भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 183

वेगं चक्रे महावेगः क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी ॥ १५ ॥ इस प्रकार बाण-वर्षासे आच्छादित होनेपर महान् वेगशाली महारथी द्रोणने क्रोधसे आँखें फाड़कर देखते हुए अपना विशेष वेग प्रकट किया ॥ १५ ॥

ततः सत्यजितश्चापं छित्त्वा द्रोणो वृकस्य च । षड्भिः ससूतं सहयं शरैर्द्रोणोऽवधीद् वृकम् ॥ १६ ॥ आचार्य द्रोणने सत्यजित् और वृक दोनोंके धनुष काटकर छः बाणोंद्वारा उन्होंने सारथि और घोड़ोंसहित वृकको मार डाला ॥ १६ ॥

अथान्यद् धनुरादाय सत्यजिद् वेगवत्तरम् । साश्वं ससूतं विशिखैर्द्रोणं विव्याध सध्वजम् ॥ १७ ॥ इतनेहीमें अत्यन्त वेगशाली दूसरा धनुष लेकर सत्यजित्ने अपने बाणोंद्वारा घोड़े, सारथि और ध्वजसहित द्रोणाचार्यको बींध डाला ॥ १७ ॥

स तन्न ममृषे द्रोणः पाञ्चाल्येनादितो मृधे । ततस्तस्य विनाशाय सत्वरं व्यसृजच्छरान् ॥ १८ ॥ संग्राममें पांचालराजकुमार सत्यजित्से पीड़ित होकर द्रोणाचार्य उसके पराक्रमको न सह सके। इसलिये तुरंत ही उसके विनाशके लिये उन्होंने बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ १८ ॥

हयान् ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ च पार्ष्णिसारथी । अवाकिरत् ततो द्रोणः शरवर्षैः सहस्रशः ॥ १९ ॥ द्रोणने सत्यजित्के घोड़ों, ध्वज, धनुषकी मुष्टि तथा दोनों पार्श्वरक्षकोंपर सहस्रों बाणोंकी वर्षा की ॥ १९ ॥

तथा संछिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः । पाञ्चाल्यः परमास्त्रज्ञः शोणाश्वं समयोधयत् ॥ २० ॥ इस प्रकार बारंबार धनुषोंके काटे जानेपर भी उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता पांचालवीर सत्यजित् लाल घोड़ोंवाले द्रोणाचार्यसे युद्ध करता ही रहा ॥ २० ॥

स सत्यजितमालोक्य तथोदीर्णं महाहवे । अर्धचन्द्रेण चिच्छेद शिरस्तस्य महात्मनः ॥ २१ ॥ उस महासमरमें सत्यजित्को प्रचण्ड होते देख द्रोणाचार्यने अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा उस महामनस्वी वीरका मस्तक काट डाला ॥ २१ ॥

तस्मिन् हते महामात्रे पञ्चालानां महारथे । अपायाज्जवनैरश्वैर्द्रोणात् त्रस्तो युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥ उस महाबली महारथी पांचाल वीरके मारे जानेपर युधिष्ठिर द्रोणाचार्यसे अत्यन्त भयभीत हो गये और वेगशाली घोड़ोंसे जुते हुए रथके द्वारा युद्धस्थलसे दूर चले गये ॥ २२ ॥

पञ्चालाः केकया मत्स्या चेदिकारूषकोसलाः ।