनगराकारान् विधिवत्कल्पितान् रथान् । शरैर्विशकलीकुर्वंश्चक्रे व्यश्वरथद्विपान् ॥ २८ ॥ उन्होंने गन्धर्वनगरोंके समान प्रतीत होनेवाले और विधिवत् सजे हुए रथोंके अपने बाणोंद्वारा टुकड़े-टुकड़े कर दिये और शत्रुओंको हाथी, घोड़े एवं रथोंसे वंचित कर दिये ॥ २८ ॥ मुण्डतालवनानीव तत्र तत्र चकाशिरे । छिन्ना रथध्वजव्राताः केचित्तत्र क्वचित् क्वचित् ॥ २९ ॥ वहाँ कहीं-कहीं रथवर्ती ध्वजोंके समूह ऊपरसे कट जानेके कारण मुण्डित तालवनोंके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २९ ॥ सोत्तरायुधिनो नागाः सपताकाङ्कुशध्वजाः । पेतुः शक्राशनिहता द्रुमवन्त इवाचलाः ॥ ३० ॥ पताका, अंकुश और ध्वजोंसे विभूषित गजराज वहाँ इन्द्रके वज्रसे मारे हुए वृक्षयुक्त पर्वतोंके समान ऊपर चढ़े हुए योद्धाओंसहित धराशायी हो गये ॥ ३० ॥ चामरापीडकवचाः सस्त्रान्त्रनयनास्तथा । सारोहास्तुरगाः पेतुः पार्थबाणहताः क्षितौ ॥ ३१ ॥ चामर, माला और कवचोंसे युक्त बहुत-से घोड़े अर्जुनके बाणोंसे मारे जाकर सवारोंसहित धरतीपर पड़े थे। उनकी आँतें और आँखें बाहर निकल आयी थीं ॥ ३१ ॥ विप्रविद्धासिनखराश्छिन्नवर्मर्ष्टिशक्तयः । पत्त्यश्छिन्नवर्माणः कृपणाः शेरते हताः ॥ ३२ ॥ पैदल सैनिकोंके खड्ग एवं नखर कटकर गिरे हुए थे। कवच, ऋष्टि और शक्तियोंके टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। कवच कट जानेसे अत्यन्त दीन हो वे मरकर पृथ्वीपर पड़े थे ॥ ३२ ॥ तैर्हतैर्हन्यमानैश्च पतद्भिः पतितैरपि । भ्रमद्भिर्निघ्नद्भिश्च क्रूरमायोधनं बभौ ॥ ३३ ॥ कितने ही वीर मारे गये थे और कितने ही मारे जा रहे थे। कुछ गिर गये थे और कुछ गिर रहे थे। कितने ही चक्कर काटते और आघात करते थे। इन सबके द्वारा वह युद्धस्थल अत्यन्त क्रूरतापूर्ण जान पड़ता था ॥ ३३ ॥ रजश्च सुमहज्जातं शान्तं रुधिरवृष्टिभिः । मही चाप्यभवद् दुर्गा कबन्धशतसंकुला ॥ ३४ ॥
रक्तकी वर्षासे वहाँकी उड़ती हुई भारी धूलराशि शान्त हो गयी और सैकड़ों कबन्धों (बिना सिरकी लाशों)-से आच्छादित होनेके कारण उस भूमिपर चलना कठिन हो गया ॥ ३४ ॥
तद् बभौ रौद्रबीभत्सं बीभत्सोर्यानमाहवे ।
आक्रीडमिव रुद्रस्य घ्नतः कालात्यये पशून् ॥ ३५ ॥
रणक्षेत्रमें अर्जुनका वह भयंकर एवं बीभत्स रथ प्रलयकालमें पशुओं (जगत्के जीवों) का संहार करनेवाले रुद्रदेवके क्रीड़ास्थल-सा प्रतीत हो रहा था ॥ ३५ ॥
ते वध्यमानाः पार्थेन व्याकुलाश्च रथद्विपाः ।
तमेवाभिमुखाः क्षीणाः शक्रस्यातिथितां गताः ॥ ३६ ॥
अर्जुनके द्वारा मारे जाते हुए रथ और हाथी व्याकुल होकर उन्हींकी ओर मुँह करके प्राणत्याग करनेके कारण इन्द्रलोकके अतिथि हो गये ॥ ३६ ॥
सा भूमिर्भरतश्रेष्ठ निहतैस्तैर्महारथैः ।
आस्तीर्णा सम्बभौ सर्वा प्रेतीभूतैः समन्ततः ॥ ३७ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ मारे गये महारथियोंसे आच्छादित हुई वह सारी भूमि सब ओरसे प्रेतोंद्वारा घिरी हुई-सी जान पड़ती थी ॥ ३७ ॥
एतस्मिन्नन्तरे चैव प्रमत्ते सव्यसाचिनि ।
व्यूढानीकस्ततो द्रोणो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ३८ ॥
जब इधर सव्यसाची अर्जुन उस युद्धमें भली प्रकार लगे हुए थे, उसी समय अपनी सेनाका व्यूह बनाकर द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ ३८ ॥
तं प्रत्यगृह्णंस्त्वरिता व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
युधिष्ठिरं परीप्सन्तस्तदासीत् तुमुलं महत् ॥ ३९ ॥
व्यूह-रचनापूर्वक प्रहार करनेमें कुशल योद्धाओंने युधिष्ठिरको पकड़नेकी इच्छासे तुरंत ही उनपर चढ़ाई कर दी, वह युद्ध बड़ा भयानक हुआ ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि अर्जुनसंशप्तकयुद्धे
एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें अर्जुन-संशप्तक-युद्धविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
विंशोऽध्यायः
द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार
संजय उवाच
परिणाम्य निशां तां तु भारद्वाजो महारथः ।
उक्त्वा सुबहु राजेन्द्र वचनं वै सुयोधनम् ॥ १ ॥
विधाय योगं पार्थेन संशप्तकगणैः सह ।
निष्क्रान्ते च तदा पार्थे संशप्तकवधं प्रति ॥ २ ॥
व्यूढानीकस्ततो द्रोणः पाण्डवानां महाचमूं ।
अभ्ययाद् भरतश्रेष्ठ धर्मराजजिघृक्षया ॥ ३ ॥
**संजय कहते हैं—**राजेन्द्र! महारथी द्रोणाचार्यने वह रात बिताकर दुर्योधनसे बहुत कुछ बातें कहीं और संशप्तकोंके साथ अर्जुनके युद्धका योग लगा दिया। भरतश्रेष्ठ! फिर संशप्तकोंका वध करनेके लिये अर्जुन जब दूर निकल गये, तब सेनाकी व्यूहरचना करके धर्मराज युधिष्ठिरको पकड़नेके लिये द्रोणाचार्यने पाण्डवोंकी विशाल सेनापर आक्रमण किया ॥ १–३ ॥
व्यूढं दृष्ट्वा सुपर्णं तु भारद्वाजकृतं तदा ।
व्यूहेन मण्डलार्धेन प्रत्यव्यूहद् युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥
द्रोणाचार्यके बनाये हुए गरुड़व्यूहको देखकर युधिष्ठिरने अपनी सेनाका मण्डलार्धव्यूह बनाया ॥ ४ ॥
मुखं त्वासीत् सुपर्णस्य भारद्वाजो महारथः ।
शिरो दुर्योधनो राजा सोदर्यैः सानुगैर्वृतः ।
चक्षुषी कृतवर्माऽऽसीद् गौतमश्चास्यतां वरः ॥ ५ ॥
गरुड़व्यूहमें गरुड़के मुँहके स्थानपर महारथी द्रोणाचार्य खड़े थे। शिरोभागमें भाइयों तथा अनुगामी सैनिकोंसहित राजा दुर्योधन उपस्थित हुआ। बाण चलानेवालोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्य और कृतवर्मा उस व्यूहकी आँखके स्थानमें स्थित हुए ॥ ५ ॥
भूतशर्मा क्षेमशर्मा करकाशश्च वीर्यवान् ।
कलिङ्गाः सिंहलाः प्राच्याः शूराभीरा दशेरकाः ॥ ६ ॥
शका यवनकाम्बोजास्तथा हंसपथाश्च ये ।
ग्रीवायां शूरसेनाश्च दरदा मद्रकेकयाः ॥ ७ ॥
गजाश्वरथपत्त्योघास्तस्थुः परमंदंशिताः । भूतशर्मा, क्षेमशर्मा, पराक्रमी करकाश, कलिंग, सिंहल, पूर्वदिशाके सैनिक, शूर आभीरगण, दाशेरकगण, शक, यवन, काम्बोज, शूरसेन, दरद, मद्र, केकय तथा हंसपथ नामवाले देशोंके निवासी शूरवीर एवं हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल सैनिकोंके समूह उत्तम कवच धारण करके उस गरुड़के ग्रीवाभागमें खड़े थे ॥
भूरिश्रवास्तथा शल्यः सोमदत्तश्च बाह्लिकः ॥ ८ ॥ अक्षौहिण्या वृता वीरा दक्षिणं पार्श्वमास्थिताः । भूरिश्रवा, शल्य, सोमदत्त तथा बाह्लिक—ये वीरगण अक्षौहिणी सेनाके साथ व्यूहके दाहिने पार्श्वमें स्थित थे ॥ ८ १/२ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजश्च सुदक्षिणः ॥ ९ ॥ वामं पार्श्वं समाश्रित्य द्रोणपुत्राग्रतः स्थिताः । अवन्तीके विन्द और अनुविन्द तथा काम्बोजराज सुदक्षिण—ये बायें पार्श्वका आश्रय लेकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके आगे खड़े हुए ॥ ९ १/२ ॥
पृष्ठे कलिङ्गाः साम्बष्ठा मागधाः पौण्ड्रमद्रकाः ॥ १० ॥ गान्धाराः शकुनाः प्राच्याः पर्वतीया वसातयः । पृष्ठभागमें कलिंग, अम्बष्ठ, मगध, पौण्ड्र, मद्रक, गन्धार, शकुन, पूर्वदेश, पर्वतीय प्रदेश और वसाति आदि देशोंके वीर थे ॥ १० १/२ ॥
पुच्छे वैकर्तनः कर्णः सपुत्रज्ञातिबान्धवः ॥ ११ ॥ महत्या सेनया तस्थौ नानाजनपदोत्थया । पुच्छभागमें अपने पुत्र, जाति-भाई तथा कुटुम्बके बन्धु-बान्धवोंसहित भिन्न-भिन्न देशोंकी विशाल सेना साथ लिये विकर्तनपुत्र कर्ण खड़ा था ॥ ११ १/२ ॥
जयद्रथो भीमरथः सम्पातिर्ऋषभो जयः ॥ १२ ॥ भूमिंजयो वृषक्राथो नैषधश्च महाबलः । वृता बलेन महता ब्रह्मलोकपुरस्कृताः ॥ १३ ॥ व्यूहस्योरसि ते राजन् स्थिता युद्धविशारदाः । राजन्! उस व्यूहके हृदयस्थानमें जयद्रथ, भीमरथ, सम्पाति, ऋषभ, जय, भूमिंजय, वृषक्राथ तथा महाबली निषधराज बहुत बड़ी सेनाके साथ खड़े थे। ये सब-के-सब ब्रह्मलोककी प्राप्तिको लक्ष्य बनाकर लड़नेवाले तथा युद्धकी कलामें अत्यन्त निपुण थे ॥ १२-१३ १/२ ॥
द्रोणेन विहितो व्यूहः पदात्यश्वरथद्विपैः ॥ १४ ॥ वातोद्भूतार्णवाकारः प्रवृत्त इव लक्ष्यते ।
इस प्रकार पैदल, अश्वारोही, गजारोही तथा रथियोंद्वारा आचार्य द्रोणका बनाया हुआ वह व्यूह वायुके झकोरोंसे उछलते हुए समुद्रके समान दिखायी देता था ॥ १४ १/२ ॥
तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युयुत्सवः ॥ १५ ॥
सविद्युत्स्तनिता मेघाः सर्वदिग्भ्य इवोष्णगे ।
उसके पक्ष और प्रपक्ष भागोंसे युद्धकी इच्छा रखनेवाले योद्धा उसी प्रकार निकलने लगे, जैसे वर्षाकालमें विद्युत्से प्रकाशित गर्जते हुए मेघ सम्पूर्ण दिशाओंसे प्रकट होने लगते हैं ॥ १५ १/२ ॥
तस्य प्राग्ज्योतिषो मध्ये विधिवत् कल्पितं गजम् ॥ १६ ॥
आस्थितः शुशुभे राजन्नंशुमानुदये यथा ।
राजन्! उस व्यूहके मध्यभागमें विधिपूर्वक सजाये हुए हाथीपर आरूढ़ हो प्राग्ज्योतिषपुरके राजा भगदत्त उदयाचलपर प्रकाशित होनेवाले सूर्यदेवके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १६ १/२ ॥
माल्यदामवता राजन् श्वेतच्छत्रेण धार्यता ॥ १७ ॥
कृत्तिकायोगयुक्तेन पौर्णमास्यामिवेन्दुना ।
राजन्! सेवकोंने राजा भगदत्तके ऊपर मुक्तामालाओंसे अलंकृत श्वेत छत्र लगा रखा था। उनका वह छत्र कृत्तिका नक्षत्रके योगसे युक्त पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति शोभा दे रहा था ॥ १७ १/२ ॥
नीलाञ्जनचयप्रख्यो मदान्धो द्विरदो बभौ ॥ १८ ॥
अतिवृष्टो महामेघैर्यथा स्यात् पर्वतो महान् ।
राजाका काली कज्जलराशिके समान मदान्ध गजराज अपने मस्तककी मदवर्षाके कारण महान् मेघोंकी अतिवृष्टिसे आर्द्र हुए विशाल पर्वतके समान शोभा पा रहा था ॥ १८ १/२ ॥
नानानृपतिभिर्वीरैर्विविधायुधभूषणैः ॥ १९ ॥
समन्वितः पर्वतीयैः शक्रो देवगणैरिव ।
जैसे इन्द्र देवगणोंसे घिरकर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार भाँति-भाँतिके आयुधों और आभूषणोंसे विभूषित, वीर एवं बहुसंख्यक पर्वतीय नृपतियोंसे घिरे हुए भगदत्तकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १९ १/२ ॥
ततो युधिष्ठिरः प्रेक्ष्य व्यूहं तमतिमानुषम् ॥ २० ॥
अजय्यमरिभिः संख्ये पार्षतं वाक्यमब्रवीत् ।
ब्राह्मणस्य वशं नाहमियामद्य यथा प्रभो ।
पारावतसवर्णाश्व तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ २१ ॥
राजा युधिष्ठिरने द्रोणाचार्यके रचे हुए उस अलौकिक तथा शत्रुओंके लिये अजेय व्यूहको देखकर युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नसे इस प्रकार कहा—'कबूतरके समान रंगवाले घोड़ोंपर चलनेवाले वीर! आज तुम ऐसी नीतिका प्रयोग करो, जिससे मैं उस ब्राह्मणके वशमें न होऊँ' ।।
धृष्टद्युम्न उवाच
द्रोणस्य यतमानस्य वशं नैष्यसि सुव्रत । अहमावारयिष्यामि द्रोणमद्य सहानुगम् ॥ २२ ॥ धृष्टद्युम्न बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! द्रोणाचार्य कितना ही प्रयत्न क्यों न करें, आप उनके वशमें नहीं होंगे। आज मैं सेवकोंसहित द्रोणाचार्यको रोकूँगा ॥ २२ ॥ मयि जीवति कौरव्य नोद्वेगं कर्तुमर्हसि । न हि शक्तो रणे द्रोणो विजेतुं मां कथंचन ॥ २३ ॥ कुरुनन्दन! मेरे जीते-जी आपको किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें मुझे किसी प्रकार जीत नहीं सकते ॥ २३ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा किरन् बाणान् द्रुपदस्य सुतो बली । पारावतसवर्णैश्वः स्वयं द्रोणमुपादद्रवत् ॥ २४ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! ऐसा कहकर कबूतरके समान रंगवाले घोड़े रखनेवाले महाबली द्रुपदपुत्रने बाणोंका जाल-सा बिछाते हुए स्वयं द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ २४ ॥ अनिष्टदर्शनं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नमवस्थितम् । क्षणेनैवाभवद् द्रोणो नातिहृष्टमना इव ॥ २५ ॥ जिसका दर्शन अनिष्टका सूचक था, उस धृष्टद्युम्नको सामने खड़ा देख द्रोणाचार्य क्षणभरमें अत्यन्त अप्रसन्न और उदास हो गये ॥ २५ ॥ (स हि जातो महाराज द्रोणस्य निधनं प्रति । मर्त्यधर्मतया तस्माद् भारद्वाजो व्यमुह्यत ॥) महाराज! वह द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये पैदा हुआ था; इसलिये उसे देखकर मर्त्यभावका आश्रय ले द्रोणाचार्य मोहित हो गये। तं तु सम्प्रेक्ष्य पुत्रस्ते दुर्मुखः शत्रुकर्षणः । प्रियं चिकीर्षुर्द्रोणस्य धृष्टद्युम्नमवारयत् ॥ २६ ॥ राजन्! शत्रुओंका संहार करनेवाले आपके पुत्र दुर्मुखने द्रोणाचार्यको उदास देख धृष्टद्युम्नको आगे बढ़नेसे रोक दिया। वह द्रोणाचार्यका प्रिय करना चाहता था ॥ २६ ॥ स सम्प्रहारस्तुमुलः सुघोरः समपद्यत ।
पार्षतस्य च शूरस्य दुर्मुखस्य च भारत ॥ २७ ॥
भरतनन्दन! उस समय शूरवीर धृष्टद्युम्न तथा दुर्मुखमें तुमुल युद्ध होने लगा, धीरे-धीरे उसने अत्यन्त भयंकर रूप धारण कर लिया ॥ २७ ॥
पार्षतः शरजालेन क्षिप्रं प्रच्छाद्य दुर्मुखम् ।
भारद्वाजं शरौघेण महता समवारयत् ॥ २८ ॥
धृष्टद्युम्नने शीघ्र ही अपने बाणोंके जालसे दुर्मुखको आच्छादित करके महान् बाणसमूहद्वारा द्रोणाचार्यको भी आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ २८ ॥
द्रोणमावारितं दृष्ट्वा भृशायतस्तवात्मजः ।
नानालिङ्गैः शरव्रातैः पार्षतं सम्ममोहयत् ॥ २९ ॥
द्रोणाचार्यको रोका गया देख आपका पुत्र अत्यन्त प्रयत्न करके नाना प्रकारके बाणसमूहोंद्वारा धृष्टद्युम्नको मोहित करने लगा ॥ २९ ॥
तयोर्विषक्तयोः संख्ये पाञ्चाल्यकुरुमुख्ययोः ।
द्रोणो यौधिष्ठिरं सैन्यं बहुधा व्यधमच्छरैः ॥ ३० ॥
वे दोनों पांचालराजकुमार और कुरुकुलके प्रधान वीर जब युद्धमें पूर्णतः आसक्त हो रहे थे, उसी समय द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरकी सेनाको अपनी बाण-वर्षाद्वारा अनेक प्रकारसे तहस-नहस कर डाला ॥ ३० ॥
अनिलेन यथाभ्राणि विच्छिन्नानि समन्ततः ।
तथा पार्थस्य सैन्यानि विच्छिन्नानि क्वचित् क्वचित् ॥ ३१ ॥
जैसे वायुके वेगसे बादल सब ओरसे फट जाते हैं, उसी प्रकार युधिष्ठिरकी सेनाएँ भी कहीं-कहींसे छिन्न-भिन्न हो गयीं ॥ ३१ ॥
मुहूर्तमिव तद् युद्धमासीन्मधुरदर्शनम् ।
तत उन्मत्तवद् राजन् निर्मर्यादमवर्तत ॥ ३२ ॥
राजन्! दो घड़ीतक तो वह युद्ध देखनेमें बड़ा मनोहर लगा; परंतु आगे चलकर उनमें पागलोंकी तरह मर्यादाशून्य मारकाट होने लगी ॥ ३२ ॥
नैव स्वे न परे राजन्नाज्ञायन्त परस्परम् ।
अनुमानेन संज्ञाभिर्युद्धं तत् समवर्तत ॥ ३३ ॥
नरेश्वर! उस समय वहाँ आपसमें अपने-परायेकी पहचान नहीं हो पाती थी। केवल अनुमान अथवा नाम बतानेसे ही शत्रु-मित्रका विचार करके युद्ध हो रहा था ॥ ३३ ॥
चुडामणिषु निष्केषु भूषणेष्वपि वर्मसु ।
तेषामादित्यवर्णाभा रश्मयः प्रचकाशिरे ॥ ३४ ॥
उन वीरोंके मुकुटों, हारों, आभूषणों तथा कवचोंमें सूर्यके समान प्रभामयी रश्मियाँ प्रकाशित हो रही थीं ॥
तत्प्रकीर्णपताकानां रथवारणवाजिनाम् ।
बलाकाशबलाभ्राभं ददृशे रूपमाहवे ॥ ३५ ॥
उस युद्धस्थलमें फहराती हुई पताकाओंसे युक्त रथों, हाथियों और घोड़ोंका रूप बकपंक्तियोंसे चितकबरे प्रतीत होनेवाले मेघोंके समान दिखायी देता था ॥ ३५ ॥
नरानेव नरा जघ्नुरुदग्राश्च हया हयान् ।
रथांश्च रथिनो जघ्नुर्वारणा वरवारणान् ॥ ३६ ॥
पैदल पैदलोंको मार रहे थे, प्रचण्ड घोड़े घोड़ोंका संहार कर रहे थे, रथी रथियोंका वध करते थे और हाथी बड़े-बड़े हाथियोंको चोट पहुँचा रहे थे ॥ ३६ ॥
समुच्छ्रितपताकानां गजानां परमद्विपैः ।
क्षणेन तुमलो घोरः संग्रामः समपद्यत ॥ ३७ ॥
जिनके ऊपर ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं, उन गजराजोंका शत्रुपक्षके बड़े-बड़े हाथियोंके साथ क्षणभरमें अत्यन्त भयंकर संग्राम छिड़ गया ॥ ३७ ॥
तेषां संसक्तगात्राणां कर्षतामितरेतरम् ।
दन्तसंघातसंघर्षात् सधूमोऽग्निरजायत ॥ ३८ ॥
वे एक-दूसरेसे अपने शरीरोंको सटाकर आपसमें खींचातानी करते थे। दाँतोंसे दाँतोंपर टक्कर लगनेसे धूमसहित आग-सी उठने लगती थी ॥ ३८ ॥
विप्रकीर्णपताकास्ते विषाणजनिताग्नयः ।
बभूवुः खं समासाद्य सविद्युत इवाम्बुदाः ॥ ३९ ॥
उन हाथियोंकी पीठपर फहराती हुई पताकाएँ वहाँसे टूट-टूटकर गिरने लगीं। उनके दाँतोंके आपसमें टकरानेसे आग प्रकट होने लगी। इससे वे आकाशमें छाये हुए बिजलीसहित मेघोंके समान जान पड़ते थे ॥
विक्षिपद्भिर्नदद्भिश्च निपतद्भिश्च वारणैः ।
सम्बभूव मही कीर्णा मेघैर्द्यौरिव शारदी ॥ ४० ॥
कोई हाथी दूसरे योद्धाओंको उठाकर फेंकते थे, कोई गरज रहे थे और कुछ हाथी मरकर धराशायी हो रहे थे। उनकी लाशोंसे आच्छादित हुई भूमि शरद्-ऋतुके आरम्भमें मेघोंसे आच्छादित आकाशके समान प्रतीत होती थी ॥ ४० ॥
तेषामाहन्यमानानां बाणतोमरऋष्टिभिः ।
वारणानां रवो जज्ञे मेघानामिव सम्प्लवे ॥ ४१ ॥
बाण, तोमर तथा ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे मारे जाते हुए गजराजोंका चीत्कार प्रलयकालके मेघोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ ४१ ॥
तोमराभिहताः केचिद् बाणैश्च परमद्विपाः ।
वित्रसुः सर्वनागानां शब्दमेवापरेऽव्रजन् ॥ ४२ ॥
कुछ बड़े हाथी तोमरोंकी मारसे घायल हो रहे थे, कुछ बाणोंकी चोटसे क्षत-विक्षत हो अत्यन्त भयभीत हो गये थे और कुछ सम्पूर्ण हाथियोंके शब्दका अनुसरण करते हुए
उन्हींकी ओर बढ़े जा रहे थे ॥ ४२ ॥
विषाणाभिहताश्चापि केचित् तत्र गजा गजैः । चक्रुरार्तस्वनं घोरमुत्पातजलदा इव ॥ ४३ ॥
कुछ हाथी वहाँ हाथियोंद्वारा दाँतोंसे घायल किये जानेपर उत्पातकालके मेघोंके समान भयंकर आर्तनाद कर रहे थे ॥ ४३ ॥
प्रतीपाः क्रियमाणाश्च वारणा वरवारणैः । उन्मथ्य पुनराजग्मुः प्रेरिताः परमाङ्कुशैः ॥ ४४ ॥
कितने ही हाथी शत्रुपक्षके श्रेष्ठ हाथियोंद्वारा घायल हो युद्धभूमिसे विमुख कर दिये गये थे। वे पुनः महावतोंद्वारा उत्तम अंकुशोंसे हाँके जानेपर अपनी ही सेनाको रौंदते हुए पुनः लौट आये ॥ ४४ ॥
महामात्रैर्महामात्रास्ताडिताः शरतोमरैः । गजेभ्यः पृथिवीं जग्मुर्मुक्तप्रहरणाङ्कुशाः ॥ ४५ ॥
महावतोंने बाणों और तोमरोंसे महावतोंको भी घायल कर दिया था। अतः वे हाथियोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े और उनके आयुध एवं अंकुश हाथोंसे छूटकर इधर-उधर जा गिरे ॥ ४५ ॥
निर्मनुष्याश्च मातङ्गा विनदन्तस्ततस्ततः । छिन्नाभ्राणीव सम्पेतुः सम्प्रविश्य परस्परम् ॥ ४६ ॥
कितने ही गजराज मनुष्योंसे शून्य हो इधर-उधर चीत्कार करते हुए फिर रहे थे। वे एक-दूसरेकी सेनामें घुसकर फटे हुए बादलोंके समान छिन्न-भिन्न हो धरतीपर गिर पड़े ॥ ४६ ॥
हतान् परिवहन्तश्च पतितान् पतितायुधान् । दिशो जग्मुर्महानागाः केचिदेकचरा इव ॥ ४७ ॥
कितने ही बड़े-बड़े हाथी अपनी पीठपर मरकर गिरे हुए आयुधशून्य सवारोंको ढोते हुए अकेले विचरनेवाले गजराजोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें चक्कर लगा रहे थे ॥ ४७ ॥
ताडितास्ताड्यमानाश्च तोमरर्ष्टिपरश्वधैः । पेतुरार्तस्वनं कृत्वा तदा विशसने गजाः ॥ ४८ ॥
उस समय बहुत-से हाथी उस युद्धस्थलमें तोमर, ऋष्टि तथा फरसोंकी मार खाकर घायल हो आर्तनाद करके धरतीपर गिर जाते थे ॥ ४८ ॥
तेषां शैलोपमैः कायैर्निपतद्भिः समन्ततः । आहता सहसा भूमिश्चकम्पे च ननाद च ॥ ४९ ॥
उनके पर्वताकार शरीरोंके गिरनेसे सब ओरसे आहत हुई भूमि सहसा काँपने और आर्तनाद करने लगी ॥ ४९ ॥
सादितैः सगजारोहैः सपताकैः समन्ततः ।
मातङ्गैः शुशुभे भूमिर्विकीर्णैरिव पर्वतैः ॥ ५० ॥ वहाँ मारे जाकर पताकाओं तथा गजारोहियोंसहित सब ओर गिरे हुए हाथियोंसे आच्छादित हुई वह भूमि ऐसी शोभा पा रही थी, मानो इधर-उधर बिखरे हुए पर्वतखण्डोंसे व्याप्त हो रही हो ॥ ५० ॥
गजस्थाश्च महामात्रा निर्भिन्नहृदया रणे ।
रथिभिः पातिता भल्लैर्विकीर्णाङ्कुशतोमराः ॥ ५१ ॥
उस रणक्षेत्रमें कितने ही रथियोंने अपने भल्लोंद्वारा हाथीपर बैठे हुए महावतोंकी छाती छेदकर उन्हें सहसा मार गिराया। उन महावतोंके अंकुश और तोमर इधर-उधर बिखर गये थे ॥ ५१ ॥
क्रौञ्चवद् विनदन्तोऽन्ये नाराचाभिहता गजाः ।
परान् स्वांश्चापि मृद्नन्तः परिपेतुर्दिशो दश ॥ ५२ ॥
कितने हीं हाथी नाराचोंसे घायल हो क्रौंच पक्षीकी भाँति चिग्घाड़ रहे थे और अपने तथा शत्रुपक्षके सैनिकोंको भी रौंदते हुए दसों दिशाओंमें भाग रहे थे ॥ ५२ ॥
गजाश्वरथयोधानां शरीरौघसमावृता ।
बभूव पृथिवी राजन् मांसशोणितकर्दमा ॥ ५३ ॥
राजन्! हाथी, घोड़े तथा रथ-योद्धाओंकी लाशोंसे ढकी हुई वहाँकी भूमिपर रक्त और मांसकी कीच जम गयी थी ॥ ५३ ॥
प्रमथ्य च विषाणाग्रैः समुत्क्षिप्ताश्च वारणैः ।
सचक्राश्च विचक्राश्च रथैरेव महारथाः ॥ ५४ ॥
कितने ही हाथियोंने अपने दाँतोंके अग्रभागसे पहियेवाले तथा बिना पहियेके बड़े-बड़े रथोंको रथियोंसहित चकनाचूर करके अपनी सूँड़ोंसे उछालकर फेंक दिया ॥ ५४ ॥
रथाश्च रथिभिर्हीना निर्मनुष्याश्च वाजिनः ।
हतारोहाश्च मातङ्गा दिशो जग्मुर्भयातुराः ॥ ५५ ॥
रथियोंसे रहित रथ, सवारोंसे शून्य घोड़े और जिनके सवार मार डाले गये हैं ऐसे हाथी भयसे व्याकुल हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग रहे थे ॥ ५५ ॥
जघानात्र पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा ।
इत्यासीत् तुमुलं युद्धं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५६ ॥
वहाँ पिताने पुत्रको और पुत्रने पिताको मार डाला। ऐसा भयंकर युद्ध हो रहा था कि किसीको कुछ भी ज्ञात नहीं होता था ॥ ५६ ॥
आगुल्फेभ्योऽवसीदन्ते नरा लोहितकर्दमैः ।
दीप्यमानैः परिक्षिप्ता दावैरिव महाद्रुमाः ॥ ५७ ॥
मनुष्योंके पैर रक्तकी कीचमें टखनोंतक धँस जाते थे। उस समय वे दहकते हुए दावानलसे घिरे हुए बड़े-बड़े वृक्षोंके समान जान पड़ते थे ॥ ५७ ॥
शोणितैः सिच्यमानानि वस्त्राणि कवचानि च ।
छत्राणि च पताकाश्च सर्वं रक्तमदृश्यत ॥ ५८ ॥
योद्धाओंके वस्त्र, कवच, ध्वज और पताकाएँ रक्तसे सींच उठी थीं। वहाँ सब कुछ रक्तसे रँगकर लाल-ही-लाल दिखायी देता था ॥ ५८ ॥
हयौघाश्च रथौघाश्च नरीघाश्च निपातिताः ।
संक्षुण्णाः पुनरावृत्य बहुधा रथनेमिभिः ॥ ५९ ॥
रणभूमिमें गिराये हुए घोड़ों, रथों और पैदलोंके समुदाय बारंबार आते-जाते रथोंके पहियोंसे कुचलकर टुकड़े-टुकड़े हो जाते थे ॥ ५९ ॥
सगजौघमहावेगः परासुनरशैवलः ।
रथौघतुमुलावर्तः प्रबभौ सैन्यसागरः ॥ ६० ॥
वह सेनाका समुद्र हाथियोंके समूहरूपी महान् वेग, मरे हुए मनुष्यरूपी सेवार तथा रथसमूहरूपी भयंकर भँवरोंके कारण अद्भुत शोभा पा रहा था ॥ ६० ॥
तं वाहनमहानौभिर्योधा जयधनैषिणः ।
अवगाह्याथ मज्जन्तो नैव मोहं प्रचक्रिरे ॥ ६१ ॥
विजयरूपी धनकी इच्छा रखनेवाले योद्धारूपी व्यापारी वाहनरूपी बड़ी-बड़ी नौकाओंद्वारा उस सैन्य-समुद्रमें उतरकर डूबते हुए भी प्राणोंका मोह नहीं करते थे ॥ ६१ ॥
शरवर्षाभिवृष्टेषु योधेष्वञ्चितलक्ष्मसु ।
न तेष्वचित्तां लेभे कश्चिदाहतलक्षणः ॥ ६२ ॥
वहाँ समस्त योद्धाओंपर बाणोंकी वर्षा हो रही थी। कहीं उनके चिह्न लुप्त नहीं थे। उनमेंसे कोई भी योद्धा अपनी ध्वज आदि चिह्नोंके नष्ट हो जानेपर भी मोहको नहीं प्राप्त हुआ ॥ ६२ ॥
वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे भयंकरे ।
मोहयित्वा परान् द्रोणो युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ६३ ॥
इस प्रकार जब अत्यन्त भयंकर घोर युद्ध चल रहा था, उस समय शत्रुओंको मोहित करके द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि संकुलयुद्धे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार महाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं।)
एकविंशोऽध्यायः
द्रोणाचार्यके द्वारा सत्यजित्, शतानीक, दृढसेन, क्षेम, वसुदान तथा पांचालराजकुमार आदिका वध और पाण्डव-सेनाकी पराजय
संजय उवाच
ततो युधिष्ठिरो द्रोणं दृष्ट्वाऽन्तिकमुपागतम् ।
महता शरवर्षेण प्रत्यगृह्णादभीतवत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर युधिष्ठिरने द्रोणको अपने समीप आया देख एक निर्भय वीरकी भाँति बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करके उन्हें रोक दिया ॥ १ ॥
ततो हलहलाशब्द आसीद् यौधिष्ठिरे बले ।
जिघृक्षति महासिंहे गजानामिव यूथपम् ॥ २ ॥
उस समय युधिष्ठिरकी सेनामें महान् कोलाहल मच गया। जैसे विशाल सिंह हाथियोंके यूथपतियोंको पकड़ना चाहता हो, उसी प्रकार द्रोणाचार्य युधिष्ठिरको अपने काबूमें करना चाहते थे ॥ २ ॥
दृष्ट्वा द्रोणं ततः शूरः सत्यजित् सत्यविक्रमः ।
युधिष्ठिरमभिप्रेप्सुराचार्यं समुपाद्रवत् ॥ ३ ॥
यह देख सत्यपराक्रमी शूरवीर सत्यजित् युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये द्रोणाचार्यपर टूट पड़ा ॥ ३ ॥
तत आचार्यपाञ्चाल्यौ युयुधाते महाबलौ ।
विक्षोभयन्तौ तत् सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव ॥ ४ ॥
फिर तो आचार्य और पांचालराजकुमार दोनों महाबली वीर इन्द्र और बलिकी भाँति उस सेनाको बिक्षुब्ध करते हुए आपसमें जूझने लगे ॥ ४ ॥
ततो द्रोणं महेष्वासः सत्यजित् सत्यविक्रमः ।
अविध्यन्निशिताग्रेण परमास्त्रं विदर्शयन् ॥ ५ ॥
सत्यपराक्रमी महाधनुर्धर सत्यजित्ने अपने उत्तम अस्त्रका प्रदर्शन करते हुए तेज धारवाले एक बाणसे द्रोणाचार्यको घायल कर दिया ॥ ५ ॥
तथास्य सारथेः पञ्च शरान् सर्पविषोपमान् ।
अमुञ्चदन्तकप्रख्यान् सम्मुमोहास्य सारथिः ॥ ६ ॥
फिर उनके सारथिपर सर्पविष एवं यमराजके समान भयंकर पाँच बाणोंका प्रहार किया। उन बाणोंकी चोटसे द्रोणाचार्यका सारथि मूर्च्छित हो गया ॥ ६ ॥
अथास्य सहसाविध्यद्धयांन् दशभिराशुगैः । दशभिर्दशभिः क्रुद्ध उभौ च पार्ष्णिसारथी ॥ ७ ॥ इसके बाद सत्यजित्ने सहसा दस शीघ्रगामी बाणोंद्वारा उनके घोड़ोंको बींध डाला और कुपित होकर दोनों पृष्ठरक्षकोंको भी दस-दस बाण मारे ॥ ७ ॥
मण्डलं तु समावृत्य विचरन् पृतनामुखे । ध्वजं चिच्छेद च क्रुद्धो द्रोणस्यामित्रकर्षणः ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् शत्रुसूदन सत्यजित्ने अत्यन्त कुपित हो सेनाके प्रमुख भागमें मण्डलाकार विचरते हुए अपने बाणद्वारा द्रोणाचार्यके ध्वजको भी काट डाला ॥ ८ ॥
द्रोणस्तु तत् समालोक्य चरितं तस्य संयुगे । मनसा चिन्तयामास प्राप्तकालमरिंदमः ॥ ९ ॥ तब शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणाचार्यने युद्धस्थलमें उसका वह पराक्रम देख मन-ही-मन समयोचित कर्तव्यका चिन्तन किया ॥ ९ ॥
ततः सत्यजितं तीक्ष्णैर्दशभिर्मर्मभेदिभिः । अविध्यच्छीघ्रमाचार्यश्छित्त्वास्य सशरं धनुः ॥ १० ॥ तदनन्तर आचार्यने सत्यजित्के बाणसहित धनुषको काटकर मर्मस्थलको विदीर्ण करनेवाले दस पैने बाणोंद्वारा उसे शीघ्र ही घायल कर दिया ॥ १० ॥
स शीघ्रतरमादाय धनुरन्यत् प्रतापवान् । द्रोणमभ्यहनद् राजंस्त्रिंशता कङ्कपत्रिभिः ॥ ११ ॥ राजन्! धनुष कट जानेपर प्रतापी वीर सत्यजित्ने शीघ्र ही दूसरा धनुष लेकर कंककी पाँखसे युक्त तीस बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको गहरी चोट पहुँचायी ॥ ११ ॥
दृष्ट्वा सत्यजिता द्रोणं ग्रस्यमानमिवाहवे । वृकः शरशतैस्तीक्ष्णैः पाञ्चाल्यो द्रोणमार्दयत् ॥ १२ ॥ उस युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यको सत्यजित्के बाणोंका ग्रास बनते देख पांचालवीर वृकने भी सैकड़ों पैने बाण मारकर द्रोणाचार्यको अत्यन्त पीड़ित कर दिया ॥ १२ ॥
संछाद्यमानं समरे द्रोणं दृष्ट्वा महारथम् । चुक्रुशुः पाण्डवा राजन् वस्त्राणि दुधुवुश्च ह ॥ १३ ॥ राजन्! महारथी द्रोणाचार्यको समरभूमिमें बाणोंद्वारा आच्छादित होते देख समस्त पाण्डव-सैनिक गर्जने और वस्त्र हिलाने लगे ॥ १३ ॥
वृकस्तु परमक्रुद्धो द्रोणं षष्ट्या स्तनान्तरे । विव्याध बलवान् राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १४ ॥ नरेश्वर! बलवान् वृकने अत्यन्त कुपित होकर द्रोणाचार्यकी छातीमें साठ बाण मारे। वह अद्भुत-सी बात थी ॥ १४ ॥
द्रोणस्तु शरवर्षेण च्छाद्यमानो महारथः ।
वेगं चक्रे महावेगः क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी ॥ १५ ॥ इस प्रकार बाण-वर्षासे आच्छादित होनेपर महान् वेगशाली महारथी द्रोणने क्रोधसे आँखें फाड़कर देखते हुए अपना विशेष वेग प्रकट किया ॥ १५ ॥
ततः सत्यजितश्चापं छित्त्वा द्रोणो वृकस्य च । षड्भिः ससूतं सहयं शरैर्द्रोणोऽवधीद् वृकम् ॥ १६ ॥ आचार्य द्रोणने सत्यजित् और वृक दोनोंके धनुष काटकर छः बाणोंद्वारा उन्होंने सारथि और घोड़ोंसहित वृकको मार डाला ॥ १६ ॥
अथान्यद् धनुरादाय सत्यजिद् वेगवत्तरम् । साश्वं ससूतं विशिखैर्द्रोणं विव्याध सध्वजम् ॥ १७ ॥ इतनेहीमें अत्यन्त वेगशाली दूसरा धनुष लेकर सत्यजित्ने अपने बाणोंद्वारा घोड़े, सारथि और ध्वजसहित द्रोणाचार्यको बींध डाला ॥ १७ ॥
स तन्न ममृषे द्रोणः पाञ्चाल्येनादितो मृधे । ततस्तस्य विनाशाय सत्वरं व्यसृजच्छरान् ॥ १८ ॥ संग्राममें पांचालराजकुमार सत्यजित्से पीड़ित होकर द्रोणाचार्य उसके पराक्रमको न सह सके। इसलिये तुरंत ही उसके विनाशके लिये उन्होंने बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ १८ ॥
हयान् ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ च पार्ष्णिसारथी । अवाकिरत् ततो द्रोणः शरवर्षैः सहस्रशः ॥ १९ ॥ द्रोणने सत्यजित्के घोड़ों, ध्वज, धनुषकी मुष्टि तथा दोनों पार्श्वरक्षकोंपर सहस्रों बाणोंकी वर्षा की ॥ १९ ॥
तथा संछिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः । पाञ्चाल्यः परमास्त्रज्ञः शोणाश्वं समयोधयत् ॥ २० ॥ इस प्रकार बारंबार धनुषोंके काटे जानेपर भी उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता पांचालवीर सत्यजित् लाल घोड़ोंवाले द्रोणाचार्यसे युद्ध करता ही रहा ॥ २० ॥
स सत्यजितमालोक्य तथोदीर्णं महाहवे । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद शिरस्तस्य महात्मनः ॥ २१ ॥ उस महासमरमें सत्यजित्को प्रचण्ड होते देख द्रोणाचार्यने अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा उस महामनस्वी वीरका मस्तक काट डाला ॥ २१ ॥
तस्मिन् हते महामात्रे पञ्चालानां महारथे । अपायाज्जवनैरश्वैर्द्रोणात् त्रस्तो युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥ उस महाबली महारथी पांचाल वीरके मारे जानेपर युधिष्ठिर द्रोणाचार्यसे अत्यन्त भयभीत हो गये और वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा युद्धस्थलसे दूर चले गये ॥ २२ ॥
पञ्चालाः केकया मत्स्या चेदिकारूषकोसलाः ।
युधिष्ठिरमभीप्सन्तो दृष्ट्वा द्रोणमुपाद्रवन् ॥ २३ ॥ उस समय युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये पांचाल, केकय, मत्स्य, चेदि, कारूष और कोसल देशोंके योद्धा द्रोणाचार्यको देखते ही उनपर टूट पड़े ॥ २३ ॥
ततो युधिष्ठिरं प्रेप्सुराचार्यः शत्रुपूगहा । व्यधमत् तान्यनीकानि तूलराशिमिवानलः ॥ २४ ॥ तब शत्रुसमूहोंका नाश करनेवाले द्रोणाचार्यने युधिष्ठिरको पकड़नेके लिये उन समस्त सैनिकोंका उसी प्रकार संहार कर डाला, जैसे आग रूईके ढेरको जला देती है ॥ २४ ॥
निर्दहन्तमनीकानि तानि तानि पुनः पुनः । द्रोणं मत्स्यादवरजः शतानीकोऽभ्यवर्तत ॥ २५ ॥ उन समस्त सैनिकोंको बार-बार बाणोंकी आगसे दग्ध करते देख विराटके छोटे भाई शतानीक द्रोणाचार्यपर चढ़ आये ॥ २५ ॥
सूर्यरश्मिप्रतीकाशैः कर्मारपरिमार्जितैः । षड्भिः ससूतं सहयं द्रोणं विद्ध्वानदद् भृशम् ॥ २६ ॥ उन्होंने कारीगरके द्वारा स्वच्छ किये हुए सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले छः बाणोंद्वारा सारथि और घोड़ोंसहित द्रोणाचार्यको घायल करके बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २६ ॥
क्रूराय कर्मणे युक्तश्चिकीर्षुः कर्म दुष्करम् । अवाकिरच्छरशतैर्भारद्वाजं महारथम् ॥ २७ ॥ तत्पश्चात् दुष्कर पराक्रम करनेकी इच्छासे क्रूरतापूर्ण कर्म करनेके लिये तत्पर हो उन्होंने महारथी द्रोणाचार्यपर सौ बाणोंकी वर्षा की ॥ २७ ॥
तस्य चानदतो द्रोणः शिरः कायात् सकुण्डलम् । क्षुरेणापाहरत् तूर्णं ततो मत्स्याः प्रदुद्रुवुः ॥ २८ ॥ तब द्रोणाचार्यने वहाँ गर्जना करते हुए शतानीकके कुण्डलसहित मस्तकको क्षुर नामक बाणद्वारा तुरंत ही धड़से काट गिराया। यह देख मत्स्यदेशके सैनिक भाग खड़े हुए ॥ २८ ॥
मत्स्याञ्जित्वाऽजयच्चेदीन् करूषान् केकयानपि । पञ्चालान् सृञ्जयान् पाण्डून् भारद्वाजः पुनः पुनः ॥ २९ ॥ इस प्रकार भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यने मत्स्यदेशीय योद्धाओंको जीतकर चेदि, करूष, केकय, पांचाल, सृंजय तथा पाण्डव-सैनिकोंको भी बारंबार परास्त किया ॥ २९ ॥
तं दहन्तमनीकानि क्रुद्धमग्निं यथा वनम् । दृष्ट्वा रुक्मरथं वीरं समकम्पन्त सृंजयाः ॥ ३० ॥ जैसे प्रज्वलित अग्नि सारे वनको जला देती है, उसी प्रकार क्रोधमें भरकर शत्रु की सेनाओंको दग्ध करते हुए सुवर्णमय रथवाले वीर द्रोणाचार्यको देखकर सृंजयवंशी क्षत्रिय
काँपने लगे ॥ ३० ॥ उत्तमं ह्याददानस्य धनुरस्याशुकारिणः । ज्याघोषो निघ्नतोऽमित्रान् दिक्षु सर्वासु शुश्रुवे ॥ ३१ ॥ उत्तम धनुष लेकर शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाने और शत्रुओंका वध करनेवाले द्रोणाचार्यकी प्रत्यंचाका शब्द सम्पूर्ण दिशाओंमें सुनायी पड़ता था ॥ ३१ ॥ नागानश्वान् पदातींश्च रथिनो गजसादिनः । रौद्रा हस्तवता मुक्ताः प्रमथ्नन्ति स्म सायकाः ॥ ३२ ॥ शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले द्रोणाचार्यके छोड़े हुए भयंकर सायक हाथियों, घोड़ों, पैदलों, रथियों और गजारोहियोंको मथे डालते थे ॥ ३२ ॥ नानद्यमानः पर्जन्यो मिश्रवातो हिमात्यये । अश्मवर्षमिवावर्षत् परेषां भयमादधत् ॥ ३३ ॥ जैसे हेमन्त-ऋतुके अन्तमें अत्यन्त गर्जना करता हुआ वायुयुक्त मेघ पत्थरोंकी वर्षा करता है, उसी प्रकार द्रोणाचार्य शत्रुओंको भयभीत करते हुए उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करते थे ॥ ३३ ॥ सर्वा दिशः समचरत् सैन्यं विक्षोभयन्निव । बली शूरो महेष्वासो मित्राणामभयंकरः ॥ ३४ ॥ बलवान्, शूरवीर, महाधनुर्धर और मित्रोंको अभय प्रदान करनेवाले द्रोणाचार्य सारी सेनामें हलचल मचाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंमें विचर रहे थे ॥ ३४ ॥ तस्य विद्युदिवाभ्रेषु चापं हेमपरिष्कृतम् । दिक्षु सर्वासु पश्यामो द्रोणस्यामिततेजसः ॥ ३५ ॥ जैसे बादलोंमें बिजली चमकती है, उसी प्रकार अमित तेजस्वी द्रोणाचार्यके सुवर्णभूषित धनुषको हम सम्पूर्ण दिशाओंमें चमकता हुआ देखते थे ॥ ३५ ॥ शोभमानां ध्वजे चास्य वेदीमद्राक्ष्म भारत । हिमवच्छिखराकारां चरतः संयुगे भृशम् ॥ ३६ ॥ भरतनन्दन! युद्धमें तीव्रवेगसे विचरते हुए आचार्यके ध्वजमें जो वेदीका चिह्न बना हुआ था, वह हमें हिमालयके शिखरकी भाँति शोभायमान दिखायी देता था ॥ ३६ ॥ द्रोणस्तु पाण्डवानीके चकार कदनं महत् । यथा दैत्यगणे विष्णुः सुरासुरनमस्कृतः ॥ ३७ ॥ जैसे देव-दानववन्दित भगवान् विष्णु दैत्योंकी सेनामें भयानक संहार मचाते हैं, उसी प्रकार द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनामें भारी मारकाट मचा रखी थी ॥ ३७ ॥ स शूरः सत्यवाक् प्राज्ञो बलवान् सत्यविक्रमः । महानुभावः कल्पान्ते रौद्रां भीरुविभीषणाम् ॥ ३८ ॥ कवचोर्मिध्वजावर्तां मर्त्यकूलापहारिणीम् ।
गजवाजिमहाग्राहामसिमीनां दुरासदाम् ।। ३९ ।।
वीरास्थिशर्करां रौद्रां भेरीमुरजकच्छपाम् ।
चर्मवर्मप्लवां घोरां केशशैवलशाद्वलाम् ।। ४० ।।
शरौघिणीं धनुःस्रोतां बाहुपन्नगसंकुलाम् ।
रणभूमिवहां तीव्रां कुरुसृञ्जयवाहिनीम् ।। ४१ ।।
मनुष्यशीर्षपाषाणां शक्तिमीनां गदोडुपाम् ।
उष्णीषफेनवसनां विकीर्णान्त्रसरीसृपाम् ।। ४२ ।।
वीरापहारिणीमुग्रां मांसशोणितकर्दमाम् ।
हस्तिग्राहां केतुवृक्षां क्षत्रियाणां निमज्जनीम् ।। ४३ ।।
क्रूरां शरीरसंघट्टां सादिनक्रां दुरत्ययाम् ।
द्रोणः प्रावर्तयत् तत्र नदीमन्तकगामिनीम् ।। ४४ ।।
क्रव्यादगणसंजुष्टां श्वशृगालगणायुताम् ।
निषेवितां महारौद्रैः पिशिताशैः समन्ततः ।। ४५ ।।
उन शौर्य-सम्पन्न, सत्यवादी, विद्वान्, बलवान् और सत्यपराक्रमी महानुभाव द्रोणने उस
युद्धस्थलमें रक्तकी भयंकर नदी बहा दी, जो प्रलयकालकी जलराशिके समान जान पड़ती
थी। वह नदी भीरु पुरुषोंको भयभीत करनेवाली थी। उसमें कवच लहरें और ध्वजाएँ भँवरें
थीं। वह मनुष्यरूपी तटोंको गिरा रही थी। हाथी और घोड़े उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राहोंके
समान थे। तलवारें मछलियाँ थीं। उसे पार करना अत्यन्त कठिन था। वीरोंकी हड्डियाँ बालू
और कंकड़-सी जान पड़ती थीं। वह देखनेमें बड़ी भयानक थी। ढोल और नगाड़े उसके
भीतर कछुए-से प्रतीत होते थे। ढाल और कवच उसमें डोंगियोंके समान तैर रहे थे। वह
घोर नदी केशरूपी सेवार और घाससे युक्त थी। बाण ही उसके प्रवाह थे। धनुष स्रोतके
समान प्रतीत होते थे। कटी हुई भुजाएँ पानीके सर्पोंके समान वहाँ भरी हुई थीं। वह
रणभूमिके भीतर तीव्र वेगसे प्रवाहित हो रही थी। कौरव और सृंजय दोनोंको वह नदी
बहाये लिये जाती थी। मनुष्योंके मस्तक उसमें प्रस्तर-खण्डका भ्रम उत्पन्न करते थे।
शक्तियाँ मीनके समान थीं। गदाएँ नाक थीं। उष्णीषवस्त्र (पगड़ी) फेनके तुल्य चमक रहे
थे। बिखरी हुई आँतें सर्पाकार प्रतीत होती थीं। वीरोंका अपहरण करनेवाली वह उग्र नदी
मांस तथा रक्तरूपी कीचड़से भरी थी। हाथी उसके भीतर ग्राह थे। ध्वजाएँ वृक्षके तुल्य थीं।
वह नदी क्षत्रियोंको अपने भीतर डुबोनेवाली थी। वहाँ क्रूरता छा रही थी। शरीर (लाशें) ही
उसमें उतरनेके लिये घाट थे। योद्धागण मगर-जैसे जान पड़ते थे। उसको पार करना बहुत
कठिन था। वह नदी लोगोंको यमलोकमें ले जानेवाली थी। मांसाहारी जन्तु उसके आस-
पास डेरा डाले हुए थे। वहाँ कुत्ते और सियारोंके झुंड जुटे हुए थे। उसके सब ओर
महाभयंकर मांसभक्षी पिशाच निवास करते थे ।। ३८-४५ ।।
तं दहन्तमनीकानि रथोदारं कृतान्तवत् ।
सर्वतोऽभ्यद्रवन् द्रोणं कुन्तीपुत्रपुरोगमाः ॥ ४६ ॥
समस्त सेनाओंको दग्ध करनेवाले यमराजके समान भयंकर उदार महारथी द्रोणाचार्यपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर आदि सब वीर सब ओरसे टूट पड़े ॥ ४६ ॥
ते द्रोणं सहिताः शूराः सर्वतः प्रत्यवारयन् ।
गभस्तिभिरिवादित्यं तपन्तं भुवनं यथा ॥ ४७ ॥
उन सभी शूरवीरोंने एक साथ आकर द्रोणाचार्यको सब ओरसे उसी प्रकार घेर लिया, जैसे जगत्को तपानेवाले भगवान् सूर्य अपनी किरणोंसे घिरे रहते हैं ॥ ४७ ॥
तं तु शूरं महेष्वासं तावकाऽभ्युद्यतायुधाः ।
राजानो राजपुत्राश्च समन्तात् पर्यवारयन् ॥ ४८ ॥
आपकी सेनाके राजा और राजकुमारोंने अस्त्र-शस्त्र लेकर उन शौर्यसम्पन्न महाधनुर्धर द्रोणाचार्यको उनकी रक्षाके लिये सब ओरसे घेर रखा था ॥ ४८ ॥
शिखण्डी तु ततो द्रोणं पञ्चभिर्नतपर्वभिः ।
क्षत्रवर्मा च विंशत्या वसुदानश्च पञ्चभिः ॥ ४९ ॥
उत्तमौजास्त्रिभिर्बाणैः क्षत्रदेवश्च सप्तभिः ।
सात्यकिश्च शतेनाजौ युधामन्युस्तथाष्टभिः ॥ ५० ॥
युधिष्ठिरो द्वादशभिर्द्रोणं विव्याध सायकैः ।
धृष्टद्युम्नश्च दशभिश्चेकितानस्त्रिभिः शरैः ॥ ५१ ॥
उस समय शिखण्डीने झुकी हुई गाँठवाले पाँच बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको बींध डाला। तत्पश्चात् क्षत्रवर्माने बीस, वसुदानने पाँच, उत्तमौजाने तीन, क्षत्रदेवने सात, सात्यकिने सौ, युधामन्युने आठ और युधिष्ठिरने बारह बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। धृष्टद्युम्नने दस और चेकितानने उन्हें तीन बाण मारे ॥ ४९—५१ ॥
ततो द्रोणः सत्यसंधः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ।
अभ्यतीत्य रथानीकं दृढसेनमपातयत् ॥ ५२ ॥
तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ द्रोणने मदकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति रथ-सेनाको लाँघकर दृढसेनको मार गिराया ॥ ५२ ॥
ततो राजानमासाद्य प्रहरन्तमभीतवत् ।
अविध्यन्नवभिः क्षेमं स हतः प्रापतद् रथात् ॥ ५३ ॥
फिर निर्भय-से प्रहार करते हुए राजा क्षेमके पास पहुँचकर उन्हें नौ बाणोंसे बींध डाला। उन बाणोंसे मारे जाकर वे रथसे नीचे गिर गये ॥ ५३ ॥
स मध्यं प्राप्य सैन्यानां सर्वाः प्रविचरन् दिशः ।
त्राता ह्यभवदन्येषां न त्रातव्यः कथञ्चन ॥ ५४ ॥
यद्यपि वे शत्रुसेनाके भीतर घुसकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विचर रहे थे, तथापि वे ही दूसरोंके रक्षक थे, स्वयं किसी प्रकार किसीके रक्षणीय नहीं हुए ॥ ५४ ॥
शिखण्डिनं द्वादशभिर्विंशत्या चोत्तमौजसम् । वसुदानं च भल्लेन प्रैषयद् यमसादनम् ॥ ५५ ॥ उन्होंने शिखण्डीको बारह और उत्तमौजाको बीस बाणोंसे घायल करके वसुदानको एक ही भल्लसे मारकर यमलोक भेज दिया ॥ ५५ ॥
अशीत्या क्षत्रवर्माणं षड्विंशत्या सुदक्षिणम् । क्षत्रदेवं तु भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ ५६ ॥ तत्पश्चात् क्षत्रवर्माको अस्सी और सुदक्षिणको छब्बीस बाणोंसे आहत करके क्षत्रदेवको भल्लसे घायलकर रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ५६ ॥
युधामन्युं चतुःषष्ट्या त्रिंशता चैव सात्यकिम् । विद्ध्वा रुक्मरथस्तूर्णं युधिष्ठिरमुपाद्रवत् ॥ ५७ ॥ युधामन्युको चौसठ तथा सात्यकिको तीस बाणोंसे घायल करके सुवर्णमय रथवाले द्रोणाचार्य राजा युधिष्ठिरकी ओर दौड़े ॥ ५७ ॥
ततो युधिष्ठिरः क्षिप्रं गुरुतो राजसत्तमः । अपायाज्जवनैरश्वैः पाञ्चाल्यो द्रोणमभ्ययात् ॥ ५८ ॥ तब राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर गुरुके निकटसे तीव्रगामी अश्वोंद्वारा शीघ्र ही दूर चले गये और पांचाल देशका एक राजकुमार द्रोणका सामना करनेके लिये आगे बढ़ आया ॥ ५८ ॥
तं द्रोणः सधनुष्कं तु साश्वयन्तारमाक्षिणोत् । स हतः प्रापतद् भूमौ रथाज्ज्योतिरिवाम्बरात् ॥ ५९ ॥ परंतु द्रोणने धनुष, घोड़े और सारथिसहित उसे क्षत-विक्षत कर दिया। उनके द्वारा मारा गया वह राजकुमार आकाशसे उल्काकी भाँति रथसे भूमिपर गिर पड़ा ॥ ५९ ॥
तस्मिन् हते राजपुत्रे पञ्चालानां यशस्करे । हत द्रोणं हत द्रोणमित्यासीन्निःस्वनो महान् ॥ ६० ॥ पांचालोंका यश बढ़ानेवाले उस राजकुमारके मारे जानेपर वहाँ ‘द्रोणको मार डालो, द्रोणको मार डालो’ इस प्रकार महान् कोलाहल होने लगा ॥ ६० ॥
तांस्तथा भृशसंरब्धान् पञ्चालान् मत्स्यकेकयान् । सृञ्जयान् पाण्डवांश्चैव द्रोणो व्यक्षोभयद् बली ॥ ६१ ॥ इस प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए पांचाल, मत्स्य, केकय, सृंजय और पाण्डव योद्धाओंको बलवान् द्रोणाचार्यने क्षोभमें डाल दिया ॥ ६१ ॥
सात्यकिं चेकितानं च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ । वार्धक्षेमिं चैत्रसेनिं सेनाबिन्दुं सुवर्चसम् ॥ ६२ ॥ एतांश्चान्यांश्च सुबहून् नानाजनपदेश्वरान् । सर्वान् द्रोणोऽजयद् युद्धे कुरुभिः परिवारितः ॥ ६३ ॥